छमिया - मैं भोजपुरी नहीं जानती, हिन्दी के शेर अच्छे लगते हैं।
मुंशीजी- यह हिन्दी ही तो थी, कुछ शब्द उर्दू , अरबी के थे। समझ में में तो आ गए न। जो बात हम आसानी से नहीं कह पाते , उनको शेर ओ शायरी के माध्यम से आसानी से कह जाते हैं।
छमिया- सच तो ये है की शेर मुझे बेहद पसंद हैं, समझो जान हैं मेरी। मैं हमेशा पढ़ती रहती हूँ। कुछ और कहो
मुंशीजी- वक़्त की मुठ्ठी मे कैद तकदीर ,देखकर हम तो हँस दिए हाथ की लकीर देखकर । वादा था कि बिछड़ के कभी भी ना रोयेंगे ,फिर क्यों रो दिया उसकी तस्वीर देखकर । वो ख्वाब जिनको कभी बचपने मे देखा , आँख भर आयी है उनकी ताबीर देखकर। मिलाया जिसने अक्सर दोस्ती का हाथ ,हैरान हूँ मै उन हाथो मे शमशीर देखकर । सफ़र जिन्दगी का क्या कभी रोक ,पावोगे ये सोचता रहा पांव मै पड़ी जंजीर देखकर ।
छमिया - वाह ... मजा आ गया, ऐसे शब्द दिल के अन्दर घर कर जाते हैं। लगता है जैसे लिखने वाले न मेरे ऊपर ही लिखा है। थोड़ा बहुत मैं भी लिखने की कोशिश करती हूँ, लेकिन जमता नहीं है। कैसे जमेगा ? मैं रदीफ़ काफिया , मक्ता थोड़े ही जानती हूँ।
मुंशीजी- ये सब चीज तो मैं भी नहीं जानता , अगर किसी शायर की कोई रचना अच्छी लगती है तो उसे लिख लेता हूँ, जिसे चिट्ठी वगैरहा में यूज कर लेता हूँ। आज तुम्हें सुना दिया। अब तो जान भी गया हूँ की तुम भी इसे पसंद करती हो।
छमिया -मैंने भी एक वेब साईट पर कुछ पंक्तियाँ पढी थीं, ध्यान दीजिये- सच्चे शब्दों में सच के अहसास लिखेंगे ..वक्त पढे जिसको कुछ इतना खास लिखेंगे ,गजल हम पर लिखेंगे लिखने वाले,हमने कलम उठाई तो इतिहास लिखेंगे।
मुंशीजी - वाह , वाह । कमाल करते हैं लिखने वाले भी। क्या खूब लिखा है, मजा आ गया ।dimaag फ्रेश हो गया। अब तो ऐसा दिल कर रहा है की तुम्हारे सारे वस्त्र एक तरफ उतार फेंकूं और तुम्हारे अनमोल खजाने की पूजा कर लूं, प्यार कर लूं इन उभारों से, इन गोलाइयों को दबाने , तुम्हारे होठों का अमृत रस पीने का दिल कर रहा है। प्यार के इस बहाव में बह जाने दो मुझे । इस वक्त तुम्हारे सामने बहुत बड़ा चांस है, इसे कैश करो। ऐश करो मेरी जान ऐश करो। अरे ये क्या ये तो छोटा -मोटा शेर ही बन बैठा।
छमिया चुप थी, उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, खुद मुंशीजी भी सूखे पत्ते की तरह काँप रहे थे, यही फर्क होता है पत्नी और बाहरी लडकी के बीच। जब कोई अपनी पत्नी के साथ प्रेमालाप करता है तो उसे किसी तरह की चिंता नहीं होती, सामाजिक और मानसिक सुरक्षा के घेरे में रहकर वे दोनों जब एकाकार होते हैं तो बहुत इंजॉय करते हैं। लेकिन चोरी- चोरी किया जाने वाला प्रेमालाप कभी-कभी तो अपने अंजाम पर भी नहीं पहुच pata है। मुंशीजी न कुछ लाइनें सुनाकर छमिया को आकर्षित करने की कोशिश की-
-हमको भी समझ फूल या पत्थर नहीं आते,दुश्मन की तरह दोस्त अगर घर नहीं आते,नज़दीक बहुत गर रहे, बन जाओगे आदत,ये सोच के, मिलने तुझे अक्सर नहीं आते , जेस दिन से मैं ले आई हूँ बाज़ार से पिंजरा ,उस रोज से, छज्जे पे कबूतर नहीं आते , मिल जाए नया ज़ख़्म तो फिर कोई ग़ज़ल हो,अब ज़हन में अल्फ़ाज़ के पैकर नहीं आते । सच कहूं तो तुम्हारे हुस्न को देखकर हर शायर भी भी दीवाना हुए बिना नहीं रह सकता, जो भी ठीक से देखेगा वह शायरी भूलकर तुम्हारी इन झील सी आँखों में डूबना चाहेगा।
छमिया- मैं नहीं जानती थी की तुम पूरे रसिया हो, दिखने में तो सीधी सादे लगते हो मगर हो बड़े उस्ताद । मुझे पटाने से पहले और भी सैकड़ों पर डोरे दाल चुके हो , अब समझ में आया की कैसे आ जाती होंगी तुम्हारी बातों में ,
मुंशीजी- तुम सबसे अलग हो, अब तक तुम्हारे मोहल्ले की कोई और लड़की होती तो काम फिट हो जाता, वह कबकी अपने घर चली गयीए होती, मुझे भी खुश करके और खुद भी खुश होकर। कितना समय लगता है, पांच मिनिट में काम निबट जाता है।
Thursday, January 28, 2010
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