बेवफा खंडहर वाली , भाग-8
अभिप्रिय - जी नहीं, आपको देखने का शौक है. मैं तुम्हें देखने के लियी ही बार-बार ट्रेवल कर रहा हूँ. आपसे वहाँ तो मन की बात कह नहीं पाया. सोचा यहाँ तो मिलोगी . इसलिए पीछा करता -करता यहाँ चला आया .
क्या मेरे साथ खाना खाना चाहोगी ? मेरी लाइफ ही चेंज हो जायेगी .
किरण- ठीक है. यह मेरा भी सौभाग्य है. मगर आज यह संभव नहीं हो पायेगा . डिनर कर चुकी हूँ.
अभिप्रिय- कोई बात नहीं. एक मग कोफी तो पी सकती हैं न , मेरा भी कहने का आज मूड नहीं है. डिनर फिर किसी दिन , आज सिर्फ कोफी से काम चला लेंगे .
किरण- अभी मेरी गाड़ी आने वाली होगी, मेरा शिड्यूल गडबड हुआ तो तकलीफ हो जायेगी , मैं गुडगाँव रहती हूँ.
अभिप्रिय - कोई दिक्कत नहीं, मैं आपको इज्जत से घर तक छोडूंगा, यह प्रेशर नहीं प्रार्थना है. आगे आपकी इच्छा . फिर कोई दिन भी मिलना चाहती हैं तो वैसा भी कर सकते हैं. बस ये है कि बड़ी तकलीफ हो जायेगी ,
जब तक मिल नहीं लूंगा तब तक चैन नहीं आएगा , नींद नहीं आयेगी . मैं तब तक खा नहीं पाउँगा , कुछ पी नहीं पाउँगा .
किरण- तुमने जब इतनी मासूमियत से प्रार्थना कर ही दी है तो ऐसा करते हैं कि चलो मुलाक़ात कर ही लेते हैं. आप खाना खा लेना और मैं कुछ सलाद वगैरह ले लूंगी .
सूरज- बन्दा खुश हो गया होगा, उसकी खुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा होगा ? आखिर उसे मुंह मांगी मुराद जों मिल गयी .
किरण- हाँ, अरे खुश की बात कहते हो, पट्ठा की बांछें खिल गयी, बीच रोड पर नाचने लगा था. मैं उसके भोलेपन पर फ़िदा हो गयी. यह पहली बार था जब मेरा सीना गर्व से फूल उठा. मै जानती थी कि सुन्दर हूँ, बहुत सारे
साथी भी अक्सर मेरे हुस्न की तारीफ़ करते रहते थे लेकिन यह पहली बार हुआ जब कोई लड़का मेरी सुंदरता के सामने नतमस्तक हो रहा है. [प्राकृतिक तौर पर हम महिलाओं का स्वभाव कुछ घमंडी जैसा होता है. और इस पर
हमारे पास अगर कोई विशेष योग्यता हो तो यह और भी बढ़ जाता है. मेरा हाल भी कुछ ऐसा ही हुआ. मैं अपने सामने सबको बौना समझने लगी. लगा जैसे कि दुनिया में सब मेरे पीछे हैं और मैं सबसे आगे हूँ. लगा जैसे
शान से खड़े हुए पद अचानक दौड़ने लगे हैं. खेतों में चार रही मूक भेड बकरियां सहसा बात करने लगी हैं. वे इंसानों की जुबान बोल रही हैं. मन में तरह -तरह के विचार आने लगे. मैं चुम्बक की तरह उसकी तरफ खिचती
चली गयी. उसकी गाड़ी पार्किंग में खड़ी थी मगर मैं वहीं पर खड़ी रही,गाड़ी ड्राइव करते हुए वह खुद आया . बहुत मंहगी गाड़ी थी. वह देश के चुनिदा लोगों के ही पास थी, उसके बारे में मैंने एक अखबार में पढ़ रखा था.
उस लड़के के साथ मैंने पहली बार सहवास किया. और बहुत मजा भी आया .
सूरज- क्या कहती हो ? उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध ? खैर, कैसे हुआ यह सब ?
उसने गाड़ी एक फैव स्टार होटल में ली. हमने वहाँ पर एक -एक कोफी पी. मगर मैंने महसूस किया कि मेरा सिर भारी होने लगा था. मेरा बदन अकड रहा था. कुछ ही देर में मैं उत्तेजक होने लगी. मतलब कि कोफी में कुछ मिलाया
गया था. यह सब मादक पदार्थ मिलाए जाने के कारण हो रहा था. मेरी सीना धड़कने लगा . ममें अंगड़ाई लेने लगी. उसने मेरे अंगों की तारीफ करनी शुरू की -
- तुम्हारी ये गोलाइयां बड़ी कातिल हैं, इन्हें स्पर्श करने को जी चाहता है.
किरण- तुम्हें शर्म नहीं आती ? कैसी गंदी बातें करते हो ? क्या मुझे यहाँ पर इसीलिए बुलाया था ?
अभिप्रिय-इसमें झिझक या शर्मो हया जैसी कोई बात ही नहीं है. बल्कि यह तो प्यार वाली बात है. मैं तुमसे प्यार करता हूँ , तभी तो तुम्हरा प्रत्येक अंग मुझे अपनी तरफ खींचता है. ये गुलाबी होठ, ये नशीली आँखें , ये घटाओं जैसे बाल
ये सबके सब मेरा मन मोहते हैं. जब तुम हँसने के लिए अपना मुंह खोलती हो तो सुन्दर दांत दिखाई देते हैं. ये मनमोहक दांत मन की गहराइयों को सुहाते हैं.
किरण- तुम मुझे शर्मिन्दा कर रहे हो ? मैं अकेली नहीं हूँ दुनिया में ऐसी लाखों -करोड़ों हैं.
अभिप्रिय- होंगी , मगर मेरी पहुँच से बाहर हैं. मैंने तो आज तक तुम जैसी खूबसूरत हसीना को नहीं देखा.
किरण- अब मैं चलना चाहूंगी , मुझे गुडगाँव छोड़ दीजिए.
अभिप्रिय- क्या सचमुच जाना चाहोगी ? या उससे पहले मेरे साथ डांस करना पसंद करोगी ? सब लोग डिस्को में थिरक रहे हैं. थोड़ी देर हम भी इंजॉय करलें तो भूख भी लगने लगेगी, नाचना तो सेहत के लिए लाभदायक रहता है .
किरण- मुझे कुछ होगा तो नहीं न ?
अभिप्रिय- कुछ क्या होगा ? हुआ तो लड़का ही होगा या फिर लड़की . इन दोनों के अलावा और कुछ नहीं.
किरण- तुम बहुत वो हो . शरारती कहींके... हटिये , मैं चली.
अभिप्रिय- ऐसे कैसे जाओगी मेरी जान. तुम खुद भी मेरे साथ मौज मस्ती करने का मन जों बना चुकी हो. ऐसे में जा नहीं पाओगी .
Friday, December 31, 2010
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