लवगुरु
मुंशीजी एक अजीब समस्या के शिकार हो गए, पहले तो उनको सिर्फ यही लगा था कि वे डोली के साथ एक रात मौज मस्ती करेंगे. इतनी खूबसूरत युवती के साथ
रंगरेलियां मनाने के एवज में अगर दस बीस हजार खर्च भी हो जाते हैं तो कौन सा फर्क पड़ता है. दौलत तो उन्होंने खूब कमाकर रखी थे, अब तो उन्हें शारीरिक तृप्ति
की जरूरत थी, वे जिस्मानी सुख संतुष्टि पाने के लिए ही तो अपने पडौस में रहने वाली छबीली पर फ़िदा हुए थे . मगर वह कोरी, कुंवारी कली थी, उसकी उम्र बहुत कम
थी और उनके यहाँ पर प्रचलन था कि कोई कितना गरीब क्यों न हो लेकिन वह अपनी बेटी की शादी बराबर की उम्र के लड़के के साथ करता था . चाहे कितने भी गरीब
घर में क्यों न करे, इसलिए राजी खुशी तो मुंशीजी को लगता नहीं था कि छबीली का पिता उनकी शादी उसके साथ करेगा. इसीलिए वे चाहते थे कि लवगुरु से मिलकर
छबीली को पटाने की कला सीख्लें. इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर वे यहाँ आये थे, लवगुरु से मिले भी . लवगुरु का आदेश हुआ कि आज रात जों सपना वे देखते हैं वे अक्षरशः
वे अगले दिन लवगुरु को बताएं , तब वे किसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे और उसे टिप्स देंगे. होटल आने पर मुंशीजी को वेटर ने हसीनों के दर्शन कर लिए और एक रात के लिए
उन्होंने डोली को हायर कर लिया . डोली के साथ जिस्मानी सम्बन्ध बनाने के बाद मुंशीजी उसके दीवाने हो गए, उनको छबीली का ध्यान भी नहीं रहा. वे डोली के मादक यौवन पर इतने
मोहित हुए कि उसे हमेशा के लिए अपना जीवन साथी बनाने का फैसला कर लिया. वे नहीं जानते थे कि डोली उस शहर की टॉप लेबल की वैश्या थी . उसकी अदाओं के जलवों
में अच्छे -अच्छे धनिक शिकार हो जाया करते थे. काम क्रीडा के दौरान वह इतनी ज्यादा कामुक बातें करती थी कि सामने वाला सब कुछ भूलकर उसका गुलाम हो जाता था
, मुन्शीजी को भी कुछ याद नहीं था, वे अपनी मेहनत की कमाई को खर्च कर डोली को पाना चाहते थे. सुहागरात मानाने के बाद लवगुरु ने पहला काम ये किया कि डोली को
अगले दिन रात के लिए बुक किया और फिर साथ-साथ खाना खाने के बाद वे आराम से सो गए . अगली दोपहर मुंशीजी ने डोली के साथ ही स्नान किया , उसके साथ ही नाश्ता किया
और फिर साथ -साथ टीवी देखा, इस समय डोली ने मुंशीजी की जाँघों पर अपना सिर रखा हुआ था . मुंशीजी ने अपने होठ डोली के नाजुक होठों पर रख दिया. डोली के शरीर में
गर्मी का संचार होने लगा. उसका जिस्म वासना की भट्टी में तपने लगा था. मुंशीजी का संवेदनशील अंग धीरे-धीरे जाग्रत हो रहा था. मुंशीजी अब सभी फार्मूले इस्तेमाल कर रहे थे .
लवगुरु ने उन्हें चुम्बन से पहले कोलगेट प्लाक्स से कुल्ला करने की नसीहतदी थी. लवगुरु ने उस पर अमल भी किया. अब उनकी साँसें महक रही थीं. डोली को भी खूब आनंद आ रहा
था. मुंशीजी ने लवगुरु की बातों को पूरी तरह से आत्मसात कर लिया था . डोली कह रही थी-
- ऐसा लगता है , जैसे कि हमारा यहसम्बन्ध आज का नहीं, बरसों बल्कि कहिये कि सदियों पुराना है. क्या फिल्मों की तरह हम किसी पुराने जन्म के बिछड़े हुए प्रेमी-प्रेमिका हैं ?
मुंशीजी- हाँ, मगर मुझे ऐसा एहसास होता है जैसे कि कभी हम बिछड़े ही नहीं, बल्कि हमेशा साथ-साथ रहे. तुम मेरी आत्मा में बसी रहीं और मैं न जाने कहाँ -कहाँ ढूँढता रहा ,
ठीक उसी तरह जैसे कस्तूरी मृग की नाभि में होती है , और वह उसकी महक पाकर उसे पाना चाहता है, इसलिए जंगल दर जंगल भटकता रहता है .
डोली- अगर आप ना आते तो मेरा जीवन बेकार चला जाता .
मुंशीजी- मैं ऐसा कैसे होने देता, जब हमारे मुकद्दर में मिलन लिखा है, मोहब्बत लिखी है तो कोई बुराई , कोई व्यवधान हमारा -तुम्हारा क्या बिगाड़ सकता है ?
डोली- आज की रात आपने मुझे बहुत सुख दिया है . आज से पहले मैं ऐसे किसी सुख से अनजान थी, कभी नहीं जान पाई कि जिस्मों का मिलन इतना सुन्दर भी हो सकता है .
हांलाकि मैं पहले तो डर रही थियो, सोचती थी कि पता नहीं आप किस तरह का वयवहार करेंगे , डरती थी कि ऐसा न हो कहीं दर्द के मारे मेरा दम ही निकल जाए , मगर आपसे मिलकर
मेरा सारा डर समाप्त हो गया. अब तो आनंद ही आनंद है . आपका यह काला नाग मुझे पहले जितना डरा रहा था , अब उतना ही रोमांचित कर रहा है .
मुंशीजी- यह मेरा पहला अनुभव था , इससे पहले मैंने कभी किसी महिला के साथ न तो रोमांस किया और न ही सेक्स किया .
डोली- हम दोनों का यह पहला ही अवसर था. दोनों ही खुश हुए .
मुंशीजी- मैंउस मीठी रात को कभी नहीं भूल पाउँगा , मरनेके बाद भी वह छवि मेरी आँखों में बसी रहेगी.
डोली- अब तो हर रात सुहागरात होगेई, मैं आज की रात आपको कल रात से भी ज्यादा सुख दूंगी .
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