Sunday, September 13, 2009

दिलफेंक पडोसन, भाग-50

फ़िर मैं अपने जीजू को सस्ते में कैसे छोड़ सकती हूँ ? लाओ , अब मैं अपने हाथों से इनको मदिरापान कराउंगी, मुझे पहले से पता होता तो मैं अब तक खूब मजाक करती , साथ में मौज मस्ती भी...
फरहा- देर आए दुरुस्त आए, अब बता दिया है तो अब सही... मुझे लगता है तुम्हें और बीअर की जरूरत पड़ेगी...
सबा- हाँ, मगर जीजू तो कंजूसी दिखा रहे हैं, ऐसे ऑर्डर दे रहे है९न जैसे दवा का ऑर्डर दे रहे हों...
सलीम- मान गए साली जी, हाजिरजवाबी में आपका कोई जवाब नहीं है, मैं अभी मंगवा देता हूँ... फ़िर जितनी चाहे पीना... आज देखते हैं कौन कितना पीताहै... लेकिन कोई पीने के बाद नाटक नहीं करेगा... कहते हैं ना की बाद अच्छा बदनाम बुरा होता है... कहीं ऐसा ना हो की पीने के बाद तुम यहाँ पर हंगामा करो और बदनामी हो जाए...
फरहा- तुम दरो मत... ऐसा कुछ नहीं होगा, मेरी जिम्मेदारी है... कितना भी पीने के बाद होश में रहना भी एक कला है , जिसे हम भली भाँती जानते हैं... समझे........आज का समय पहले वाला नहीं है, आजकल हमको एलर्ट रहना पड़ता है, लड़कों के कंधे से कंधा मिलाकर काम करना पड़ता है...
सलीम- हाँ, जरूरी है... तरक्की के लिए बराबरी जरूरी है, यही है आधुनिकता ... अच्छा है...
सबा- क्यों क्या हुआ ... जोर का झटका लगा क्या ? लडकियां जब आप जैसे मर्दों की बराबरी करें तो ऐसा ही होता है... हम इक्कीसवी सदी की महिलायें हैं, मर्दों से हर मामले में आगे रहने की तमन्ना है, पढाई हो या खेल कूद, पीना हो या खाना , प्यार हो या डिस्कोथेक ... सबमे आगे रहेंगे तभी जिन्दगी में तरक्की कर पायेंगे ...
सलीम सोच में पड़ गया... सबा और उसकी उम्र में काफी फासला था , अब पहली बार उसकी समझ में जनरेशन गेप का अर्थ आया... उसने होटल में बीअर का ऑर्डर दिया और सोचने लगा की तरक्की की चाह में युवा पीढी के लोग किस तरह शोर्ट कट का इस्तेमाल कर रहे हैं... वह पीने के बावजूद सब कुछ समझ रहा था... सबा ही ज्यादा बोल रही थी मगर फरहा जितना भी बोलती , वह सभालकर बोला करती थी... वह जानती थी की अगर जुबान फिसल गयी तो सलीम उसके बारे में कुछ अलग ही अनुमान लगा सकता है... जब होटल से उनका मंगाया सामान आ गया तो सबा ने अपने लिए तो पैग तैयार किए ही साथ ही फरहा और सलीम के लिए भी पैग बनाए ... सलीम जब शराब पीता था तो उसको सिगरेट की तलब लगती थी ,जब उसने सिगरेट के धुंए उडाने शुरू किए तो फरहा और सबा भी कैसे पीछे रहतीं , उन्होंने भी सलीम का जमकर साथ दिया, अगला पैग पटियाला था उसे पीते ही सलीम झूमने लगा, उसको सुरूर होने लगा था... मन के अन्दर तरंगें सी उठने लगीं... जब वे दोनों शराब का स्वाद ले रहे थे ठीक तभी फरहा के मोबाइल की घंटी बजी... व्यस्त का बहाना बनाकर फरहा ने फोन डिस्कनेक्ट करा दिया, अब के मन में यह बात घूमने लगी की कहीं यह फोन किसी ग्राहक का तो नहीं था... उसका जी चाहा की इस बारे में वह फरहा से पूछताछ करे लेकिन हिम्मत नहीं हुई... इसके अलावा वह मदहोश भी होने लगा था... फरहा और सबा के कपड़े अस्त -व्यस्त हो रहे थे... वे तीनों पलंग पर बैठकर मदिरापान कर रहे थे, पैग में पानी डालने के लिए जब सबा नीचे झुकती थी तो उसकी दोनों गोलाइयां आजाद होकर अठखेलियाँ करने लगती थीं... सलीम की निगाह जैसे ही उन पर पड़ती , वह उन्हें छूने , चूमने और मसलने के लिए बेताब हो जाता था... दिल में धमाके से होने लगे, एक तो शराब का बढ़ता असर और ऊपर से दो-दो नवयौवनाओं का साथ, वह बेहद कामुक होता जा रहा था... कामोत्तेजना का ज्वर इतना तेज था की अब सलीम ने कहना शुरू किया-
- आज तो खुदा खैर करे, तुम दो और मैं अकेला हूँ... ना जाने कैसे जीतूंगा... देखा जायेगा, मगर तुम लोग भी देखना , ऐसे माहौल में अक्सर कोई गलती हो जाती है... अगर मुझसे भी ऐसा ही कुछ हो जाए तो बुरा मत मानना...
सबा- अभी से डरने लग गए... ठीक भी है, डरना जरूरी है... आज तक जीतते आए हो तो अब हार भी गए तो क्या होगा ? कभी- कभी हारने की आदत भी लगनी चाहिए... आज हम दोनों बहने आपको हराकर ही दम लेंगी, और मैं अपनी बहन को हरा दूंगी... मेरी बहन मुझे अनजान समझती है, मैं आज तुम्हें पटाने वाली हूँ... अपना दिल संभाल कर रखना , मुझ पर आरोप है की मैं लोगों को पागल बना डालती हूँ...
सलीम- आज हम भी देखेंगे की क्या होता है ? जीत किसकी होगी और हार किसकी ? वैसे इतना तो मैं भी जान ही गया हूँ की जीत भले ही किसीको हो लेकिन हार मेरी ही होगी... मैं सरेंडर कर चुका हूँ...

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