Wednesday, March 24, 2010

भाग -४३

भले ही तुम्हें फर्क नहीं पड़ता , लेकिन मुझे तो पड़ना स्वाभाविक है. अगर मै खुद ही कमजोर पड़ गयी तो क्या होगा ? मुझे तुम पर भरोसा है , लेकिन अपने बारे में क्या कहूँ , अपने आप से भी तो डर लगता है न...
अजय ने उसकी बात पर कम ध्यान दिया , और चन्दा को अपनी बांहों में भर लिया.वह थोड़ी सी सकपकाई , दरवाजे पर निगाह दौडाई , अजय समझ गया की चन्दा डर रही है. वह भागकर गया और जाकर गेट बंद कर दिया, इसके बाद उसने उसी तेजी के साथ चन्दा को पकड़ लिया. चंदा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा. अजय भी ऐसे हांफ रहा था जैसे वह मीलों पैदल चलकर या भागकर आया हो. दोनों एक दूसरे की नजर में झाँकने लगे , चन्दा को ना जाने क्या हुआ की उसने अपनी आँखें बंद करलीं, अजय ने उसकी बंद पलकों को चूम लिया. चंदा की एक आह निकल गयी , वह कसमसाने लगी, विरोध बिलकुल त्याग दिया और उसे समर्थन देने लगी. अजय का जब हौसला बढ़ा तो वह भी आगे बढ़ने लगा, अब वह चन्दा के गालों को चूम रहा था, चन्दा अनियन्त्रित होने लगी. अजय उस पर हावी होने लगा. उसकी गोलाइयों को दबाने लगा, मन में अरमान मचलने लगे, दोनों खामोश होकर क्रांति करने के लिए आतुर थे. चन्दा ने जब अपनी दोनों बाँहें उठाकर जोरदार अंगडाई ली तो अजय और भी बेकाबू हो गया. उसकी साँसें लोहार की धौंकनी की तरह चलने लगीं, यह अद्भुत क्षण थे. अजय के होठ चन्दा के होठों की तरफ बढ़ने लगे, चन्दा ने जन ख़तरा भांप लिए तो बोले-
- आह, यह गज़ब मत करना, जुल्म हो जाएगा मुझ पर. कोई आ जाएगा , मुझे देर हो रही है.
अजय- आज रोक टोक मत करो, दिमाग को फ्री छोड़ दो. आज हम दिल की बात मानेंगे , दिमाग की नहीं. दिमाग तो बेवजह की अडंगे अडाता रहता है , इसकी बातें सुनीं तो जी नहीं पायेंगे. यह प्यार का दिन है. आज रामनवमी भी है. ऐसे पवित्र समय में ना नुकर करना ठीक नहीं है. जीवन के सारे काम एक तरफ और ये हसीं क्षण एक तरफ, तुंम नहीं जानती हो , आज मुझे कितनी संतुष्टि मिली है, जब तक तुमसे मुलाक़ात नहीं हुई थी तब तक मैं जल बिन पानी की तरह तरसता रहा. ऐसा लगता था जैसे की जिस्म में जान ही ना हो, एक ज़िंदा लाश की तरह रहता था, मेरे कारण मेरी माँ बहुत परेशान रहती थी. मुझे भी अच्छा नहीं लगता की मेरी वजह से मेरी माँ को तकलीफ हो, लेकिन क्या करून, दिल के हाथों मजबूर था. मैंने इस नादाँ दिल को समझाने की बहुत कोशिशें की, मगर सफलता नहीं मिली. मुझे बस एक ही बात ध्यान में रहती थी- चन्दा, चन्दा और चन्दा. तुम्हारे सिवाय मुझे कोई सुध -बुध ही नहीं थी, बेचारे अहमद ने ऐसे वक्त में मेरा साथ नहीं छोड़ा. वह लगातार मेरी मदद करता रहा. बड़ा सच्चा और स्वाभिमानी है. उसने जैसे सिर्फ देना ही सीखा है, लिकने का नाम ही नहीं लेता. कोई कुछ देना भी चाहे तो उसको मंजूर नहीं, उसने आज तक कोई उपहार भी स्वीकार नहीं किया, और हाँ तुम्हारा अनुमान सही था, तुम्हें जो चिट्ठियां लिखीं गयीं वे सब मैंने नहीं लिखी थीं, बल्कि अहमद के मौसेरे भाई से लिखावी गयीं थीं, इसका मतलब ये नहीं की उसमे मेरी भावनाएं नहीं थी. उसमे सारे जज्बात मेरे ही थे. मैंने जो बोला , वह उसने लिखा. मैंने समझा दिया था की कोई ओवर बात मत लिखना ,
चन्दा- अच्छा, तुम तो बड़े वो हो. चोर कहीं के, मेरी नींद हराम कर डाली है. ऐसे -ऐसे शब्द पत्र में लिखवाये की मैं अपने स्कूल के दिनों में खो गयी, सपने में भी तुम्हें ही याद करती रहती थी.
अजय- मुझे तो नींद भी नहीं आती थी, अगर नींद आती तब न सपने आते, मगर सपनों का भी कहीं आता -पता नहीं होता था, आँखों से कभी बाहर निकलो तब न नीद को जगह मिलती.
चंदा- बड़े छुपे रुस्तम निकले, चेहरे से तो बड़े भोले दीखते हो मगर हो बड़ी पहुँची हुई चीज.
अजय- तारीफ़ कर रही हो या गालियाँ दे रही हो. भाषा कुछ समझ नहीं आ रही ?
चन्दा- बहुत चालू पुर्जे हो जान गयी, हूँ, पहचान गयी हूँ.
अजय- मेरी जान हो तुम, मेरी महबूबा , मेरा पहला और आखिरी प्यार , मेरा मंदिर ,मेरी देवी, मेरे जीने का मकसद सब कुछ तुम हो. तुम हो तो फूल हैं, खुशबू है, रोशनी है ,तुम हो तो जीवन है,तुम नहीं तो कुछ नहीं.












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