हो सकता है मुझे बदनाम करने और हम दोनों की दोस्ती को ख़त्म करने के लिए यह चाल चली गयी हो, दौलत वाले लोग बहुत ऊंची पहुच रखते हैं, तुम -हम समझ भी नहीं पायेंगे और बेवजह जुदा हो जायेंगे, हमेशा -हमेशा के लिए, ठंडे दिमाग से एक बार इन सभी विकल्पों पर गौर करके भी देखिये... तस्बीर साफ़ हो जायेगी...
रंजना- तुम मेरे पिता के ख़िलाफ़ अब एक शब्द भी मत कहना ... अब तक तुम मुझे अपने ही परिवार के ख़िलाफ़ भड़काते रहे और मैं भी दीवानी होकर तुम्हारी हर ग़लत बात को मानती रही...तुमने मेरे मन में उन लोगों के लिए जहर भर दिया, जिन्होंने मुझे जन्म दिया... मेरा सही पालन पोषण किया और मुझे उच्च शिक्षा दिला रहे हैं....यहाँ कोई चाल तो तब चलेगा जब किसी को कुछ पता हो.... यहाँ तो सब कुछ तुमने किया है... जीशान को भी तुम्हीं लेकर आए, उसकी गर्ल फ्रेंड से सम्बन्ध बनाने की पहल भी तुमने की.... फ़िर साजिश का सवाल कहाँ आता है ?यहाँ तो हाल ऐसा है की ऐ से जेड तक सब कुछ तुम ही तुम हो... फ़िर मैं कैसे मान लूँ की इसमे किसी साजिश की कोई गुंजाइश भी हो सकती है.... मुझे नहीं लगता ....
रमेश- कभी कभी आंखों देखी और कानों सुनी बात भी ग़लत निकल जाती है... आज अगर तुम मुझे समझ नहीं पाईं तो ऐसे पछताओगी जैसे कुत्ता को मारकर बंजारा पछताया था.... मेरा यकीन करो....
रंजना- ये डायलोग बहुत पुराना हो चुका है, इसका कोई असर होने वाला नहीं है.... मुझे यह ध्यान आते ही बड़ी कोफ्त होने लगती है की किसी ने मेरे जिस्म को स्पर्श किया हा, वह भी मेरे होने वाले पति के सामने ... तुम पति की जिम्मेदारी कैसे निभा पाओगे, न तो मैं तुम्हारे काबिल हूँ और ना ही तुम मेरे काबिल हो... बेफिक्र होकर अब जीशान की गर्ल फ्रेंड के साथ जश्न मनाओ, वह पार्टनर बदलने में तुम्हारा सहयोग करेगी...
रमेश - इस बार मुझे माफ़ कर दीजिये.... आईंदा कभी शिकायत का मौका नहीं दूंगा... अब मैं किसी दोस्त से बात भी नहीं करुगा, ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी .... बी मैं हमेशा तुमसे प्यार करूंगा, तुम्हीं से मिलूँगा, तुम्हीं से बात करूंगा, ठीक है .... ये लो अब तो मैंने अपने कान भी पकड़ लिए हैं.... चलो, मान भी जाओ....
रंजना- तुम अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहे हो रमेश, मैं तुमसे कोई भी रिश्ता रखने की इच्छुक नहीं हूँ.... मैं तुमसे प्यार नहीं करती... कभी कर भी नहीं सकती.... तुम तो क्या , दुनिया के किसी भी मर्द से अब मैं प्यार नैन कर सकती... तुम सबकी औकात जान गयी हूँ मैं...लड़कियों को खिलौना समझते हो, जब तक जी चाहा हेला और जब जी भर गया तो तोड़ कर कचरे के डिब्बे में फेंक दिया या फ़िर नया खिलौना खरीद लिया... प्यार को खेल समझते हो तुम लोग, व्यापार समझते हो , जहाँ फायदा होता है वहाँ प्यार का राग अलापते हो... जब मैंने तुमसे दोस्ती की तो सिर्फ़ तुम्हारा दिल देखा था, प्यार देखा था, तुम्हारा व्यवहार देखा था... दौलत नहीं देखी थी... आज तुम दोस्ती को दौलत के तराजू में टोल रहे हो...
रमेश- मैं फ़िर कहता हूँ की ऐसी कोई बात नहीं है... ये महज एक ग़लत फहमी वाली बात है....
रंजना- अगर हो सके तो मुझे अकेला छोड़ दो , फ़िर कभी मेरा नाम भी जुबान पर मत लाना............
रमेश- मैं मर जाउंगा ,मेरी जान ,,,,,,,,,,,मुझे इस तरह मत ठुकराओ..........
रंजना- जिसका ज़मीर मर गया ,फ़िर वह जिन्दा बचता ही कहाँ है ? तुम तो बहुत पहले मर चुके हो.......
Monday, January 12, 2009
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