Sunday, January 4, 2009

रंगीला रतन, भाग-६७

जीशान की बातों में बड़ा रस था , एकाध बार तो रंजना का मन भी हुआ की उसको तोकडे मगर ऐसा करने के बदले वह उसकी बातों में मजा लेने लगी थी... तारीफ करने में उसका कोई सानी नही था... वह रंजना के सीने , होठों की , उसकी झील सी गहरी आंखों की और गालों की तारीफ में कह रहा था-
- तुम्हारा भी कोई जवाब नहीं है... जैसी ये गोलाइयां हैं, ऐसी मैंने आज तक किसी लड़की की नहीं देखीं... बोलीवुड की बात तो छोडिये, होलीवुड में भी ऐसा ने अजारा देखने को नहीं मिलता है... मैं इंग्लिश फिल्म देखना ज्यादा पसंद करता हूँ, रोजाना पार्टी करना और तुम जैसी अच्छी दोस्तों के साथ रात बिताना मुझे अच्छा लगता है... देख रही हो, शहर में कितने अपराध हो रहे हैं, अन्दार्वार्ड के लोग जब चाहें और जिसे चाहें, गोली मार देते हैं... ऐसे यह भी पता नहीं चल पाटा की हमारी साँसें कब तक चल रही हैं...सिर्फ़ अपराध ही नहीं अतिश्योक्त्याँ भी बढ़ रही हैं... कभी बी ही कुछ भी हादसा हो सकता है...सोचता हूँ की जितना भी वक्त है, उसको प्यार मोहब्बत में ही गुजारा जाए... मरने के बाद क्या होगा , कौन जानता है... इन नर्म, रसीले होठों ने मुझे इतना बेचैन कर दिया है की रह रह कर इन्हें चूमने की इच्छा जाग्रत हो रही है... क्या मैं अपनी हसरत पूरी कर सकता हूँ ? मुझे तुम्हारे परमीशन का इंतजार है...
रंजना- अच्छा, शैतान कहीं के, अब तक तुम जो हरकत कर रहे हो, कए वे भी मुझे पूछ कर ही कर रहे हो ?
जीशान- ये घटाओं जैसी जुल्फें किसी को भी दीवाना कर सकती हैं, किसी का भी चैन लूट सकती हैं... तुम्हारे यौवन के दरिया के दरिया में कोई भी अपना चैन करार खो सकता है....
रंजना- तुम भी कम नहीं हो जीशान, मुझे तुम्हारे हर शब्द से जिंदा दिली नजर आती है... मैं असमंजस में इसलिए हूँ की रमेश को ही अपना सब कुछ मान चुकी हूँ,... मैंने इसके साथ पूरा जीवन गुजारने का फैसला कर लिया है... अब इस मोड़ पर मैं कैसे तुम्हारे साथ काम क्रीडा का सुख भोगू ? उस स्थिति में,जबकि वह ख़ुद भी यही है...
जीशान- इसमे प्रोब्लम क्या है ? आखिरकार रमेश भी तो दूसरी किसी लड़की यानी की मेरी दोस्त के साथ आनंद भोग रहा है... क्या सुख पर उसी का अधिकार है ? क्या वही तुमसे अलग सुख भोग सकता है.... वह तो पहले ही इजाजत दे चुका है... तुम बहुत भोली हो... अब जमाना इतना आगे बढ़ चुका है की कुछ पूछो मत... जमाने के हिसाब से अभी तुम बहुत पीछे हो... अब जिन्दगी जीने का तरीका बदल चुका है... सभ्यता और संस्कृति का पैमाना बदल चुका है... हमको दुनिया की कसौटी पर भी तो खरा उतरना है... वरना हम यहीं का यहीं रह जायेंगे और दुनिया न जाने कहाँ पहुच जायेगी...
रंजना- लेकिन पार्टनर बदलकर जिस्मानी सुख भोगने भर से ही क्या यह दुनिया आगे पहुचेगी ?
जीशान- मैंने ऐसा कहाँ कहा ? सिर्फ़ इस्सी से नहीं, मगर यह भी तो उसीसे ज्वाइंट मामला है...
जब रंजना ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया और दिया भी तो एकदम तथ्हीं ... इसी से जीशान के हौंसले बुलंद हो गए... रमेश और जीशान की फ्रेंड पहले से ही सेक्स का सुख लूट रहे थे... जीशान की दोस्त अजीब सी आवाजें निकाल रही थी... उसके शब्दों में दर्द था, ऐसा लगता था जैसे वह जीवन में पहली बार काम क्रीडा कर रही हो... उसके शब्दों से रंजना और भी कामोत्तेजित हो गयी ... उसने जब जोरदार अंगडाई ली तो जीशान ने मौके का फायदा उठाने में ज़रा भी चूक नहीं की... उसकी दोनों गोलाइयों को अपने हाथों में दबा लिया... इस बार रंजना भी खामोश रही... जीशान खुल गया ... उसने फ़िर तारीफ की-
-वाह, दिल खुश हो गया ... मेरी यह दोस्त ,जो रमेश के साथ एश कर रही है, वह तुम्हारे जितनी मस्त नहीं है... इसका फिगर भी तुम्हारे सामने कहीं नहीं टिकता... बड़ा नसीब वाला है रमेश,जिसे तुम जैसी हसीना से प्यार करने का मौका मिला... मैं ख़ुद को भी कम खुशकिस्मत नहीं मानता ...



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