भाग -८उसको अपनी बांहों में कसकर पकड़ लिया, ऐसे करते समय उसके दिलो दिमाग में तूफ़ान उमड़ रहा था. साँसें और भी तेजी के साथ चलने लगी थीं. चंदाबाई के हाथ तो नीची ही दबे थे, बेचारी चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी, अगर जुबान से विरोध करना चाहा तो उसका भी इंतजाम अजय न पहले ही कर डाला था। उसके सुर्ख होठों पर अपने होठ जो सटा रखे थे, अजय के एक्शन से लग रहा था मानो वह सदियों का प्यासा हो और आज जी भरके अपनी प्यास बुझाना चाहता हो। चंदाबाई हैरत में थी, उसने कहाँ सोचा था की अजय जैसा सीधा -सादा लड़का इस तरह का व्यवहार भी कर सकता है , चंदाबाई ने उसको हमेशा अपने आप में गुम देखा था। आज वही लड़का उसको बांहों में कैद करके चुम्बन ले रहा था, प्रेमालाप की आज्ञा ले रहा था। चंदाबाई बहुत कुछ सोचना चाहती थी लेकिन अजय उसे मौक़ा ही नहीं दे रहा था। उसने किसी भँवरे की तरह पंकेषर का रस चूसना आरम्भ कर दिया। जब चंदाबाई ने उसको थपथपाकर हटाने की कोशिश की तब जाकर उसका ध्यान भंग हुआ ,चंदाबाई की सांस धौंकनी की तरह चलने लगी, जब अजय ने अपने होठ उसके होठों से हटाये तो चंदाबाई बोली-
-आज भांग का नशा कर लिया है क्या ? जो तुम पर एक ही धुन सवार है ... अब हटो अब तो चुम्बन ले लिया ना। अब मुझे ज़रा होश भी तो लेने दो।
अजय- अभी हमें फुर्सत नहीं है किसी से बात करने की, तुमसे भी नहीं। हमारे मन में जो है, पहले उसे हो जाने दो । तब किसी तरह की कोई बात की जायेगी। तुमने तो हद भी तय कर दी है, शर्त के साथ इजाजत दी है, यकीन मानो मैं उस लक्ष्मण रेखा को कभी पार नहीं करूँगा। लेकिन मन के अरमान आज ही और अभी निकलकर रहेंगे। चाहे जो हो जाए , चाहे कोई आ जाए, कोई देख ले । कोई टोके , न्मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता । इसीलिए मैं इस बगीची के मुख्य द्वार को भी बंद करके नहीं आया हूँ। मैं डर-डरकर नहीं जीना चाहता। मुझे भी मेरी लाइफ मेरे तरीके से जाने का अधिकार है। अगर मेरा व्यवहार किसी को पसंद नहीं तो कोई बात नहीं, मुझे भी किसी की कोई परवाह नहीं करनी। तुम्हारी भी नहीं। क्योंकि मैं जानता हूँ तुम्हारे दिल की बात ।
चंदाबाई - अच्छा जी ... इतना गुस्सा , बगावत की बू। क्या जानते हो मेरे बारे में , बताओ मुझे भी ।
अजय- तुम भी प्यार करती हो मुझसे । हमेशा के लिए मुझे अपना बनाना चाहती हो मगर डर रही हो। डरती हो की अगर ऐसा हुआ तो तुम्हारा धंधा चौपट हो सकता है। तकलीफें आ सकती हैं। लोग तरह- तरह की बातें बनाएंगे, हो सकता है की फिर इस गाँव में तुम्हारी एंट्री भी बंद हो जाए । इसी डर के कारण तुम अपने दिल की बात सुनने के लिए तैयार नहीं हो। डरपोक हो तुम ।
चंदाबाई - अगर मैं इससे इनकार करून तो ?
अजय- तो सच तो सच ही रहेगा, झूठ में नहीं बदल जाएगा। मैं भले ही छोटा हूँ लेकिन जानता सब कुछ हूँ। मैं तुमसे छोटा हूँ इसलिए मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रही हो क्या ? अगर मैं भी उम्र में तुम जैसा होता तो क्या मेरे प्यार के लिए सब कुछ छोड़ने के लिए तैओयार नहीं हो जाती। मैं भी सब कुछ कर सकता हूँ तुम्हारी खातिर। जान भी दे सकता हूँ।
अजय की भावुक बातें सुकर तड़प गयी चंदाबाई , उसके होठों पर अपनी उंगली रखकर बोली-
- नहीं अजय बाबू , फिर कभी अपने मुंह से ऐसी अशुभ बातें मत निकालना । दुनिया में मेरा और कौन है ? माँ- बाप कबके मर गए। भाई -बहन कोई है ही नहीं। चाचा -ताऊ या कोई करीबी रिश्तेदार भी नहीं है । तुम्हारी आँखों में अपने लिए एक चमक देखी है और तुम ही अगर इस तरह की बात करोगे तो मेरा क्या होगा ?
अजय- यह प्यार नहीं तो और क्या है ?
चंदाबाई- तुम नहीं समझोगे अजय बाबू...
Wednesday, February 17, 2010
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