Friday, September 25, 2009

जीजा जमींदार , भाग-02

दीप्ति उसकी बातों को बड़े ध्यान और चाव से सुन रही थी,स्वीटी विदेश में भी पढ़ी थी, इसलिए नए- नए आइडिया वह अच्छी तरह से समझ लिया करती थी, उसने जौनपुर के इस गाँव में सेक्स सलाहकार सेंटर खोलने का निर्णय भी इसी आधार पर लिया था,उसे अपने जीजा के साथ बहुत लगाव था, जब उसकी दीदी की शादी हुई तो दीप्ति काफी छोटी थी। जब उसकी दीदी पहली बार ससुराल से आई थी तो अपने साथ वाली लड़कियों को उसने अपनी सुहागरात से जुडी मधुर स्म्रतियां सुनाई थीं, वह जब अपने पति की ताकत का बखान करती तो उसकी सहेलियां दांतों तलेउँगलियाँ दबा लिया करती थीं, दीप्ति यह सब चुपचाप सुन लिया करती थी। सुहागरात की बात सुनते ही वह भी भविष्य की सुंदर कल्पनाओं में खो जाती . इसके बाद वह पढने के लिए आस्ट्रेलिया चली गयी मगर अपने जीजा को नहीं भूल पाई, उसके मन में यह हसरत फल फूल रही थी की एक दिन वह भी अपने जीजा के साथ वह मजा लेगी जो उसकी दीदी लिया करती है। और फ़िर जब वह अगली बार गाँव आई तो उसकी यह इच्छा पूरी हो गयी, उसकी दीदी गर्भवती थी, उसकी देखभाल करने के लिए उसका जीजा दीप्ति को भी अपने साथ ले आया।उसकी दीदी अस्पताल में भारती थी, रात को १२ बजे तक वह अस्पताल ही रहा मगर फ़िर अपनी माँ को पत्नी के पास छोड़कर वह सीधा घर चला आया, घर पर दीप्ति अकेली थी।, वह बाथरूम में नहा रही थी, उसका बाथरूम से निकलना हुआ और उसके जीजा का आना हुआ। दोनों की निगाह एक दूसरे से मिलीं और फ़िर दीप्ति मुस्करा गयी, उसका जीजा भी आशिक मिजाज था, नाम भी ऐसा ही था- मजनूँ। मजनूँ उसका असली नाम नहीं था, उसकी आदतों को देखते हुए लोग उसको मजनूँ कहने लगे थे . मजनूँ ने दीप्ति की सुन्दरता को निहारते हुए कहा-
- क्या हो रहा है , किसको दुनिया से हटाने का प्लान बनाया है ? आज तो बिजली नहीं डायरेक्ट क़यामत बरपाने का काम कर रही हो। सच दीप्ति, तुम तो तुम्हारी दीदी से बी ही खूबसूरत लगती हो।
दीप्ति- रहने भी दो क्झूथी तारीफ़, सब जानते हैं हम। आज जब दीदी यहाँ नहीं है, इसलिए तुम ये मीठी-मीठी बातें बना रही हो वरना उनके सामने तो भीगी बिल्ली बन जाते हो, एक बोल तक नहीं फूटता . देखते तक नहीं।
मजनूँ- अच्छा जी , ये शिकायत है ? तब तो ठीक है, आज से हम सिर्फ़ और सिर्फ़ तुमको ही देखा करेंगे... विदेश में कोई यार दोस्त बनाया की नहीं ? सूना है बहुत खुलापन है वहां ?
दीप्ति- दोस्त तो बहुत सारे थे मगर अपनापन कहाँ , अपना तो अपना ही होता है। तुम ठहरे अपने।
मजनूँ- ठीक कहती हो यार , मैंने कभी ध्यान ही नहीं दिया. गलती मेरी है , अब इस गलती में सुधार कर लूँगा।
और इसके बाद तो मजनूँ ने बाकायदा दीप्ति को अपने बाहुपाश में जकड लिया और उसके होठों पर एक चुम्बन जड़ दिया, हतप्रभ रह गयी दीप्ति। उसे अपने आपको छुडाने का असफल प्रयास किया मगर यह नाकाफी साबित हुआ। दीप्ति कसमसाने लगी , अपने आपको छुडाने की गुहार लगाने लगी-
- मुझे छोड़ दो प्लीज, कोई देखेगा तो क्या कहेगा।
मजनूँ- कोई कुछ नहीं कह पायेगा। आज की रात यहाँ पर सिर्फ़ हम और तुम हियो रहेंगे, अब जब तक तुम्हारी दीदी अस्पताल में है तब तक हम जीजा साली मौज मनाएंगे।
दीप्ति - दीदी बहुत खतरनाक है , जब उसे पता चलेगा की तुमने मेरा चुम्बन लिया था तो वह तुम पर और मुझ पर शक करने लगेगी। जानते हो क्या होगा इसका अंजाम ?
मजनूँ- तुम सिर्फ़ चुम्बन की बात करती हो । अब वह सब होगा जो तुम्हारी दीदी और हम किया करते थे।
दीप्ति- छि... शर्म नहीं आती तुम्हें?
मजनूँ- इसमे शर्माने की कौन सी बात है, मैं तो तुम्हारा अपना ही हूँ ना... अपना दोस्त समझो मुझे ।
दीप्ति- मुझे बहुत डर लग रहा है। तुम्हारी आंखों में लाल- लाल डोरे दिखाई दे रहे हैं। कहीं शराब पीकर तो नहीं आए ? मुझे कुछ इसी तरह का डाउट हो रहा है।
मजनूँ- जब तुम जैसा मयखाना सामने हो तो नकली माय से कौन हाथ लगायेगा।
दीप्ति- इसीलिए लोगों ने मजनूँ नाम रखा है तुम्हारा , मजनूँ जैसी बातें जो करते हो।

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