उन दोनों का वार्तालाप काफी लंबा हो रहा था , साथ ही उनके विचारों में भी ज्यादा कामुकता आती जा रही थी... फरहा बेचैन थी, फ़िर भी सलीम की बातों को वह बहुत गौर से सुन रही थी... उसे खूब सुख भी मिल रहा था, दिल में तरह-तरह के भाव उमड़ रहे थे... जो व्यक्ति शादी से पहले ही उसको इतना सारा प्यार दे सकता है, इतनी सुख सुविधाएं दे सकता है... शादी के बाद वह क्या नहीं कर सकता... फरहा अब सलीम के बारे में इस तरह की बातें सोच रही थी... सलीम ने उसको जितना आर्थिक फायदा पहुचाया था, उस बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं था... इस वक्त सलीम भी उत्तेजना के आगोश में पूरी तरह से जकडा हुआ था... वह किसी भी हालत में फरहा पर हावी होना चाहता था, उसके दिल में तमाम तरह की उमंगें उमड़ रही थीं... वह कहने लगा-
- जबसे तुम मेरी जिन्दगी में आई हो तभी से कुछ अजीब सी हलचल हो रही हैं... सचमुच क्रान्ति आगई है... जीवन एक नया आकार लेता जा रहा है, एक नई सुबह सी हो रही है...
फरहा- ये सब जो भी हो रहा है, वह पोजिटिव है या नेगेटिव?
सलीम- पोजिटिव ही ज्यादा है यार... क्यों ऐसी हारी थकी बात कर रही हो ? एक नई दुनिया दिखादी है इस मोहब्बत ने, इससे पहले हमको क्या मालूम था, प्यार करने के बाद ही जान पाया हूँ...
फरहा- मैंने भी तुम्हें पाकर जाना की प्यार क्या होता है, दीवानगी क्या होती है ? इससे पहले मैंने भी चंचल तितली की तरह उडती हुई मदमस्त जिन्दगी देखी है...उस वक्त दूर-दूर तक कहीं भी गम का कोई नामोनिशान नहीं था...अब तो हर घड़ी , हर पल बस तुम्हारी ही याद है, तुम्हारा ही ख्याल है....
सलीम- तुम्हारा नाम तो मेरे जिस्म के हर हिस्से में लिख चुका है... एक पल भी नहीं दिखाई दीं तो जीना हराम हो जाता है... ऐसा लगता है जैसे सारी दुनिया से मेरे सम्बन्ध टूट चुका है...
फरहा- मेरे साथ भी कुछ दिनों से यही हो रहा है... डर जैसा लगता है कहीं हम दूर ना हो जाएँ... किसीकी बुरी नजर हमारी मोहब्बत को न लग जाए,
सलीम- ऐसी अशुभ बातें मत कहो फरहा ... किसी बुरी चीज में इतनी शक्ति नहीं जो वह हमारी पवित्र मोहब्बत पर भारी पड़ जाए... मैंने सुना है की अगर प्यार सच्चा हो तो सबको झुकना पड़ता है...
फरहा- चाहे कोई झुके या ना झुके बस हमारा प्यार नहीं झुकना चाहिए... सब लोग खुश रहें दुखी हम भी न रहें...
सलीम- ये बात हुई ना... ऐसे विचार पसंद हैं मुझे... इनको क्रांतिकारी मगर समर्पित होने वाले विचार का नाम दिया जा सकता है... मुझे ये प्रिय हैं...
फरहा अब मंजिल पर जाने के लिए बेताब हो चुकी थी... उसे सलीम की बातें तो अच्छी लग रही थीं मगर चाह रही थी की वह बात भी करता रहे और असली काम भी... वह काम जिससे उसे स्वर्गिक सुख मिलता है... जिससे वह अपने आपको दुनिया की सबसे सुखी लड़की महसूस करती है... सलीम भी होशियार था, फ़ौरन उसकी भावनाओं को जान गया और उसके हसीं जिस्म को चूमने लगा, मन में एक बार फ़िर उत्तेजना की आंधी चलने लगी... वह सलीम के ख़ास अंग को जोर -जोर से सहलाने लगी... उसके तन और मन सुलगने लगे थे... सलीम कह रहा था-
- क्या बात है मेरी जान, अब मेरी बातों में मजा नहीं आ रहा है क्या ?
फरहा- सिर्फ़ भाषण से काम नहीं चलता, राशन की भी जरूरत पड़ती है... भूखे भजन न होय गोपाला , यह लो अपनी कंठी माला ... यह कहावत तो आपने सुनी ही होगी...
सलीम- फ़िक्र मत कर मेरी जान... तुझे सुख तो दूंगा मगर लंबे समय तक उसका एहसास होना चाहिए, इस समय तुम्हारी उत्तेजना जितनी बढेगी , बाद में सुख भी उतना ही बढेगा... खूब आनंद मिलेगा...
फरहा- अगर ऐसी बात है तो मैं खामोश हो जाती हूँ... अब तुम्हारी इच्छा है... जब चाहो , जो चाहो वैसा करना...
सलीम ने फरहा की पहाडियों को दबाना शुरू कर दिया... उसके जिस्म से चट्टान सी खिसकनी शुरू हो गयी, जी में आया की वह उसे दवा की तरह पानी में घोलकर पी जाए... कुछ ही क्षणों बाद दो जिस्म एक हो गए... काम ज्वाला धधकने लगी... इसको बुझाने का उपाय सलीम अच्छी तरह जानता था, और जब उसने उपाय किया तो फरहा सचमुच मान गयी ... वह खुश थी, उसने सलीम को अपनी बांहों में इस तरह से कैद कर लिया मानो कहीं निकल ना जाए... सलीम भी खूब जोर -जोर से प्रहार कर रहा था... वह चाहता था की फरहा को उसकी शक्ति का हमेशा एह्ज्सास रहना चाहिए , वह अगर उसकी मर्दानगी से खुश रही तो उसे छोड़कर नहीं जा सकती... उसको यह फोर्मूला एक बुजुर्ग व्यक्ति ने बतलाया था...
Sunday, September 6, 2009
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