Friday, February 12, 2010

भाग-३

अजय- एक बात बताओगी चंदाबाई , तुम इन बातों को इतनी गंभीरता से क्यों कह रही हो, मैं जानना चाहता हूँ कि कोई अपने आपको किसी दुसरे को कैसे मिटा सकता है। ऐसा जज्बा आखिर किन स्थितियों में पैदा होता है ?
चन्दा- कोई गैर ? कौन है गैर ? तुम तो अपने ही हो ना , फिर अपने -अपने के लिए सब अपनी जान कुर्बान करने को तैयार रहते हैं, इसमें कौनसी अजीब या नयी बात है। यह तो दस्तूर है दुनिया का।
अजय- हाँ ये तो है , तभी मुझे एसा महसूस होता है जैसे कि तुम और मैं अलग नहीं हैं, एक जिस्म सही मगर जान एक हैं। शायद तभी मैं अपने आपको हर वक्त तुमसे जोड़कर देखता हूँ। जब पढने बैठता हूँ तो हर पन्ने पर तुम्हारा ही चेहरा दिखाई देता है। जब खाना खाता हूँ तो भी तुम्हें ही देखता हूँ। यह बात बड़ी ही विचित्र किन्तु सत्य है कि जब मैं सोने जाता हूँ तो पलकों पर तुम ही तुम नाचती नजर आती हो और जब सो गया तब सपनों में भी तुम होती हो , मैं सपनों में तुमसे खूब बात करता हूँ। तुम दिन में इतनी बिजी रहती हो कि बात करना संभव ही नहीं ,रात को हार थक कर तुम जल्दी सो जाती हो और सुबह लेट जागती हो, फिर तुम्हारे तैयार होने और नौटंकी का समय हो जाता है। कैसे समय निकले कि तुमसे बात हो। अब वक्त मिल ही गया है तो इसका सदुपयोग करना होगा। जरूर तुम सोच रही होंगी कि मैं क्यों तुमसे मिलना चाहता हूँ। मैं खुद भी तो ऐसा ही सोचता हूँ लेकिन मेरे पास इसका कोई सटीक जवाब नहीं है। हो सकता है कि शायद यही सब सोचने के लिए मैं ऐसा करना चाहता हूँ। शायद मैं खुद भी तुमसे सवाल करुँ कि ये सब क्या है ? बताओ ना चन्दा बाई , मैं ऐसा क्यों महसूस कर रहा हूँ, मैं ऐसा क्यों सोच रहा हूँ ? पहले तो मेरे साथ ऐसा कभी कुछ नहीं हुआ ?
चंदाबाई- आज तुम बहकी- बहकी बातें कर रहें हो अजय बाबू चलो न बगीचे में बैठकर आराम से बात करते हैं, चलो न ऐसे पड़े हो जैसे कि बैद न ही पकड़ लिया है , या फिर फेवीकाल का जोड़ लगा लिया है ?
अजय- मैं इतना चाहता हूँ लेकिन पता नहीं कैसे आलस्या न जकड रखा है ? उठने की इच्छा होते हुए भी टाइम लग रहा है, आओ न थोड़ा सा करीब आजाओ। फिर चलते हैं ।
और फिर चमात्कार हो गया... चन्दा बाई उसके करीब आकर बैठ गयी, अजय नी उसे अपनी तरफ खींच लिया। उसका हाथ तो पहले से ही चन्दा न थाम रखा था। और ऐसा करते ही चंदाबाई की काली घनी जुल्फें अजय के चेहरे पर बिख्हर गयीं, चंब्दाबी इस समय उसके उपकर थी, अजय के सीने पर चंदाबाई का सर रखा हुआ था। अजय उसके बालों में कंघी करते हुए बोला-
-जब तुम मुस्काराती हो तो ऐसा लगता है कि कहीं कोई कली चटककर फूल बन गयी हो, बहुत सुकून देती है तुम्हारी मुस्कान। दिल चाहता है , हमेशा तुम्हारे साथ ही रहूँ, हर वक्त तुम्हें निहारता रहूँ। जीवन भर ऐसे ही तुम्हारे बालों में अपनी उंगलियों से कंघी करता रहूँ।
चंदाबाई - और त५उम्हारी पढाई -लिखाई कया मैं करूंगी अजय बाबू, आखिर तुम अपने माँ बाप की अकेली संतान हो। वे लोग तुमसे अच्छे रिजल्ट की उम्मीद रखते हैं। जैसे कुछ ख्वाहिशें तुम्हारे दिलो -दिमाग में हैं, वैसे ही बहुत कुछ मेरे मन में भी चल रहा हो सकता है। लेकिन सबसे ज्यादा महतवपूर्ण है वो बात कि तुम्हारे माता- पिता तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं ? वे तुमसे किस तरह की उम्मीद रखते हैं।जो लोग हमें जन्म देते हैं, हमारा पालन-पोषण करते हैं , हमें अच्छा इंसान बनाने में अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं , उनके प्रति हमारी भी कुछ जिम्मेदारी होती है , जिसे निभाना जरूरी है। समझे ....
अजय- मैं कुछ नहीं जानता, इस वक्त जो मेरे दिल में है, दिमाग में है वही तुमको सूना रहा हूँ।
चंदाबाई मुस्कराने लगी, अजय न उसका हाथ चूम लिया। चंदाबाई के बदन में आग सी लग गयी।

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