Sunday, February 7, 2010

भाग-२६

जो काम कुदरत के दायरे में रहकर किया जाए वही उचित और सच्ची खुशी देने वाला होता है।
और जब इंसान प्रकृति को चुनौती देकर कोई काम करता है तो उसे दुःख और असफलता ही मिलती है, मेरी यह सोच कितनी सही है , कितनी गलत , मैं नहीं जानती ।
मुंशीजी- अपनी जगह तुम भी ठीक हो छमिया। हर इंसान अपने तरीके से सोचता है। एक बार एक पहचान के लड़के ने मुझसे पूछा -
- मुंशीजी ,मैं बहुत बड़े धर्मसंकट में फंस गया हूं। मेरे साथ ऑफिस में एक लड़की काम करती है और करीब दो साल से उसके
साथ मेरा अफेयर चल रहा था। पिछले महीने उससे मेरा ब्रेकअप हो गया और मैं उसे भुलाकर अपने में मस्त रहने की कोशिश करने लगा। इस बीच उस लड़की की भाभी से मेरी बातचीत लगातार होती रही है। हम दोनों के बीच उस समय से बातचीत हो रही है, जबसे उनकी ननद के साथ मेरा अफेयर शुरू हुआ। उसी दौरान मुझे पता चला कि पति के साथ उनकी नहीं बनती है और वह सिर्फ चार साल के अपने बेटे को पालने के लिए इस रिश्ते को निभा रही हैं। मैं उनकी ओर शुरू से ही आकर्षित था लेकिन कभी इस तरह से सोचा नहीं था। लेकिन ब्रेकअप होने के बाद मैं उनके बारे में दूसरी तरह से सोचने लगा। फिर हम दोनों के बीच काफी बातें होने लगीं। मैंने एक सप्ताह पहले उन्हें डिनर पर बुलाआ और सबकुछ बता दिया। उन्होंने बताया कि वह भी मुझे पसंद करती हैं लेकिन उनकी चिंता अपने बेटे को लेकर है। मैंने उन्हें बताया कि अगर वह अपने पति से तलाक ले लेती हैं तो मैं उनके बेटे के साथ स्वीकार करने को तैयार हूं। मैं इस रास्ते पर आगे तो बढ़ चुका हूं लेकिन कभी-कभी यह भी लगता है कि कुछ गलत तो नहीं कर रहा हूं। धर्मसंकट में फंसा हुआ हूं और आपसे सलाह चाहता हूं।

छमिया- ओह , फिर क्या काहा आपने ?
मुंशीजी- मैंने उससे कहा की सामाजिकता और नैतिकता का ध्यान रखते हुए अपने दिल की बात सुनो। अगर दिल चाहता है तो उससे शादीकर लो , मगर सिर्फ शारीरिक जरूरत को ध्यान में रखकर उसका इस्तेमाल मत करना।
छमिया- बहुत सही कहा। क्या किया उसने ? फिर कभी मिला की नहीं ?
मुंशीजी- नहीं कभी नहीं। हो सकता है वह शहर छोड़कर किसी दुसरे शहर में चला गया हो। ऐसे ही एक बार हमने अपनी कोठी किराए पर जिस व्यक्ति को दी वह बहुत बड़ा अफसर था। उसका अकेला बेटा था, वह अक्सर उदास रहता था, जब मैंने कारण पूछा तो टाल गया , मैंने कुरेदा तो उसने बताया -मुझे एक बुरी लत
लग गई है , जिसके कारण मेरा स्टडी में मन नहीं लगता है। पिछले कुछ दिनों से मुझे ब्लू फिल्म देखने की आदत सी लग गई है। जब तक दिन में एक या दो ब्लू फिल्म मैं देख न लूं , तब तक मुझे चैन नहीं आता है। मैं रोज़ एक या दो ब्लू फिल्म देखता हूं। जब मैं स्टडी करने बैठता हूं , तो इस कारण मेरा मन उसमें बिल्कुल नहीं लगता है और मुझे नींद आने लगती है। मन आलस से भर जाता है और ब्लू फिल्म के दृश्य जहन में दौड़ने लगते हैं। इसके चलते मैं आजकल बहुत परेशान रहने लगा हूं। इस बुरी लत के कारण मेरा जीवन बर्बाद हो रहा है। मैं क्या करूं मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। इस बुरी लत से कैसे पीछा छुटेगा और फिर मेरा मन पढ़ाई में लगने लगेगा ? मैं इस पर सुझाव चाहता

छमिया- ओह मैंने कभी ब्लू फिल्म नहीं देखी , क्या इससे जीवन बर्बाद हो जाता है ? पढाई में दिल नहीं लगता ? क्या यह इतनी बुरी चीज है ?
मुंशीजी- हाँ, यह बुरी आदत है, जिसे एक बार लग गयी , वह हमेशा बुरे ख्यालों में खोया रहता है, वह चाहता है की उसे भी फिल्म के नायक की तरह शारीरिक सम्बन्ध बनाने की लालसा बनी रहती है

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