तन्हाई -२
सलीम- हाँ, और आशावादी होने के लिए संयमी होना बहुत जरूरी है. हर कदम पर धैर्य की जरूरत पड़ती है. आप अपना फोन नंबर तो देने से रहीं .
शालिनी- बिलकुल सही अनुमान लगाया . मैं आपको अपना नंबर नहीं दूंगी , आज की जों दुल्हन है यह मेरी सहेली है. वह भी इस मामले में आपकी मदद नहीं कर पायेगी.
सलीम- अच्छा तो ये आपकी सहेली हैं ? आज का जों दुल्हा है , यह मेरा दोस्त है , अभिषेक . और वो आपकी सहेली . वाह क्या कोम्बीनेशन है ?
शालिनी - क्या तुम पहले से कोई गर्ल फ्रेंड रखते हो ?देखो, झूठ मत बोलना. यह हमारी पहली मुलाक़ात है . और पहली मुलाक़ात में तो किसी भी सूरत में झूठ नहीं बोलना चाहिए .
सलीम- मेरी फ्गार्ल फ्रेंड है न . लेकिन वह मेरी यादों में है, मेरे दिल में है, दिमाग में है और उसकी तस्बीर मेरे सामने है. अब से पहले क्पोई ऐसी लड़की जांची ही नहीं जिसके साथ दोस्ती की जा सके.
शालिनी- सब लड़के आजकल यही डायलोग मारते हैं. कोलेज में खूब मस्ती छानते हैं और जब कोई लड़की मिले तो शेखी बघारते फिरते हैं, साधू बने फिरते हैं.
सलीम- मेरी ऐसी कोई मजबूरी नहीं है. मैं आपको अपनी गर्ल फ्रेंड मान चुका हूँ.
शालिनी- अरे , अरे रुकिए ऐसा गजब न करिये. इससे आपका कोई भला होने वाला नहीं है. मैं आपकी दोस्त-वोस्त नहीं बन सकती.
सलीम- आज भर के लिए तो दोस्त हो न ?तो आज को हम दुश्मनी में क्यों बिताएं ? आज तो कुछ खास होना चाहिए . खास का मतलब है कि आप मेरे साथ डांस कर सकती हैं. हम दोनों एक दुसरे को खाना
खिला सकते हैं, साथ में पिक्चर देखने जा सकते हैं. ऐसा कुछ भी कर सकते हैं, जों दो गहरे दोस्त करते हैं.
शालिनी- माफ कीजिये सलीम साहब. मैं शालिनी हूँ आपकी अनारकली नहीं हूँ. हमारी क्षण भर पहले ही मुलाक़ात हुई है. यह ऐसी मुलाक़ात भी नहीं कि मै आप पर भरोसा करके थियेटर देखने जा सकूं .
सलीम- कभी-कभी पल भर में ही तकदीर बदल जाती है और कभी-कभी ऐसा होता है कि बरसों निकल जाते हैं और कुछ नहीं हो पाता. यह समय-समय की बात है. दुल्हन आपकी सहेली है और दुल्हा हमारा
पक्का यार है. यहाँ तक कि आपकी सहेली जी भी हमें जानती हैं, फिर हम अनपहचान कैसे हुए ?
शालिनी- ये सब आप कह रहे हो न, मैं तो नहीं जानती. मैं कैसे मानूं कि आप जों कह रहे हैं वो बिलकुल सत्य है ?
सलीम- अपनी सहेली से पूछ लों, मेरे बारे में सब बता देगी. और मेरे सामने नहीं , मेरे बाद पूछो , मुझे कोई ऐतराज नहीं. चाहो टा भिषेक से पूछलो.
शालिनी- दुल्हन को सांस लेने भर की भी फुर्सत नहीं है. वह सैकड़ों मेहमानों से घिरी है, भला मैं उससे कैसे बात कर सकती हूँ. आप मुझे बहका रहे हैं,. आपने मेरे साथ इतनी बातें करलीं यह भी कम नहीं है. अब आप जा सकते हैं.
सलीम- दिल पर हाथ रखकर कहो कि आप जों भी कह रही हैं, वो सच कह रही हैं. मैं यहाँ से चला जाउंगा.
शालिनी- कमाल है, आप तो पीछे ही पद गए, कुछ लेना नहीं, देना नहीं और गले पड़े जा रहे हैं, जब आपका अभी से यही हाल है तो आगे चलकर क्या होगा ?
सलीम- इसी बात को अब ज़रा दुसरे ढंग से भी तो सोचिये, ज़रा सोचिये कि जब मैं अभी से तुमसे इतनी मोहब्बत करने लगा हूँ तो आगे चलकर कितनी करूँगा. तुम्हें पलकों पर बिठाकर रखूंगा, अपने दिल में सजाकर रखूंगा .
शालिनी- लों , कर लों बात. अब तुम दोस्ती से बढ़कर मोहब्बत तक आ गए. बड़े दिलफेंक मालूम होते हैं, अब तक न जाने कितनी लड़कियों को इस दिल को दे चुके होंगे.
सलीम- कमाल है, तुम मेरे पर आरोप पर आरोप लगाती जा रही हो और मैं फिर भी खडा मुस्करा रहा हूँ, क्या इससे तुम्हें मेरा प्यार दिखाई नहीं दे रहा है ?
शालिनी- जाइए, जाइए आप जैसे मजनूओं को मैं खूब समझती हूँ, दिल को मंदिर के प्रसाद की तरह बाँटते फिरते हैं और फिर कहते हैं कि सच बोल रहे हैं. अरे जों प्यार करते हैं वे कभी ढिंढोरा नहीं पीटते .
सलीम- मैं अकबर के जमाने के नहीं , नए युग का आशिक हूँ. पहले लोग सौ -दो सौ साल का जीवन जी लेते थे और अब यही उम्र का औसत घटकर ६० से ७० हो गया है. इसमें जवानी का समय बहुत कम रह गया
है, मैं नहीं चाहता कि मेरी जवानी ऐसे ही गुजर जाए , मैं इन्तजार करता रहूँ और पता चले कि मेरी चाहने वाली जब तक किसी और की हो गयी .
शालिनी- दैया री दैया . कैसे आशिक हो ? दोस्ती से अबत चलाकर मोहब्बत तक और फिर सीधे शादी तक जा पहुंचे. पीछा छुड़ाने का क्या लोगे ?
सलीम- कुछ खास नहीं , एक प्यारा सा हग और कुछ चुम्बन ,जिनमे से कुछ होठों पर होंगे तो कुछ गालों पर.
शालिनी - आप हद पार करते जा रहे हैं. बेशर्मी पर उतर आये हैं, मुझे गुसा आ गया न तो देख लेना . सिर फोड डालूंगी .
सलीम- बड़ा एहसान होगा मुझ पर. जब मैं लहूलुहान हो जाउंगा, डॉक्टर के पास कराह रहा होउंगा तब तो तुम्हें तरस आएगा . तब तो मेरे प्यार का यकीन आ आजायेगा ? अगर इससे तुम्हें खुशी होती है तो ऐसा ही करो
, लीजिए न झुकादी है जों चाहो करो.
शालिनी- देखो अकबर, मैं कहे देती हूँ................
सलीम- मेरा नाम अकबर नहीं सलीम है.
शालीन- मेरी बाला से , जों भी हो.
सलीम -तो, चलें खाना खाएं ?
No comments:
Post a Comment