जान छोड़कर सब कुछ खोने के लिए तैयार हूँ, एक फिल्म में नाना पाटेकर बोलता है न-जान छोड़कर कुछ भी मांग लो , वही डायलोग मैं तुम्हारे लिए लिख रहा हूँ, यह मेरापहला प्रेम है, और पहला ही प्रेम पत्र है, मैं लिखना -विखना कुछ नहीं जानता हूँ। बस अपने दिल के जज्बातों को कागज़ पर उतारने की चेष्टा कर रहा हूँ।
अहमद ने अपने खालू के लड़के से इस तरह का पत्र लिखवाया था, उसे अब दोनों दोस्त पढ़ रहे थे, चंदाबाई तक उसे पहुचाने से पहले ही वे यह इत्मीनान करना चाहते थे की पत्र ठीक तरह से लिखा गया है की नहीं, अजय शर्मिन्दा होने से बचना चाहता था , इस्लिते एक -एक शब्द को ठीक तरह से पढ़ रहा था , कुछ सोच विचारने के बाद उसने पत्र पढ़ना बंद कर दिया और बोला-
- वैसे तो सब कुछ ठीक है मगर कुछ ऐसी बाते भी हैं जिनको ध्यान में नहीं रखा गया है , मेरी व्यथा और उसकी सुंदरता पर फोकस किया जाता तो ज्यादा बेहतर होता।
अहमद- हाँ, यार सच कहता है लेकिन आगे तो पढ़ काफी लंबा पत्र है, शायद आगे इस तरह की बातें हों, अभी तो काफी बाकी है न। चल पहले पढते हैं।
एक बार फिर अजय ने उस पत्र को पढ़ना शुरू ककर दिया जिसे वह अपनी चेहेती चंदाबाई और नौटकी की महान कलाकार को देना चाहता था। तर में आगे लिखा गया था-
- अगर तुम्हारी सुंदरता का वर्णन करून तो अलग से एक पुस्तक बन जायेगी, कथा -कहानियों , नाटकों और फिल्मों में जिस तरह से महिलाओं की सुंदरता का उल्लेख किया जाता है वह तुम्हारे सामने बहुत बौना है, बड़ी -बड़ी अभिनेत्रियां भी तुम्हारे सामने कुछ नहीं हैं, चाय कम पानी हैं। तुम अद्भुत हो, बेमिसाल हो, तुम्हारी एक झलक पाने के लिए मैं बेचैन हो उठता हूँ, जब तुम अपने मेकप रूम में होती हो तो मैं तुम्हारे बाहर निकलने का इन्तजार करता हूँ, जब तुम सज धजकर स्टेज पर जाने के लिए होती हो तो तुम्हें करीब से देखकर और कभी-कभी तुम्हें स्पर्श पर मैं धन्य हो उठता हूँ. हांलाकि यह गलत है, मैं जानता हूँ की इस तरह किसीको छिप-छिपकर देखना अच्छी बात नहीं है, लेकिन क्या करू, दिल के हाथों मजबूर हूँ । दिल है की मानता नहीं , चैन नहीं आता , फिर नींद नहीं आये । जब कोई , दिल में समा जाए, और तुम तो सिर्फ समाई ही नहीं बल्कि मेरे दिल पर पूरी तरह से कब्जा जमा चुकी हो। यह बात थोड़ी सी अटपटी जरूर लगेगी मगर यह सच बात है की मैं उम्र की इस गंभीरता को अच्छी तरह से लेता हूँ, मैं जानता हूँ की यह काम इतना आसान नहीं , पत्र में पहले भी मैं इसका जिक्र कर चुका हूँ, यह भी कह चुका हूँ की मुझे सिर्फ उंगा। बच्चा समझकर ही नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा, मैं प्रेमी हूँ और सच्चे प्रेमी बहुत कम मिला करते हैं, आज इस स्वार्थ और लालच के जमाने में मुझे जैसा आशिक मिला खाने का काम नहीं है।मैं बेसब्री से तुम्हारा इन्तजार करूँगा , तुम्हारे पत्र का इन्तजार करूँगा, जानती हो मैंने इस बारे में क्या सोच रखा है, मैं सोचता हूँ की जब तुम इस पत्र को पढोगी तो मेरी भावनाओं को समझ जाओगी , पहले तो तुम सोचोगी की नासमझी के कारण मैंने भावुक बाते लिख भेजी हैं, तुम शायद इसे मेरा जिस्मानी स्वार्थ भी समझ सकती हो , लेकिन सच्चाई इस सबसे अलग है। ऐसी कोई भी बात नहीं है। सच्ची और अच्छी बात यही है की तुम्हारा सच्चा प्रेमी हूँ, मुझे लगता है की तुम सिर्फ और सिर्फ मेरी हो,तभी तो अब तक तुम्हें कोई जीवन साथी नहीं मिला, ना जाने कितने ही मिले भी होंगे मगर आखिरकार कोई तुम्हारे साथ नहीं है , होता भी कैसे जब तकदीर में तुम्हारा हमारा मिलन लिखा था । इस मोहब्बत से बड़ी दुनिया में कोई चीज नहीं है । दुनिया की हर दौलत इसके आगे छोटी है।उम्र , रंग प्रदेश और देश का भेदभाव प्यार ने कभी नहीं किया, तभी तो इसे पवित्र और महान कहा गया है, तुम्हारा व्यक्तित्व भी आकर्षक और महान है।
पत्र का मजमून मन को मोहने वाला था मगर कुछ लंबा हो गया था। उसे पढकर अजय और अहमद के चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे, लिखने वाले ने खूब मिर्च मसाला लगाकर लिखा था।
Wednesday, February 24, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment