Sunday, September 12, 2010

लवगुरु -३६

मगर इस प्रयास में मुंशीजी खुद ही गर्म हो गए , डोली ने भी मौक़ा देखकर चौका लगाना उचित समझा , और ज्यादा गर्मी लाने के उद्देश्य से डोली ने मुद्दा छेड़ा -
-दुर्भाग्य है कि सेक्स को पाप, पति को परमेश्वर और नारी को नरक का द्वार कहा जाता है। अब सोचो, जब तीनों बातें एक साथ एकत्र होंगी, तो क्या होगा? युद्ध ही होगा और कुछ नहीं। कितनी हैरानी की बात है कि हम उसको युद्ध नहीं बल्कि सात जन्मों का पवित्र बंधन भी कहते हैं। अगर सेक्स पाप है, तो जन्म लेने वाली हर संतान पाप की देन है, अगर वो पाप की देन है तो वो पापमुक्त कैसे हो सकती है? हमने सेक्स को पहले पाप कहा, फिर शादी का बंधन बनाकर उसका परमिट भी बना दिया। हमारी सोच में कितना विरोधाभास है।

हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि विवाह के बाद रिश्तों में खटास क्यों आ जाती है? विवाह के बाद रिश्ते कच्चे धागों की तरह टूटने को लगते हैं? हम ने सेक्स को पाप बना दिया, स्त्री को नरक का द्वार बता दिया और पति को परमेश्वर। बस इसमें उलझकर रह गया मनुष्य। पति को परमेश्वर बताकर हमने ईगो को जन्म दे दिया, मैं को जन्म दे दिया, तानाशाह को जन्म दे दिया। और मनुष्य इससे आगे नहीं निकल पाया। मनुष्य ने पुरुषवादी सोच रखते हुए औरत को सेक्स पूर्ति की मशीन समझा, और औरत ने सेक्स को दमन। सपनों का दमन, रीझों का दमन, उमंगों का दमन। उसको इस रिश्ते से घुटन होने लगी। जब पानी में कड़वाहट आने लगती है तो उसका मीठा स्वाद जाने लगता है। ऐसा ही होने लगता है विवाह के बाद। बस धीरे धीरे रिश्ते पतन की ओर जाने लगते हैं। सेक्स वो अवस्था है यहाँ पर मैं और तू का अर्थ खत्म हो जाता है, लेकिन हमने एक को बड़ा कहकर मैं को जन्म दे दिया। तू नारी है, मैं पुरुष हूँ, जब मैं तू का भेद खत्म हो जाए और जब सब शून्य हो जाए। वो ही सेक्स संपूर्ण है, वरना तो दोनों ही एक दूसरे के लिए सेक्स पूर्ति की मशीनें हैं। इस देश में सेक्स एजुकेशन की नहीं, बल्कि सेक्स के सही अर्थ समझाने की जरूरत है। सेक्स को पाप कहकर खुद को पाप की संतान घोषित करने से उभरना होगा। सेक्स को सही ढंग से परिभाषित करना होगा। सेक्स दो रूहों का वो मिलन है, जो समाधि पर जाकर खत्म होता है। समाधि ईश्वर की ओर लेकर जाती है।
मुंशीजी - क्या बात कही है यार , कहाँ से सीखी ?
डोली- किसी अखबार में पढ़ा था इस बारे में, उसे अपने शब्दों में बयान कर दिया .

मुन्शीजी -सेक्स को पर्दे में डाल दिया, हर कोई उसको देखने के लिए उतावला हो उठा। आपको याद होगा आज से कई साल पहले की फिल्मों में हीरोईनों का ड्रेस सेंस। उनकी नंगी टांगें और बाँहें देखकर कुछ दर्शक तालियाँ बजा उठते थे, और कहते थे थोड़ा सा और दिखाओ, लेकिन आजकल अभिनेत्रियाँ जिस्म की नुमाइश तक लगा देती हैं, कोई देखता नहीं बल्कि कहते हैं कि कुछ कहानी लाओ। कुछ ऐसा ही सेक्स के बारे में। जब सेक्स को हम अच्छी तरह से परिभाषित कर देंगे, तब सेक्स हम को एक शांति और सुकुन की तरफ लेकर जाएगा। जब हमारे जेहन से सेक्स का भूत निकल जाएगा, तब महिलाएं आराम से घूम पाएंगी, उनको कोई भय न होगा। हमने दिमागों में तो सेक्स भर रखा है, लेकिन विरोधी बने घूम रहें हैं सेक्स के। महिला को देखते ही सबसे पहले पुरुष की निगाह उसकी उभरी हुई छाती पर जाती है क्यों?
आखिर वासना इस कदर कूट-कूट कर समाज में फैल चुकी है कि हमें एड्स और अन्य यौन रोगो की रोकथाम का दूसरा रास्ता सूझता ही नहीं. हम यह क्यों नहीं सोचते कि यदि अनैतिक यौन संबंध बनेंगे ही नहीं और सेक्स पर मनुष्य काबू रखेगा तो कंडोम की जरुरत ही नहीं पड़ेगी. आज ज्यादातर लड़कों की दो या उससे ज्यादा प्रेमिका होती ही हैं. लडकियां भी आज सेक्स संबंध बनाने में लड़कों से किसी तरह पीछे नहीं हैं. ऐसे में रिजल्ट तो बुरा होना ही है.
लाइए , अब कंडोम निकालिए , फिर बात करते हैं ....
डोली- देती हूँ, मगर क्या कभी सोचा है कि कंडोम से कई बार रिसाव और फटने आदि की स्थिति में यौन रोगों से सुरक्षा नहीं मिलती और कई बार लोग दुकानों से कंडोम खरीदने में सकोच भी करते हैं.

लेकिन हर समस्या का समाधान होता है. सेल्फ-कंट्रोल और नैतिकता एक ऐसी दवा है जिससे आप सौ प्रतिशत यौन रोगों से बच सकते हैं. अपने साथी के प्रति विश्वास और वासना पर काबू रखना हर मनुष्य को बेहतर जिंदगी की तरफ ले जा सकता है.

यह चीज समझने वाली है कि सेक्स और वासना का आनंद एक तय उम्र सीमा तक ही आप उठा सकते हैं, उसके बाद आपका अंतर्मन आपसे कई सवाल करेगा. इन सवालों को आप आत्मविश्वास के सहारे ही झेल सकते हैं.

अपने साथी के प्रति ही वफादार रहें, जितना हो सके संयम अपनाएं और याद रखें एड्स से बचना है तो कंडोम ही एक मात्र साधन नहीं है. ऐसे हालात ही क्यों आने दें कि मन में डर या ग्लानि का छोटा सा भी भाव आए.

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