अजय -तू मेरा सच्चा दोस्त है अहमद। तूने ही तो कहा था की प्रेम की कई परिभाषाएँ है। हर व्यक्ति इसे अपने ढंग से परिभाषित कर इसमें अपनी खुशियाँ ढूँढ़ता है। प्रेम को यदि हम एक 'अहसास' कहें तो यह कुछ हद तक सही होगा। हकीकत में यह एक अहसास है, जो आपको भीतर तक हिलाकर रख देता है और कहीं न कहीं दिल के समंदर में उठती प्रेम की इन लहरों में व्यक्ति का अहंकार व अकड़ सब डूब जाते हैं। कुछ शेष रह जाता है तो वो है केवल सच्चा प्यार। जब आप किसी से प्रेम करते हैं तो आप उसकी जात-पाँत, उम्र व अन्य बंधनों को नकार देते हैं क्योंकि प्रेम कभी सोच-सोचकर समझकर या व्यक्ति देखकर नहीं किया जाता है। यह तो बस स्वत: ही हो जाता है।
इस पवित्र रिश्ते में हमेशा निवेदन का भाव होना चाहिए। अकड़, आज्ञा या अहम का नहीं। यदि ये भाव आपके मन में घर कर जाएँगे तो शायद आप जीवन में कभी भी सच्चा प्रेम प्राप्त नहीं कर पाएँगे। अपने प्यार को प्यार से सहेजकर सदा अपने पास रखो तो वो जीवनभर आपका साथ न
यदि यह सोच-समझकर किया जाता तो शायद व्यक्ति को कभी अपने जीवनसाथी, परिवार, रिश्तेदार व सहकर्मी से असंतोष नहीं होता। प्रेम व्यक्ति को नहीं उसके दिल के भाव व विचारों का मुरीद होता है। तभी तो कहते हैं कि प्रेम अचानक हो जाता है। इसका पता हमें तब चलता है जब हमारे व्यवहार में, हमारे विचार में, हमारे रहन-सहन में अचानक सकारात्मक परिवर्तन आने लगते हैं। हमारा अहंकार कही खोकर हममें नम्रता का भाव आ जाता है, जब हम बेवजह क्रोध करने के बजाय मुस्कुराना सीख लेते हैं। यही तो जादू है प्रेम के नशे में जो एक कठोर व निर्दयी इंसान के मन को भी पिघलाकर उसे प्रेम करना सीखा देता है। कुछ लोग प्रेम करके अहंकार करते हैं व जरा-जरा सी बात पर विवाद करके नासमझी में अपने प्रेमी को हमेशा के लिए खो देते हैं। उस वक्त उनके जीने की वजह उनके मरने का कारण बन जाती है। हमेशा याद रखें प्रेम प्राण व ऊर्जा का संचार करता है दुख व अवसाद का नहीं। शायद इसीलिए कहते हैं कि इस पवित्र रिश्ते में हमेशा निवेदन का भाव होना चाहिए। अकड़, आज्ञा या अहम का नहीं। यदि ये भाव आपके मन में घर कर जाएँगे तो शायद आप जीवन में कभी भी सच्चा प्रेम प्राप्त नहीं कर पाएँगे। अपने प्यार को प्यार से सहेजकर सदा अपने पास रखो तो वो जीवनभर आपका साथ निभाएगा।ये तेरा भाषण है । तेरी पहली बातों पर या अब जो कह रहा है , उन पर।
अहमद-जब हमें कोई चीज पसंद आती है तो हम उसे पाने के लिए तड़प उठते हैं। सारी कोशिश यही रहती है कि वह चीज हमें किसी भी तरह मिल जाए। जमीन-आसमान एक करने के बाद वह चीज हमें मिल तो जाती है पर थोड़े ही दिनों में हमें महसूस होने लगता है कि वह चीज हमारी उम्मीद पर खरी नहीं उतरी। पछतावा होता है कि नाहक हमने अपनी उतनी मेहनत, धन और समय उस पर बरबाद किया। ठीक यही तजुर्बा व अहसास रिश्तों में जल्दबाजी करने पर भी होता है। प्यार के रिश्ते की शुरुआत करने में धीमी गति से आगे बढ़ना बहुत ही समझदारी भरा लव मंत्र है। जब दो लोग किसी भी कारणवश बार-बार मिलते हैं तो काम के अलावा भी संवाद बनता है। रोजमर्रा की बातों में हँसी-मजाक भी शामिल होने लगता है। पहचान बढ़ती जाती है तो एक-दूसरे से कभी तबीयत का हालचाल भी पूछने लगते हैं। भूख की बात सुनने पर कोई अपना टिफिन भी पेश कर देता है। कार्य या पढ़ाई आदि की समस्या आने पर सलाह-मशविरा भी करने लगते हैं। ज्यों-ज्यों सहजता बढ़ती जाती है प्रतिक्रिया ज्यादा निजी होती जाती है।ऐसे में जब वह व्यक्ति अपनी स्थिति साफ करता है तो प्यार का इजहार करने वाले के पैर के नीचे से जमीन खिसक जाती है। वह अवसाद में डूब जाता है। उसे लगता है उसके साथ धोखा हुआ है। उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया गया है। इलजाम यह लगाया जाता है कि पहले से ही यह स्थिति क्यों नहीं साफ की गई। वह यह मानने को तैयार नहीं होता है कि इतनी नजदीकियाँ नहीं थी कि उसे प्यार के रिश्ते के बारे में बताया नहीं जाता। यदि सामने वाला भलमनसाहत में नम्रता से पेश आता है और गलतफहमी से पहुँचने वाले दुख के प्रति संवेदनशीलता का भाव रखता है तो और भी मुश्किलें ज्यादा बढ़ जाती हैं।इसकी वजह से एक तो प्रेम का इजहार करने वाला व्यक्ति उस मनोदशा से निकल नहीं पाता है, दूसरा यह मायने भी निकाला जाता है कि सामने वाले की गलती है इसीलिए उसे गिल्ट फील हो रहा है। इससे इजहार करने वाले की स्थिति और भी गंभीर हो जाती है और उस भ्रम को तोड़ पाना कठिन हो जाता है। वह बहुत दिनों तक मानसिक तनाव से गुजरता है।अक्सर ऐसे लोग आत्महीनता एवं अविश्वास की भावना का शिकार हो जाते हैं। जीवन के किसी मोड़ पर जब उसे सही व्यक्ति मिलता है तो वह उस पर भी भरोसा नहीं कर पाता है। उसका आत्मविश्वास इतना हिल चुका होता है कि किसी की भावना की गहराई को न तो वह समझ पाता है और न ही उसका सही आकलन कर पाता है। सबसे दुखद यह होता है कि वह जीवन भर किसी के सामने कोई भी प्रस्ताव रखने से डरता है। दोस्तों, प्यार के मामले में जल्दबाजी करना ठीक नहीं है।अब तू तो मेरा यार है। मुझे तो समझाना पड़ता है, तुझे भी और अपने दिल को भी। मगर अब लगता है जैसे की सुलझाने के चक्कर में मैं खुद ही उलझ गया हूँ।
Monday, March 15, 2010
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