- मुझे घुमा -फिराकर बात करने की आदत नहीं है ।आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, एक सवाल है जो मुझे अंदर ही अंदर परेशान किये हुए है। अगर तुम चाहो तो मेरी इस उलझन को कम कर सकती हो।
चन्दा- बोलो न, बेफिक्र होकर बोलो, मैं बुरा नहीं मानूंगी। आज तक तो आपकी कोई बात बुरी नहीं लगी , तो फ्री भला अब क्यों लगेगी । क्या जानना चाहते हो ? अपने जेहन में ऐसे सवाल क्यों पाले हुए हो जो की तकलीफ पहुचा रहे हैं ? ज़रा सोचिये , जब बिना पूछे ही वे इतना दुःख दे रहे हैं तो पूछने के बाद , या उनके जाबाव सुनने के बाद क्या हालत होगी ?फिर भी स्वागत है । पूछिए ।
-जिस तरह आम लड़की की इच्छाएं होती हैं की वे अपने दोस्त के साथ प्रेमालाप करें वैसे तुम्हारी चाहत क्यों नहीं होती ? यह असामान्य स्थिति है और जानती हो इसीको तो बीमारी कहा जाता है ।
चन्दा- आप निश्चिन्त रहें , ऐसा सोचना ठीक नहीं है। मैं स्वस्थ हूँ। मेरी भी इच्छा होती है की आपके साथ प्रेम क्रीडा करू, आप मेरे इन रंगीन होठों का रस प्राप्त करे, मैं तृप्त हो जाऊं । आप हावी हो जाएँ मेरे ऊपर। मुझे देह की सारी संतुष्टि मिले। मगर मेरे कर्तव्य मुझे रोक रहे हैं, जंजीर पडी है मेरे पांवों में । मैं अपनी माँ को दिए वचन से दूर नहीं जा सकती। असामान्य स्थिति वो होती जब मेरी इच्छाएं मर गयी होतीं, लेकिन मेरा तो खूब जी चाहता है।मेरी इच्छाएं तो अनंत हैं।
रंजन- तुम अद्भुत हो, तुम्हारा कोई जबाव नहीं है। ऐसा लगता है जैसे मैं साक्षात देवी को देख रहा हूँ।
चन्दा- प्लीज, ऐसा कहके मुझे शर्मिन्दा न कीजिये । इंसान ही रहने दो , मुझे ऐसा नाम न दो जिसके मैं काबिल ही नहीं हूँ। मुझे इसमें ही काफी खुशी है की मैं तुम्हारी दोस्त हूँ।अगर जौहरी ना हो तो हीरे की पहचान कैसे होगी , तुम तो जौहरी हो रंजन। मैं एक पत्थर ।
रंजन- मेरे मन में अब तुम्हारी इज्जत और भी ज्यादा बढ़ गयी है। अपने आप पर कंट्रोल रखना बहुत मुश्किल होता है और इस मुश्किल काम को तुम बहुत आसानी से कर रही हो । मैं फेन हो गया तुम्हारा , तुम जैसी नारियाँ जिस देश में हैं, वह निश्चित तौर पर महान कहलायेगा .
चन्दा- इतनी बड़ी- बड़ी बातों के काबिल नहीं मैं। क्या कहते हैं , वही ना की यह तो आपकी जरानवाजी है , वरना हम तो ख़ाक है । ख़ाक से भी बदतर ।
चन्दा अतीत की दुनिया में खोई हुयी थी तभी उसे गेट खटखटाने की आवाज आयी। उसने अजय के पत्र को एक तरफ रखा और दरवाजा खोल दिया। वहाँ अहमद खडा था । वह पूछ रहा था-
-मेरे लिए क्या आदेश है मेडम ? क्या कहूँ अजय से जाकर । वह बहुत चिंता कर रहा होगा। काफी देर हो गयी , इसलिए मैंने सोचा की दस्तक देकर जान लूं की आखिर वजह क्या है , शायद आपने जवाबी पत्र लिख लिया होगा ? अगर देर लगेगी तो मैं बाहर खडा होकर इन्तजार कर लूंगा ।
चन्दा- ठीक है , तुम थोड़ा सा इन्तजार और करो मैं जवाब लिखे देती हूँ। चाहो तो यहाँ भी बैठ सकते हो, आराम से बैठो मैं तुम्हारे लिए पानी भिजवाती हूँ, घबराने की जरूरत नहीं है ।
अहमद ने बाहर खडा रहना ही बेहतर समझा, चन्दा अंदर चली गयी , कागज़ कलम लेकर वह लिखने बैठ गयी, काफी देर तक तो वह कुछ सोच ही नहीं पायी । क्या लिखे , क्या न लिखे । फिर सोच सोचकर लिखना शुरू किया-
- प्रिय अजय , हंसता -मुस्कराता , शोखियाँ बिखेरता तुम्हारा पत्र मिला। पढकर उलझन में हूँ। मैं तुम्हारे दिल की भावनाओं की इज्जत करती हूँ। तुम्हारे जज्बातों को समझती हूँ। लेकिन इस बात से भी अनजान नहीं की तुम्हारे पिता ने मेरे ऊपर बहुत एहसान किये है, यह जानलो की तुम्हारे तमाम दावों, वादों , विचारों और आधुनिक सोच के बावजूद सचाई यही है की बहुत कम लोग इसे सच मानते हैं। क्या करोगे , यह दुनिया ही ऐसी है । आप और हम भी इसी दुनिया का हिस्सा हैं। उलझन इस बात की है की जवाब क्या दूं ? कैसे कहूँ की तुमसे प्यार नहीं है ? तुम जैसा चाहने वाला कौन नहीं पाना चाहेगा ? कौन ऐसी अभागी होगी जो तुम जैसे अच्छे लड़के की दोस्तीठुकराएगी ? अच्छा ऐसा करते हैं, इस विषय पर आराम से विचार करते हैं। सोच समझकर कोई निर्णय लेते हैं। कोई ऐसा निर्णय जिससे सब लोगों को खुशी हो ।
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