Sunday, January 17, 2010

भाग- ७
मुंशीजी अपनी ही शाली में कहते चले जा रहे थे, उन्हें यह भी भी ध्यान नहीं था कि इसी छमिया उर्फ छबीली के मन पर क्या बीत रही है , हांलाकि चेहरे पर मन के भाव साफ़ नजर आते हैं मगर उनको कोई देखने और समझने वाला भी तो चाहिए. छामिया ने उससे कहां-
-मुझे एक कहावत याद आ रही है – “कुत्ते की पूंछ को अगर १२ साल भी सीधी करने के लिए रखा जाए तो भी वह टेढी की टेढी ही रहटी है , तुम्हारा भी वही हाल है, कभी सुधर ही महिम सकते. चाहे मैं कुछ भी कह लूं, कुछ भी सुन लूं,. मुझे लगता है शायद तुम्हारा नाश्ता भी मेरी जली कटी सुनने के बाद ही होता होगा, इससे पहले तुम्हारा पेट ही नहीं भरता. मेरे ख़याल से तुम पच्चड़ हो चुके हैं, ऐसे लोगों को पच्चड़ ही कहा जाता है.
मुंशीजी- मैंने पहले ही कहा कि मुझको कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं इस बात के लिए मन में कोई फर्क नहीं रखता, तुम भले ही मुझे पसंद नहीं करतीं लेकिन मैं तुम्हें चाहता हूँ.
छमिया- अच्छा जी, क्या इसीको चाहत कहते हैं ? क्या यही प्यार है ? मुझे रखैल बनाने का प्रस्ताव रखते हो और कहते हो कि मोहब्बत है, यह सौदेबाजी है मुंशीजी, तुम ठहरे दुकानदार . हर जगह पर नफ़ा नुक्सान ही देखते हो, तुम्हें प्यार में व्यापार नजर आता है.और इतना तो अब मैं भी समझ गयी हूँ कि सौदागरी करने वाला कभी प्यार नहीं कर सकता.
मुंशीजी- जिन बातों पर तुन जोए दे रही हो ये गलत नहीं हैं, अच्छी हैं, सच्ची भी , लेकिन यह भी जानलो कि किताबों और किस्से कहानियों में ही ये सब भला लगता है, सच्चाई से इसका दूर-दूर तक भी कोई लेना-देना नहीं होता. जब इस तरह के भाव हकीकत के धरातल से टकराते हैं तो टूटकर चूर-चूर हो जाते हैं, ये जमाना गिव एंड टेक का है. यानी कि कुछ देना तो उसके बदले कुछ लेना. जब आप दूकान पर जाते हैं तो पहले कुछ देने का ऑफर देते हैं फिर दुकानदार सामान देता है.
छमिया- मैं भी वही कह रही हूँ, तुम जैसा सौदागर कभी भी प्यार को नहीं समझ सकता, यह फकीरों का काम है, दीवानो का काम है, और तुम जैसे लोग सिर्फ जिस्म से मतलब लगते हैं, जिस्म का सौदा आप जैसे महानुभाव करते हैं.
मुंशीजी- तो फिर क्या करून, तुम्हें पाने के लिए बाबा जी बन जाऊं, सड़क पर आ जाऊं, दर –दर की ठोकरें खाता फिरूं, क्या यही प्यार है ? क्या इसी तरह तुम मानोगी मेरे प्यार को. तुम तो उस वाला हिसाब कर रही हो-‘रांड के पाँव सुहागन लागी, हो जा बहना मुझ जैसी. यानी कि जब एक सुहागिन ने विधवा के पाँव छुए तो उसने अपने जैसी होने का आशीर्वाद दिया. वही आशीर्वाद तुम मुझे दे रही हो , तुम जिस तरह परेशान हो, जैसे तुम्हारा परिवार एक-एक रुपये के लिए मोहताज है, तुम चाहती हो कि मैं भी प्यार के चक्कर में वैसा ही हो जाऊं, जबकि मैं इसके ठीक उलटा सोचता हूँ, मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा पिता भी मेरी ही तरह कोई कारोबार करे, हर शुरुआत छोटी ही होती है जो बढते-बढते बड़ी हो जाती है, मेरी इच्छा है कि तुम अच्छे –मंहगे कपडे पहनो, गहने पहनो. मेरी इच्छा है कि तुम अपने भाइयों और बहनों को अच्छे स्कूल में पढाओ , उन्हें काबिल बनाओ, वे मजदूरी के भंवर से निकल जाएँ , बड़े अफसर बनें, खूब नाम और दाम कमाएँ. और यह सब संभव है , तुम्हें क्या करना है, कुछ नहीं . बस सुख लेना है, मैं तुम्हें आनंद ही एंड देना चाहता हूँ, मुझे तुमसे लगाव है तो तुम्हारी सारी जरूरतों को पूरा करने कि जिम्मेदारी भी मेरी है, मैं ये अच्छी तरह से समझता हूँ, बस अपने इन होठों का रस चखने दो, अपनी जवानी के सागर में गोते लगाने दो. क्या बिगड जाएगा तुम्हारा ?

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