Friday, September 18, 2009

दिलफेंक पडोसन , भाग-55

सलीम अपने किए पर शर्मिन्दा था, उसकी समझ में यह बात नहीं आ रही थी की वह इन हसीनों के जाल में आख़िर उलझ कैसे गया ... शराब का नशा चढ़ता जा रहा था... सबा के यौवन का आनंद चखने के बाद वह सुध- बुध खोने लगा... नींद के आगोश में समाने लगा... फ़िर क्या हुआ , उसे कुछ याद नहीं... सुबह उसे जब होश आया तो फरहा उसके पास खादी मुस्करा रही थी, सलीम के सर में डेड हो रहा था मगर सबा उसके लिए निम्बू पानी लेकर आ गयी... दस मिनट में ही वह सामान्य हो गया... अब वह खुश था... फरहा कह रही थी-
- मुझे तो दो बीअर में ही नशा हो गया था, मैं तो जाकर सो गयी, मगर तुमने तो यार पूरी बोतल ही हजम करली...
सलीम- शर्त तो तुम्हीं ने लगाई थी... मेरी क्या हालत हो गयी , क्या बताऊँ... मुझे कुछ दिख ही नहीं रहा था... सोते समय भी लगता था जैसे आसमान धरती पर आ गया हो... बहुत बुरा हाल था...
सबा- तो किसने कहा है इतनी पीने के लिए... मैं तो बड़ी मुश्किल से जा पाई, ना तो तुम सो रहे थे और ना ही मुझे सोने दे रहे थे... ऐसा होता है क्या ? साली हूँ मतलब रात भर साथ में सुलाओगे... मजाक ठीक है....
सलीम- सोरी यार... मुझे लगता है मैं कुछ ज्यादा ही बहक गया था... तुम लोगों ने ही बहकाया मुझे... तुम भी कम गुनाहगार नहीं हो... समझे...अकेले मेरे का ही दोष नहीं है...
फरहा- जो हुआ सो हुआ ... अगर हम लोग जगाने नहीं आयें तो तुम जागने वाले भी नहीं थे ...
सलीम ये बात सही है... रात मैंने अजीब-अजीब चीजें देखीं, शायद वह सपना था... इतना ज्यादा नशा था की सपने और हकीकत में कुछ अन्तर ही समझ नहीं आ रहा था... सुनोगी तो बुरा मान जाओगी तुम...
फरहा- तुम मेरे हमदर्द हो, हमसफ़र हो, हमराज भी हो... मैं तुम्हारी बात का बुरा कैसे मान सकती हूँ... कहो न...
सलीम- ज्यादा नशे की हालत में मुझे लगा जैसे की तुम दरवाजा लगाकर बीच वाले रूम में किसी गैर मर्द के साथ रंगरेलियां मना रही हो... मैं परेशान हो गया... दिल धड़कने लगा था...
सबा- हाँ, तुम मुझे भी ऐसा ही कुछ बता रहे थे मगर दरवाजा खुला था... कहीं कुछ नहीं था... दीदी अपने घर सोयी हुई थीं... आप समझ ही नहीं पा रहे थे की असलियत क्या है ...सोये हैं की नशे में हैं....
सलीम - बिल्कुल ठीक कह रही हो तुम... मुझे बहुत शर्मिंदगी हो रही है...
फरहा- कोई बात नहीं सलीम... चलो अब फ्रेश हो जाओ... आज भी स्कूल नहीं गए तुम...
सलीम - उसकी तो कोई चिंता नहीं है... नहीं जाता हूँ तो भी मेरी उपस्थिति दर्ज हो जाती है...सेटिंग के लोग हैं...
फरहा - फ़िर भी ड्यूटी आख़िर ड्यूटी ही होती है... सही है न...
सलीम हाँ में सर हिलाता हुआ नित्यकर्म के लिए निकल गया... जब तक वह फ्रेश होकर आया तब तक तो फरहा उसके लिए स्वादिष्ट इडली बनाकर लेआयी थी, सबा उसकी मनपसंद अंडे की आमलेट लेकर आयी थी...
सलीम ने उन दोनों के साथ नाश्ते का जमकर लुत्फ़ उठाया ... फरहा पूछने लगी-
- रात को मेरी गैरमौजूदगी में तुम दोनों जीजा साली ने कोई ऐसा -वैसा काम तो नहीं किया.... बता देना मुझे...
सबा- आप भी कमाल करती हैं, इनको पहले से ही गुलाम बना लिया है आपने... अब ये किसी दूसरीलड़की की तरफ़ आँख उठाकर देख भी नहीं पायेंगे... इतना नहीं डराना चाहिए आदमी को...
फरहा - बहुत शातिर हो गयी है तू... मुझसे भी मजाक करने लगी है...
सबा- अगर आपसे मजाक नहीं करुँगी तो किस्से करुँगी ? आप तो हैं ही ऐसी चीज,। दीदी भी , दोस्त भी...
सलीम उनकी बात भी सुन रहा था और स्नान भी कर रहा था... इस कारण उसे रात की सारी बातें याद आने लगीं, वो सबा का कातिल बदन... गदराया हुआ यौवन... उसकी प्यार करने की अदा ... वह मन ही मन मुस्काने लगा... अब उसे समझ में आया की वह कितना सौभाग्यशाली था, कुछ देर पहले अपने आपको कोसने वाला सलीम अब इस बात से खुश था की उसको नई बीवी भी मिलने वाली थी और साली भी...


















No comments: