Sunday, January 11, 2009

रंगीला रतन, भाग-74

ऐसी एकाध बात हो तो कुछ कहूं भी, तुम्हारे माथे पर तो ऐसी सैकडों कलंक हैं... मुझे तुमसे घिन आने लगी है... मन में यह विचार आते ही मुझे बड़ा अजीब लगता है की मैं तुम जैसे लड़के को अपना मित्र , अपना प्यार समझती रही... क्या सोचकर मैंने तुम्हें अपना तन -मन अर्पित कर दिया .... ओह रमेश, तुमने ये क्या किया, क्यों किया ? मैंने तुमको क्या समझा था, और तुम क्या निकले ? कम से कम वफ़ा नहीं कर सकते थे तो बेवफाई भी तो नहीं करनी चाहिए थी.... मेरे दिल को तोड़कर तुम्हें क्या मिला ? तुम जैसे घटिया आदमी से अपना नाम जोड़ने के ख़याल से ही मुझे नफरत होने लगती है....जानवर भी अपने शत्रु और मित्र को पहचानते हैं....मगर तुम तो उससे भी गए गुजरे निकले...तुमने कभी किसी कुत्ते को अपने मित्र से गद्दारी करते देखा है ? जब वे भी इतनी समझ रखते हैं तो हम तो आख़िर इंसान हैं, हमको अपनी मर्यादा का ख़याल रखना चाहिए।
रमेश - अगर तुम्हें लगता है की मैंने अपराध किया है तो मैं क्षमा मांगने के लिए तैयार हूँ, मेरा भगवान् जानता है की मैंने जान बूझकर कुछ नही किया ,,,जो भी हुआ ,अनजाने में हुआ है.... तुम तो जानते हो ,उस समय हम लोगों ने कितनी पी ली थी.... तुम , हम और यहाँ तक की जीशान भी बहुत नशे में था... वह ख़ुद भी शर्मिन्दा है... बेचारा माफी मांगना चाहता है... जो हुआ उसे भूल जाओ, हमको आपस में इस तरह तकरार नहीं करनी चाहिए... तुम तो जानती ही हो की हमारी मंजिल कहाँ हैं ? हमको एक जन्म तो क्या सात जन्मों तक साथ-साथ रहना है... हमें प्यार की एक नई इबारत लिखनी है... तुम्हीं ने तो कहा था की कोई भी बाद्गआ हमारे प्यार की दीवार नहीं बन सकती... ध्यान है, हमने कितनी कसमें खाईं थी, कितने वायदे किए थे... क्या तुम उन सबको भूल जाओगी ?
रंजना- ये प्यार मोहब्बत के कसमे वादे , जज्बाती इरादे आदि को उस समय कैसे भूल गए तुम ? क्या उस समय तुम्हें कुछ याद नहीं था... ?उस वक्त तुम्हारे मन में ये भाव नहीं आए ?
रमेश - तुम किसकी बात कर रही हो ? कौन से वक्त की ? मेरी समझ में भी तो कुछ आना चाहिए...
रंजना- सब समझते हो तुम ...मैं उस समय की बात कर रही हूँ, जब तुमने दस हजार के लालच में कुझे अपने दोस्त जीशान की हवस की शिकार बनवा दिया... अगर वह सौ जन्म भी लेता तो भी मैं उसको इस से हाथ नहीं लगाने देती.... यह जीवन मैंने तुम्हारे नाम कर दिया था रमेश, मैं सिर्फ़ तुम्हारी बनकर रहना चाहती थी ,और तुमने मेरे साथ इतनी बड़ी दगाबाजी की.... आख़िर क्यों ? मेरे प्यार में कुछ कमी रह गयी थी,जो तुम उस जीशान की गर्ल फ्रेंड के साथ मेरे ही सामने सेक्स कर रहे थे... उस वक्त मेरी क्या हालत हो रही थी, क्या तुम अनुमान लगा सकते हो ? अरे तुम क्या अनुमान लगाओगे, तुम्हें तो दूसरी लड़की के साथ मौज मस्ती करने का अवसर मिल गया... दस हजार नकाफ्द मिल गए,,, और क्या चाहिए ? मेरा क्या है ? अगर मैं नाराज हो भी गयी तो तुम्हारी बला से ... तुम्हें इस्ससे क्या फर्क पड़ने वाला है ? तुम तो बस हवस के पुजारी हो, प्यार की तुम्हें क्या जानकारी है? तुम जैसे लोगों के लिए यह प्यार सिर्फ़ एक जाल या दाने की तरह होता है, इसकी आड़ में शिकार को फंसाया और फ़िर हलाल कर दिया .... मेरे साथ भी इससे ज्यादा कुछ नही हुआ...
रमेश- इस बात का कोई सबूत है ? अब हमारे प्यार को तुमने इतना कमजोर बना दिया है की कोई भी झूठी कहानी गढ़कर उसको जब चाहे ख़त्म कर सकता है ? मुझे ख़ुद को निर्दोष सिद्ध करने का एक अवसर तो दो ... क्या झूठे आरोपों से तुम अपने प्यार का गला घोंट सकती हो ? क्या कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका का नुक्सान चाह सकता है, वो भी उस स्थिति में जबकि वह उसको टूट टूटकर चाहता हो... उस पर अपनी जान छिड़कता हो.... मैं तो तुम्हें इससे भी बढ़कर चाहता हूँ, आने दिल से जानकर देखो, ग़लत है क्या ?
रंजना- मैं तुम्हें एक नहीं हजार अवसर देती , अगर मेरा दिल यह मानने को तैयार हो जाता... अरे जब तुम मेरे सामने दूसरी लड़की के साथ अपनी जिस्मानी प्यास बुझा सकते हो तो मैं समजता हूँ की तुम किसी भी हद तक जा सकते हो ....
रमेश- यह तुम्हारे पिता की कोई चाल भी तो हो सकती है ?










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