Tuesday, January 19, 2010

भाग-८मैं अकेला ही तो यह सुख नहीं लूटूँगा तुम भी बराबर कि साझीदार रहोगी, तुम्हें भी उतना ही आनंद आएगा जितना कि मुझे , हो सकता है कि थोडा सा कम आएगा मगर आएगा जरूर. जब मैं तुम्हारे होठों का रसपान करूँगा तो क्या अकेले मुझे ही मजा आएगा ? जब मैं तुम्हारे इन यौवन उभारों को दबाउंगा तो क्या मैं अकेला ही रोमांचित होउंगा , क्या तुम्हें वह सुख नहीं मिलेगा ? जब मेरा और तुम्हारा जिस्म एकाकार होगा तो उस चरम सुख का लाभ क्या तुम नहीं उठाओगी ? फ्री इतना बबाल क्यों उठा रही हो. सर पर आसमान क्यों उठा रही हो. आखिओर मैं कुछ खास तो नहीं चाहता सिवाय इसके कि तुम्हारे बदन से लिपटकर कुछ पल बिताऊँ.
इस बार मुंशीजी ने मानो अचूक ब्रह्मास्त्र से वार किया था. छमिया खामोश होकर उसकी बातों को सुन रही थी. उसको लगा जैसे कि उसके भाइयों और बहनों का भाविष्य सुरक्षित होने जा रहा है.उसे ख्यालों में लगने लगा कि उसका भाई शहर में पढकर बड़ा हो रहा है, बड़ा होकर वह अफसर बन जाता है और सबके सामने उसकी तारीफ़ करता है, उसकी मेहनत के गुण गाता है, उसकी बहन बड़ी कलाकार बन गयी है है, और जब उसको पुरस्कार मिलता है तो वह उसका नाम पुकारती है, कार्यक्रम के जज उसको ट्राफी प्रदान करते हैं. उसको त्याग करने का ख़याल आता है. फिर अगले ही पल उसे महसूस होता है जैसे कि मुंशीजी उसके कोरे बदन पर कीड़े कि तरह रेंग रहे हैं. लगता है जैसे कि उसकी इज्जत नीलाम हो गयी है और वह मंदी की सब्जी कि तरह बिक गयी है , उसे बेचने वाला कोई और नहीं बलिक वह खुद है. सौदागर उसका मांस नोंच रहे हैं. उसका दिल भर आया. दिल का दर्द आँखों से बहने लगा. आंसूं टप-टप बहने लगे. आँखों से जन सावन बरसने लगा तो मुंशीजी धीरे –धीरे उसके पास आये , अपने हाथों से उसके आंसू पौंछे और फिर उसको सीने से लगा लिया. छमिया का दिल चाहा कि खूब जोर-जोर से रोये मगर ऐसा भी नहीं कर सकी. आंसूं भी रूंठ गए, हालात की तरह वे भी बेवफा हो चुके थे . मुंशीजी कह रहे थे-
-जो तुम्हारी किस्मत में नहीं लिखा उसे बेवजह आमंत्रण दे रही हो. इन आंसुओं को मंजिल की सीढियां बनाओ , कमजोरी नहीं. तुम कोई भी चीज फ्री में हासिल नहीं कर रही हो. बल्कि उसके बदले कुछ देने भी जा रही , अपना समर्पण, अपना विश्वाश ... तो तुम्हें ज़रा भी हीन भावना का शिकार नहीं होना चाहिए, इसके अलावा तुम्हें तो खुशी होनी चाहिये कि तुम अपने दम पर अपने परिवार को सदा –सदा के लिए मुफ्लिसी के भंवर से निकाल सकती हो. ऐसी कुव्वत भी हर किसी में नहीं होती. जहां तक बाजार की बात है तो वहाँ पर जिस्म का भाव इतना भी नहीं है कि तकदीर संवारी जा सके, जिस्म के बाजार में पचास –सौ रुपये में रोजाना शरीर बिकते हैं. और एक बार जो इस उलझन में फंसी फिर वह हमेशा के लिए उसमे फंस जाती है, दलाल उसे फिर कभी दल –दल से निकलने ही नहीं देते. मगर मैं तुमको संरक्षण प्रदान कर रहा हूँ, जब लोग जान जायेंगे कि तुम मुझसे जुडी हुई हो तो कोई भी तुम पर नजर नहीं गदायेगा, जब तक तुम फ्री दिखाई दोगी तभी ताल सब लार तप्कायेंगे इसके बाद सब किनारा कर लेंगे , हमारे बीच एक ईमानदार समझौता रहेगा, हजब तक तुम मुझे सुख दोगी तब तक मैं तुम्हारे परिवार को आर्थिक सहायता दूंगा, जो भी खर्च होगा वो सब वाहन करूँगा, इस बीच तुम्हें मेरी पत्नी की तरह रहना होगा , ये अलग बात है कि इस बात को अगर तुम छिपाकर भी रखना चाहो तो मुझे कोई एतराज नहीं, उलटा हम दोनों के लिए ही यह उचित रहेगा.
छमिया- इस बात की क्या गारंटी है कि मुझे पाने के बाद तुम अपना वादा पूरा करोगे ?
मुंशीजी- मैं तुम्हें हर तरह संतुष्ट करने के लिए तैयार हूँ., जैसे कहो मैं मानूंगा. तुम जिस तरह की गारंटी चाहो मैं देने के लिए तैयार हूँ. मैं ये कर सकता हूँ क्योंकि मैंने उतना ही वादा किया है. जो लोग सूरज, चाँद सितारे तोड़कर लाने की बात करते हैं, वे भावुकता में वादे तो कर देते हैं लेकिन उसे कभी पूरा नहीं पाते , क्योंकि वे सिर्फ करने के लिए वादे करते हैं और मैं निभाने के लिए . समझी.?

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