आप बेवजह उसकी माँ-बहन या रिश्तेदारों से बड़े रिस्पेक्ट से बातें करने लगते हैं। उसके घिसे-पिटे जोक्स पर भी आपको बहुत हँसी आती है। उसकी हर बेवकूफी और गलती आपको क्यूट लगती है। उससे मिलने के बाद, घंटों बात करने के बाद भी आपको लगता है कि काश, थोड़ा वक्त और मिल जाता या काश, इस मुलाकात का अंजाम कभी जुदाई न होता। यदि वह किसी की ओर देख भी ले तो आपको गवारा नहीं, आपका दिल आहत हो जाता है। उसका साथ आपको अच्छा लगने लगता है और बाकी सबका साथ बोर। उसकी हर बात से आप सहमत हो जाते हैं। उसकी हर सलाह आपको अच्छी लगने लगती है। अब आपको अपनी मनपसंद का खाना अच्छा नहीं लगता। अब आप मेनू देखते समय यह ध्यान रखते हैं कि उसे क्या पसंद है। अगर ये सब कुछ या इनमें से कुछ आपके साथ हो रहा है। तो समझ लें कि- प्यार हुआ चुपके से। इन शब्दों को याद कर वह खुद ही हंसने लगी। उसके साथ ऐसा ही कुछ तो हो रहा था। और हाँ वह चाहती भी तो यही थी न। की कोई जन्दगी में आये , जिसे वह अपना कह सके। कोई अपना हो जिसे दिल अपना माने। जिसके साथ सुख दुःख शेयर कर सके। दुःख के समय जिसके कंधे पर सर रखकर सो सके। खुशी के वाक्य जिसके साथ कहकहे लगा सके ।उसने सुन रखा था की संपूर्ण मानव समाज के लिए प्रेम एक सर्वोत्तम सौगात है। प्रेम प्रकृति का वह अनमोल उपहार है जो मानव जाति के अस्तित्व हेतु अति आवश्यक है। यदि मनुष्य के हृदय से प्रेम समाप्त हो जाए तो मानव जाति के विनाश को शायद कोई न रोक सके।प्रेम वह मधुर अहसास है जो जीवन में मिठास घोल देता है। कटुता दूर करने व वात्सल्य तथा भाईचारे के संचार में प्रेम की महती भूमिका है। मगर अफसोस! आज प्रेम का वह शाश्वत रूप नहीं रहा। प्रेम की नैसर्गिक अनुभूति आज आधुनिकता की चकाचौंध में कहीं खो गई है। वर्तमान में प्यार जैसे शब्द से सभी परिचित होंगे मगर सच्चे प्यार की परिभाषा क्या है, यह बहुत कम लोग जानते हैं।वर्तमान में सिनेमाई प्रभाव के चलते नायक-नायिका के क्षणिक प्यार को ही प्रेम का विस्तृत रूप समझ लिया गया है और वैसा ही प्रदर्शन युवा पीढ़ी भी करने लगी है। वह क्षणिक आकर्षण व उसकी आड़ में भावनाओं के शोषण को ही प्यार मानकर स्वयं तो गुमराह हो ही रही है, साथ में प्यार को भी बदनाम कर रही है। यदि यह सवाल उठे कि आखिर सच्चा प्यार क्या है? तो जवाब में हजारों तर्क दिए जा सकते हैं, जो सभी अपनी जगह सही भी होंगे, मगर यदि इन तर्कों का सार निकाला जाए तो वह है 'प्रेम यानी संपूर्ण समर्पण भाव।'
वास्तव में तो प्यार अभी तक प्यार है जब तक उसमें विशालता व शुद्धता कायम है। अशुद्ध व सतही प्यार न केवल दो हृदयों के लिए नुकसानदायक है बल्कि भविष्य में जीवन के स्याह होने की वजह भी बन जाता है।
विशुद्धतम वही है जो प्रतिदान में कुछ पाने की लालसा नहीं रखता। आत्मा की गहराई तक विद्यमान आसक्ति ही सच्चे प्यार का प्रमाण है। सच्चा प्यार न तो शारीरिक सुंदरता देखता है और न ही आर्थिक या शैक्षणिक पृष्ठभूमि। सच्चा प्यार बस, प्रिय के सामिप्य का आकांक्षी होता है। तो क्या अजय उससे इसी तरह का प्रेम करता है ? या फिर वह भी अन्य युवाओं की तरह अपना शौक पूरा करने या फिर ऐसे ही मौज मस्ती के लिए प्रणय निवेदन कर रहा है ? चन्दा के दिल से आवाज आयी की अगर ऐसा होता तो फिर उसके लड़कियों की क्या कमी थी , वह आराम से किसी भी लड़की से फ्लर्ट कर सकता था। कोई भी सुन्दर लड़की उसके साथ दोस्ती करने के लिए तरसती थी, इस बात को वह व्यक्तिगत तौर पर भी जानती थी क्योंकि वह पिछले कई वर्षों से इस गाँव में नौटंकी करने के लिए आ रही थी। तभी तो उसे गाँव के सभी लोगों के बारे में अच्छी तरह से जानकारी हो गयी थी। किसका टांका किसके साथ फिट है और कौन सी महिला किसे अपनी अदाओं के जाल में उलझाकर अपना उल्लू सीधा कर रही है, उसे इस बात का भी ज्ञान हो गया था।
Wednesday, March 17, 2010
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