Sunday, February 21, 2010

भाग-१२

वह जल्दी से नित्यकर्म करने लगा ताकि चंदाबाई का मनमोहक डांस देख सके। नौटंकी १२ बजे के बाद ही शुरू होती थी, आरती के बाद पब्लिक को बुलाने के लिए कोई भडकता हुआ गीत पेश किया जाता था और उस पर चंदाबाई ही अपनी अदाओं के जलवे दिखाया करती थी। इससे लोग अपने -अपने घरों से जल्दी निकल जाया करते थे। अजय उस गीत को कभी नहीं छोडता था। अपने दोस्त अजय के साथ वह सही समय पर नौटंकी स्थल पर पहुच गया। वह वीआई पी सीट पर बैठा करता था, अजय से सैकड़ों लड़के दोस्ती करने के लिए तैयार रहते थे, इसका एक कारण तो यह था की अजय का इलाके में अच्छा खासा दबदबा था। उसके कारण अजय के दोस्त भी खूब मौज मनाते थे। नौटंकी की शुरुआत हुयी। आरती के बाद गीत शुरू हुआ- झुमका गिरा रे... बरेली के बाजार में झुमका गिरा रे... सीटियाँ बजने लगीं। रसिक लोग शोरगुल करने लगे। चंदाबाई के लटके-झटके शुरू होने लगे। लोग तालियाँ बजा रहे थे, अपनी-अपनी जगह से हल्ला मचा रहे थे।अजय भी खूब खुश हो रहा था, हांलाकि उसके मन में कभी-कभी ऐसा आता था की जो लोग चंदाबाई के हुस्न और जिस्म की तारीफ़ कर रहे थे , वह उनका गला घोंट दे, अगले ही पल वो ये सोचकर रह जाता की वह महान कलाकार है, तभी तो लोग उसकी प्रशंसा कर आरहे हैं, कोई और नर्तकी इतनी तारीफ़ क्यों नहीं बटोरती ? वह भी तालियाँ बजाने लगता और खुशी से हीखने लगता । जैसे ही उसका गीत समाप्त हुआ , अजय अपने खास दोस्त अहमद के साथ प्रेक्टिस करने खेत पर रवाना हो गया, उनकी कोशिश थी की किसी भी तरह से कबड्डी का मैच जीता जाए। रास्ते में अहमद ने उससे पूछ लिया-
आज हम जीत तो जायेंगे , ना। झंडी पर तू रहना। मैं चौथे पर कवर कर लूंगा। लेकिन रेडर की भूमिका भी तुझे ही निभानी होगी, मुख्य रेडर तू ही रहेगा । वे लोग अपने गाँव की बहुत शेखी बघारते हैं, आज उनको सबक सिखाना ही होगा। आज तक का रिकार्ड है की हमारे गाँव की टीम कभी उनसे जीत नहीं पाई। लेकिन जीत और हमारे बीच में तुम्हारा इश्क तो आड़े नहीं आएगा ?
अजय-- इश्क ? किसका ? कैसा ? किसके साथ ? पागल तो नहीं हो गया ?
अहमद- मैं नहीं , पागल तो तू हो गया है, चंदाबाई के इशक का खुमार छाया है तुझ पर। सबको बनाले लेकिन मुझे नहीं बना सकता । मैं जानता हूँ तेरे दिल की हालत । हमेशा तेरे दिमाग में उसकी बातें चलती रहती हैं,। आज सुबह जब मैं तेरे घर आया तो सोते-सोते भी तू उसीके ख्यालों में खोया हुआ था, उसीका नाम पुकार रहा था। प्यार भरे डायलोग मार रहा था। यह सब अचानक नहीं हो सकता। मैंने कई बार तेरे वो पात्र भी देखे हैं, जो तू चंदाबाई के लिए लिखता तो है , लेकिन उसे दे नहीं पाता, मैं तेरी हालत समझता हूँ रे। अच्छी तरह समझता हूँ। हमराज हूँ तेरा। बहुत दिन ओं से इस बात को जानता हूँ , और अपने सीने में ही इसे दफ़न करके रखा है।
अजय- तो तो बहुत बड़ा हो गया रे अहमद, मैं जानता हूँ तू ही मेरी दोस्ती के काबिल है, सच्चा दोस्त है मेरा। तभी तो मैंने तुझे चुना है। तुम जानते हो कितने चमचे घुमते रहते हैं, तुम सबसे अलग हो मेरे यार। आजा गले से लगजा।
दोनों दोस्त ऐसे गले मिले , जैसे १४ वर्षों के बाद रामचंद्र जी अपने भाई भरत से मिल रहे हों, यह भरतमिलाप जैसा द्रश्य था। दोनों भावुक थे, अजय पूछ रहा था-
- अच्छा ये तो बता , अब मैं कैसे करू? उसके बिना मैं जी नहीं सकता , वह मेरी नस -नस में लहू बनकर समा चुकी है। लेकिन मेरी लव स्टोरी सक्सेस कैसे हो, चंदाबाई तक मेरा पैगाम कैसे पहुचे, वह तो मुझे बचा समझती है और इसी तरह से ट्रीट करती है। मुझे हमेशा डर लगा रहता है। तूने सच समझा, मेरा ध्यान उसी पर लगा रहता है, पत्र लिखता हूँ और उसे फाड़ डालता हूँ। तू तो होशियार है, मेरी मदद कर न यार ।
अहमद- मेरी पहली सलाह भी वही होगी जो हर अच्छा दोस्त देगा, उसे भूल जा मेरे यार। वो जमीन है और तू आसमान।बहुत बड़ा फासला है रे।
अजय- मैं मोहब्बत से इस फासले को खत्म कर देना चाहता हूँ। मुझे कोई राह दिखादे , मेरी भी डगर में थोड़े से प्यार के फूल खिलादे, कुछ कर यार , कोई ऐसा आदमी तलाश कर जो मेरे दिल के जज्बातों को ठीक तरह से कागज़ पर उतार सके, मैं सोच नहीं पा रहा की लिखने की शुरुआत कहाँ से करू, और किस तरह से लिखूं ताकि वह भी मेरी तरह मुझसे प्यार करने लगे।
अहमद- जानते हो उसकी उम्र क्या है ? पता नहीं की अपने वक्त में किसीसे शादी भी की या नहीं ?
अजय- शुभ-शुभ बातें करो यार।










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