तुम्हारे अलावा कोई भी मुझे असली मजा नहीं दे पाता... पता नहीं क्या जादू है तुम्हारे पास... एक टीचर से मेरी नई -नई दोस्ती हुई है, जब वह मेरे साथ सोता है तो ऐसा लगता है जैसे कोई बच्चा सो रहा हो... मन मारकर रहना पड़ता है... मुझे तुम जैसे फौलाद बदन का इंसान ही सुख संतुष्टि प्रदान कर सकता है...
और इससे आगे के शब्द सुनना और उन्हें सहन करना सलीम के वश की बात नहीं थी... वह गैर मर्द के पहलू में आकर उसकी मर्दानगी को चुनौती दे रही थी... वह उस आदमी के बारे में सोचने लगा जो उसके साथ रंगरेलियां मना रहा था, कौन हो सकता है वो ? क्या वह उसका दोस्त था या ग्राहक या फ़िर कोई दलाल ? फरहा ने देखा होगा की जब मैं रात भी घर नहीं आया तो अब शायद नहीं आऊंगा , इसी कारण वह अपने यार के साथ मौज मस्ती लूट रही है ... उसने क्या कुछ नहीं किया था फरहा के साथ, उसे दौलत दी, प्यार दिया... उसका जीवन एक ही झटके में संवार दिया और फ़िर उसी फरहा ने उसको प्यार का ऐसा बदला दिया... उसके पाँव से जमीन खिसकने लगी... ऐसा महसूस होने लगा जैसे उसे सरे बाजार नग्न कर दिया गया हो... अब वह और जयादा देर तक नहीं ठहर सकता था, वह धीरे से खिसकने लगा, दरवाजा खोला और पहले की तरह बाहर से कुंडी लगादी... इसके बाद वह चोर कदम चलता हुआ अपने फ्लेट में आ गया... अब वह फरहा के घर से आने वाले या जाने वालों को अच्छी तरह से देख सकता था... उसकी साँस फूली हुई थी, मन के अन्दर तूफ़ान उठा हुआ था, ना चाहकर भी वह फरहा के साथ बिठाये पलों को याद करने लगा... उसने वैसे तो अपना दरवाजा बंद कर रखा था मगर निगाह की होल पर थी, उस होल से फरहा के दरवाजे पर अच्छी तरह निगाह रखी जा सकती थी... वह जानना चाहता था की आख़िर फरहा के साथ कौन सहवासरत है ? फरहा आख़िर किसको फौलाद समझती है ? वह इन्हीं विचारों में मगन था की उसे सामने वाला दरवाजा खुलता हुआ दिखाई दिया, सलीम के दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं... जी चाहा की सामने वाले को गोली मारदे भले ही फ़िर फांसी क्यों ना हो जाए, मगर वह तो टीचर था कभी किसीसे झगडा भी नहीं किया , किसीसे दुश्मनी भी नहीं की... हथियार का तो सवाल ही नहं उठता था... अगर लाइसेंसी हथियार भी होता तो वह आज उसका इस्तेमाल कर लेता... वह निचली मंजिल पर रहने वाला एक पुलिसकर्मी था जो फरहा के साथ हमबिस्तर था और सलीम ने उसे अपनी आंखों से देख लिया था, वह फरहा को तो पहचान गया था मगर मर्द को नहीं ... अब देखा तो उसकी हैरत का ठिकाना नहीं रहा... फरहा तो आस्तीन का सांप निकली... वह प्यार उससे करती थी और सम्बन्ध किसी और से भी बनाती थी, वह जिस घनिष्ठता के साथ उससे बात कर रही थी उससे लगता था मानो वे दोनों एक दूसरे को पहले से ही जानते थे और पहले से ही सम्बन्ध बनाते रहे होंगे....उसके जाने के बाद धडाम से दरवाजा बंद हो गया... वह गुस्से में आग बबूला हो रहा था... उसने पास के होटल से शराब की बोतल और चखने का ऑर्डर दे दिया... जब तक उसका ऑर्डर आया तब तक वह ककडी और गाजर काटने लगा... वेटर ने बेल बजाई तो वह दरवाजा खोलने लपका , ठीक तभी उसे फरहा बाहर से आती दिखाई दी... उसके बेल बजाने पर उसकी बहन ने दरवाजा खोला था... उसकी बहन भी हूबहू उसके जैसी थी, वह घर के अन्दर से निकल रही थी, सलीम परेशान हो गया, यह नजारा उसकी समझ से परे था... उसको अपनी आंखों पर यकीन नहीं आ रहा था... सलीम को दरवाजे पर देखकर फरहा भी उसीके फ्लेट में आ गयी और उससे लिपटकर बोली-
- थेंक्स गोड.... सब कुछ ठीक है न ? मैं तो डर ही गयी थी... मैंने सोचा था की कहीं कुछ अनहोनी ना हो गयी हो... इसीलिए मैंने तुम्हें हर जगह पर ढूढा ... मैं अभी तक घर में भी नहीं घुसी , पुलिस स्टेशन से ही चली आ रही हूँ, कुछ लोगों ने सलाह दी की भले ही लिखित शिकायत मत करो मगर मौखिक रूप से पुलिस को बताना जरूरी है...
सलीम- और यह तुम्हारे घर में कौन है ?
फरहा- मेरी बहन है... बिल्कुल मेरे जैसी है ना ... सब लोग इसे देखकर यही कहते हैं...
सलीम- ओह... क्या करती है तुम्हारी बहन ? पढ़ती होगी ?
फरहा- वो सब बातें बाद में होंगी, पहले तुम अपनी सुनाओ , अआखिर्कार क्या हो गया है तुम्हें ? क्यों ऐसे अचानक गायब हो जाते हो ? फोन भी नहीं करते , अपना मोबाइल भी बंद करके रखते हो... आख़िर दिक्कत क्या है ? कर्ज उतारने की बात तो मैं पहले ही कर चुकी हूँ, मैंने पापा से इस बारे में बात भी की है, पैसों का इंतजाम हो जाएगा...
सलीम उसकी तरफ ऐसे निहार रहा था जैसे दिन में तारे देख रहा हो...
Friday, September 11, 2009
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