Saturday, February 13, 2010

भाग-4

मगर वह अपने जज्बातों को जाहिर करने से बच रही थी, हांलाकि उसने अपने बदन को ढीला छोड़ रखा था , अजय जैसे चाहे उसके हाथ को चूम सकता था। स्पर्श मात्र से ही चंदाबाई सिहर रही थी, दिल जोर -जोर से धडकने लगा। अजय की हिम्मत बढ़ती ही जा रही थी। उसकी समझ में नहीं आया कि आगे क्या करे तो फिर उसने चंदाबाई के दुसरे हाथ को भी प्पकड़ लिया । अब वह उसको भी चूम रहा था, चंदाबाई कहने लगी-
- अब यहाँ से उठोगे भी कि यहीं पर लेटे रहोगे ? आखिर आज तुम्हें क्या हो गया है ? सब कुछ मेरी समझ से बाहर है। क्या चुम्बक लग गयी है। आज मेरे दोनों हाथों को बार-बार चूमने पर तुले हो। कोई ख़ास बात है क्या ?
अजय- हाँ, तुम अभी तक नहीं समझ पायीं, सब जान जाओगी। तुम भी आराम कर लो। आ जाओ ।
चंदाबाई - बहुत नटखट हो रहे हो अजय बाबू, मैं तुम्हारे साथ भला कैसे लेट सकती हूँ। कोई देखेगा तो क्या कहेगा। मुझे बच्ची समझ रहे हो, यहाँ हंगामा मच जाएगा । अगर मुझसे कुछ कहना ही चाहते हो तो अपने बगीचे में चलो। वहां का मौसम बहुत सुहाना है। सुबह शाम मैं वहां की सैर करना पसंद करती हूँ। वहां पर खिलते हुए फूल मुझे सुकून देते हैं। जब हवा के ठन्डे झोंके आते हैं तो पेड़ की टहनियां ऐसे झुक कर लहलहाने लगती हैं मानो कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका के होठों का चुम्बन ले रहा हो। जब हवा तेज होने लगे तो ऐसे सनन -सनन करती है जैसे कि प्यार में मदमस्त प्रेमिका कोई प्रेमगीत सुना रही हो।
अजय- अच्छा... तो क्या वहां पर कोई नहीं देखता ? कमाल है मैं कभी वहां गया ही नहीं। मुझे पता ही nahin कि मेरे पिता न मेरे लिए ऐसें -ऐसे बाग़ भी बनवा रखे हैं , मैं उनसे कहकर ये बगीचे तुमको दिलवा दूंगा।
चंदाबाई- नहीं अजय बाबू । मैं तो साल में एक बार यहाँ आती हूँ और एक दो महीने इसका आनंद उठा लेती हूँ, मेरे लिए यही कम है क्या ? मैं सौभाग्यशाली हूँ जो मुझे यहाँ पर रहने का अवसर मिलता है।
अजय- तुमने अब तक शादी क्यों नहीं की, मैंने सुना है कि तुम किसी से प्यार करती थीं मगर वह तुम्हारा हो नहीं पाया। इसी कारण तुम अभी तक कुंवारी हो , इस बात में कितनी सच्चाई है ?
चंदाबी- मैं किसीको नहीं चाहती थी, हाँ कोई मुझे जरूर चाहता है। मगर उसने भी कभी इजहार नहीं किया। अब ये मत पूछना कि वह कौन है, कहाँ है और क्या करता है , या फिर मैंने उसका प्रेम प्रस्ताव क्यों ठुकरा दिया ? या फिर उसने प्रेम प्रस्ताव रखा ही क्यों नहीं ? ये सब बोझिल, उबाऊ और बेकार की बातें हैं। मेरे ख़याल से तुमको वही बातें कहनी या करनी चाहिए जो सुख देती हों।
अजय- यह नहीं जानना चाहोगी कि मैं तुममे इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा हूँ।
चंदाबाई- नहीं , क्योंकि मैं जानती हूँ। तुम जब छोटे से थे तो मैं तुम्हें अपनी गोद में उठाकर खिलाया करती थी, एकदम छोटे भी नहीं थे, तब १० या १२ साल के रहे होंगे। मुझसे जब भी खूब सवाल करते थे। ना जाने कैसे कैसे सवाल , इसलिए मैं जानती हूँ तुम्हारी आदत को। यह तुम्हारी आदत है । है ना। अच्छा अब तुम बताओ , क्या तुम किसी से प्रेम नहीं करते ? कोई दोस्त तो होगे जो चाहती होगी तुम्हें, बातें करती होगी तुमसे ? तुम उसकी जाँघों पर सर रखकर उसे शेर सुनाते होंगे।
चंदाबाई - सच बात तो ये है कि ऐसी कोई नहीं है । लड़कियों से बातें करना भी मुझे अच्छा नहीं लगता , घबराहट सी लगती है। या फिर कोई अच्छी ही नहीं लगती ।
अजय- तुम क्यों नहीं बन जाती मेरी दोस्त। तुम तो मुझे पहले से ही जानती हो ना। मेरी पसंद , नापसंद से भी अच्छी तरह से वाकिफ हो। मैं तुमसे घबराता भी नहीं हो, तुमसे मिलने का दिल करता है। तुम्हें प्यार करने का जी करता है।







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