फिर अजय ने उसीको क्यों चुना ? अगर वासना के वशीभूत होकर वह उससे प्रणय निवेदन कर रहा है , तो उसकी इस इच्छा की पूर्ती तो गाँव की अन्य लड़कियां आसानी से कर सकती थीं, तो क्या वह उसके डांस, डायलोग डिलीवरी या सुन्दर आवाज के कारण उसे चाह रहा है। क्या वह जानता है की उसकी उम्र ५० साल पार करने को है , हो सकता है कर भी चुकी हो। और वह खुद २० साल से भी कम उम्र का है। फिर क्या कारण है की अजय उस पर जान छिड़क रहा है । कहीं उसका प्रेम क्षणिक तो नहीं ? क्या उसने कभी उसका बिना मेकप का चेहरा देखा है ? जब वह बन ठनकर स्टेज पर जाती है तो बात अलग होती है और थक हारकर सोने के बाद जब वह सबेरे जागती है तब की बात बिलकुल अलग होती है। उसने सोचा की अजय से मिलकर उसे धीरे -धीरे अपना वास्तविक रूप दिखाया जाए, उसके बाद जो होता है , तब आगे की कार्रवाई की जायेगी। चन्दा का अपना यह आइडिया पसंद आया। वह तुरंत चिट्ठी लिखने बैठ गयी। उसने लिखा-
प्रिय अजय, मैं कुशल हूँ। आशा करती हूँ की तुम कुशलपूर्वक होंगे। तुम पत्र तो बहुत अच्छा लिखते हो। खुद लिखते हो या किसी दोस्त की मदद से यह सब करते हो । खैर, मैंने सुना है की अच्छे पत्र लिख लेते हैं आगे चलकर वही अच्छे लेखक बन जाते हैं। लेखन क्या है ? शब्दों के मोतियों की माला बनाना । कहाँ कौन सा शब्द प्रयोग करना है, अगर इसका सलीका आ गया तो शायरी भी कर सकती हो। मैं इतना अच्छा लिखना तो नहीं जानती , मगर हाँ, दिल से जो आवाज निकलेगी उसे कागज़ पर उतारने का प्रयास जरूर करुँगी। इस कोशिश में कितनी कामयाबी मिली है । यह सिर्फ तुम बता सकते हो। मेरी इच्छा है की कल सुबह तुम्हें अपने हाथों से चाय बनाकर पिलाऊँ, कैसा रहेगा ? कई दिनों से युम कुछ परेशान से हो। मुझे तुम्हारा बुझा सा चेहरा अच्छा नहीं लगता। तुम उछल कूद करते, धमा चौकड़ी मचाते ही अच्छे लगते हो। अगर तुम्हारे उदास रहने का कारण मैं हूँ तो मुझे इसका खेद है। अब तो हंस जाओ। अब बोलो कल आओगे न,। मैं अपने कमरे में तुम्हारा इन्तजार करुँगी। अगर तुम्हें कोई दूसरा काम ना हो तभी आना। मुझसे मिलने के लिए अपना समय बर्बाद मत करना। - चन्दा,।
चन्दा ने यह खत अजय तक पहुंचा दिया। अजय तो जैसे दीवाना हो गया। पत्र पढते ही झूमने लगा। नाचने लगा। बहुत दिनों के बाद जब उसकी माँ ने अपने इकलौते लाडले को खुश देखा तो फूली नहीं समाई। जान गयी की उनका लड़का शायद किसी लड़की के प्रेम में पड़ गया है । तभी तो उसका सन्देश पाकर खुश हो रहा है । अजय गाने लगा- शायद मेरी शादी का ख्याल , दिल में आया है । इसीलिए मम्मी ने तेरी मुझे चाय पे बुलाया है। उसने चन्दा के खत को कई बार चूमा और नाई की दूकान की तरफ दौड़ा। अच्छी कतिन कराई । दूकान से बढ़िया वाली इत्र खरीदी और रात भर करवात बदलता रहा। वह सोचता की चन्दा के पास जाते ही ऐसे कहूँगा, वैसे कहूँगा। कभी सोचता की ऐसे करूँगा । फिर अगले ही पल अपने ही प्लान को फेल करके दूसरा प्लान बना देता। उसकी हालत मजनू जैसी हो गई ।प्यार के लड्डू ऐसे ही तो होते हैं। इन्हें खाने पर भी पछताना होता है और न खाने पर भी। कहा जाता है की जितना मजा इन्तजार में होता है , उतना मिलन में नहीं आता। अजय भी इस इन्तजार का खूब आनंद उठाना चाहता था। देर रात तक वह चन्दा से मिलने के बाद बोलने या करने की बातों के बारे में ही सोचने लगा। आखिर कार जब वह नीद की आगोश में सोया तो फिर देर तक सोता रहा। जागते ही ही वह पलंग से उतारकर नित्यकर्म करने के लिए दौड पड़ा। उसे मालूम था की चन्दा को बहुत काम होते हैं। अगर आज उसे कोई जरूरी रिर्सल निकल आयी तो उसके अकेले में मुलाकात का सपना न जाने कब पूरा हो पायेगा। फ्रेश होकर वह चन्दा के कमरे की तरफ चल दिया। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। पहली बार वह किसी महिला से अकेले में मिलने जा रहा था। ना जाने कौन सा डर उसे अंदर से डरा रहा था।
Thursday, March 18, 2010
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