चंदाबाई- भले ही आपको कोई तकलीफ नहीं है, कोई ऐतराज नहीं है लेकिन मुझे तो है। मैं आपत्ति दर्ज करती हूँ अजय बाबू, यह तुम्हारी करने की नहीं बल्कि पढ़ने -लिखने की उम्र है , आपको उसी तरफ ध्यान देना चाहिए। स्नेह से तुम्हारा हाथ पकड़कर यहाँ तक लाने का उद्देश्य यही है। क्या मेरा इतना भी हक नहीं है तुम पर। मैं तुहें किस दे सकती हूँ लेकिन इस शर्त के साथ की तुम उसका कोई गलत अर्थ नहीं निकालोगे और इसके बाद कोई दूसरी ख्वाहिश जाहिर नहीं करोगे ।
अजय- मैंने तो सुना है की कोई शर्त होती नहीं प्यार में, मगर प्यार शर्तों पे तुमने किया। एक दिन तुमने इसी गीत पर अभिनय किया था न। कितना भाव विभोर करने वाला अभिनय था। आज ये लाइनें मुझ पर चरितार्थ हो रही हैं। आह कितना दुर्भाग्य है मेरा। एक और गीत भी तो है- होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो, बन जाओ मीत मेरे , मेरी प्रीत अमर कर दो। ना उम्र की सीमा हो , ना जन्म का हो बंधन । जब प्यार करें दो दिल तो देखे केवल मन। और तुम मेरी उम्र की बात करती हो।
चंदाबाई -हा हा हा । लगता है मूड बिगड रहा है बाबू साहब का। बैठो मैं करती हूँ जेहन को साफ़। रूंठे हुए दोस्त को मनाना मैं अच्छी तरह से जानती हूँ.
अजय के सचमुच गाल फूल गए थे। गुस्सा तो जैसे उसकी नाक पर ही रखा रहता था। चंदाबाई जानती थी उसकी तुनक मिजाजी , तभी तो उसने अजय के पेट के आसपास गुदगुदी करनी शुरू करदी। वह बचता रहा , चंदाबाई उससे लिपट रही थी, अनजाने में ही सही, उन दोनों के जिस्म एक दुसरे से टच हो रहे थे। मखौल के लिए बहुत अच्छा वातावरण बन चूका था , जब चंदाबाई के यौवन के उभार अजय के हाथों से टच होते तो अजय को खूब खुशी होती थी, यह अनजानी खुशी उसके तन -मन को बहलाने के लिए काफी थी। और फिर वह समय भी आया जब छेड़खानी करते करते वे दोनों गिर पड़े। चंदाबाई नीचे थी और अजय उसके ऊपर। अनजाने में ही सही मगर इस समय बेहद रोमांटिक सीन बन पड़ा था। अजय को लगा की जैसे सचमुच उसकी भावनाओं में उबाल आ रहा हो। उसको अपने अंदर गर्मी सी महसूस होने लगी। इस वक्त अजय और चंदाबाई की साँसे एक दूसरे से मिल रही थीं। साँसों की गर्मी से जिस्मों का तपना शुरू हो गया। दोनों की आँखें मिल गयीं। अजय तो जैसे चंदाबाई की झील सी आँखों में ही डूबने के लिए बेताब हो गया था। दिल के अरमान हिलोरें मारने लगे थे। आखिरकार चंदाबी को कहना ही पड़ा-
-ऐसे क्या देख रहे हो अजय, मुझे डर लग रहा है, ऐसे मत देखो प्लीज। हम लोग कलाकार हैं। हमको प्यार -व्यार की कोई इजाजत नहीं होती, सिर्फ कला के माध्यम से लोगों का दिल बहलाना ही हमारा धर्म होता है। अगर इस हद को पार किया तो क़यामत आ जाती है।
अजय- मैंने तो सूना है की यह कम्पनी खुद तुम्हारी है , तुम पर किसी का कोई जोर जुल्म नहीं है। तुम अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हो । क्या यह सच नहीं है ?
चंदाबाई - हाँ , सच तो खैर यही है , मगर समाज के मालिक बहुत लोग होते हैं, और उनसे भी ज्यादा ठेकेदार भी होते हैं। समाज में हमारा साथ गलत माना जाता है, अगर कोई हमारे साथ सम्बन्ध बढाए तो उसे समाज के लिए , संस्कृति के लिए ख़तरा माना जाता है। हमारे अभिनय और नृत्य पर जो लोग सीटियाँ बजाते हैं, जो हम नोटों की बरसात करते हैं, जो हमारी अदाओं पर सब कुछ लुटाने के लिए तैयार रहते हैं , वही लोग हमारे खिलाफ हो जाते हैं।
चंदाबाई- तुम्हारे खिलाफ होकर कोई तुम्हारा क्या बिगाड़ लेगा ? मैं हूँ, आँख निकाल दूंगा कड़ी नजर से देखने वाले की। मेरे पापा का मिजाज देखा है ? अगर गर्म हुए तो प्रलय आ जायेगी।
चंदाबाई - हाँ, और ये भी जानती हूँ की वही प्रलय सबसे पहले तुम्हारे ऊपर गिरेगी।
अजय- वे मुझे बहुत प्यार करते हैं, मेरे लिए कुछ भी कर सकते हैं।
चंदाबाई- इसीलिए तो। इसीलिए वे तुम्हारे खिलाफ हो जायेंगे, जब वे जानेंगे की उनका इकलौता बेटा एक नर्तकी के साथ प्रेम कर रहा है तो उनके क्रोध का पहाड़ टूट पड़ेगा ।
अजय ने चंदाबाई के अधरों से अपने अधर सटा दिए।
Tuesday, February 16, 2010
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