Tuesday, January 13, 2009

रंगीला रतन, भाग-76

फर्क सिर्फ़ इतना है की इसकी जानकारी मुझे देर से हुयी... अब यह जान पाई हूँ की इंसान कितना गिरसकता है... अगर तुम्हारी स्थान पर कोई जिन्दा व्यक्ति होता तो अब तक कभी का चला गया होता...मगर तुम ऐसा नहीं कर सकते... इसके लिए स्वाभिमानी होना भी तो जरूरी है... जो की तुम्हारे पास बिल्कुल नहीं ....
रमेश -तुम चाहे जितना गुस्सा करो, मैं बुरा मानने वाला नहीं हूँ... इस वक्त तुम पर नफरत का भूत सवार है.... अगर मुझे खरी खोटी सुनाने से , मुझे अपमानित करने से तुम्हें तसली मिलती है , तो स्वागत है... मैं बिल्कुल इनकार नहीं करूंगा... भगवान् के लिए यह गुस्सा शांत करो........अनपढ़ ,गंवारों जैसी बातें न करो......हमको दुनिया के साथ चलना है... फिलहाल यह फलसफा सुनाने के लिए नहीं तुम्हारा क्रोध शांत करने के लिए मैं यहाँ पर खडा हूँ...... और कुछ कहना चाहती हो या फ़िर बस ?
शारीक काफी देर से रंजना की बातें सुन रहा था... शराब का नशा उन दोनों पर सवार था... दोनों एक दूसरे में समाने का प्रयत्न कर रहे थे... रंजना उसको अपनी आपबीती सुना रही थी... शारीक धैर्य के साथ यह सब सुन रहा था.... इससे पहले उसे किसी ने इतनी दिलचस्प आपबीती नहीं सुनाई थी... शारीक को चूमते हुए वह बोली-
- रमेश बड़ा जालिम था, वह जानता था की कौन सी बात कब कहनी है... वह बड़ा माहिर खिलाड़ी था... उसने इतनी चिकनी चुपडी बातें कीं की मेरा मन पिघल गया... मेरी इच्छा हुई की एक बार पूरे मामले पर फ़िर से गौर करने में क्या बुराई है? वैसे मैं अभी तक सौ प्रतिशत इस बात से इतीफाक नहीं रखती थी की मेरे साथ जीशान ने रात क्या किया था... बस मुझे धुंधली सी याद थी... मैंने तो रमेश से अनुमान के आधार पर ही ये बातें कहदी थीं... वह लास्ट तक इसी बात पर रुका रहा की उसने कुछ गक्लत नहीं किया... अगर कुछ हुआ भी होगा तो शराब और अन्य ड्रग्स के नशे में हुआ होगा... मैंने कहा -
- अच्छा , ठीक है , अगर तुम बेक़सूर हो तो मुझे जीशान से मिलवाओअगर उसने त्तुम्हें आज दस हजार नहीं दिए होंगे तो मैं मान जाऊंगी... तुम ठहरो, मैं फ्रेश होकर आती हूँ...
रमेश की जान में जान आ गयी ...... उसने मौका मिलते ही एक मैसेज टाइप किया और जीशान को भेज दिया... उसमें उसने सारी कहानी लिखकर भेज दे थी.... जब रंजना नहा धोकर आई तो गुलाब की तरह खिली-खिली नजर आ रही थी...रमेश ने उसके गालों पर कई चुम्बन जड़ दिए...रंजना कुछ पाती उससे पहले ही उसने रंजना के होठों से अपने होठ स्पर्श कर दिए... रंजना का सारा गुस्सा काफूर हो गया...उसके सर का वजन काफी कम हो गया था...अब रमेश ने उसकी गोलाइयों को भी दबा दिया... रंजना उछल पडी ... उसको अब थोड़ा -थोडा आने लगा था... वह शरमाते हुयी बोली-
-रहने भी दो, ये क्या कर रहे हो ?सुबह -सुबह मेरा मूड ख़राब मत करो...
रमेश- और तुमने मुझे जो सुबह -सुबह गालियों का नाश्ता कराया है, उसका क्या होगा ?
रंजना- ठीक है, अभी तो खाना भी बाकी है....
रमेश- तुम मुझसे नाराज मत हुआ करो, अच्छा नहीं लगता ... सचमुच , ऐसा लगता है जैसे की प्राण सूख गए हैं...
रंजना- ऐसा काम बी ही मत किया करो.......
रमेश- ठीक है, अगर चाहती हो की प्यार भी नहीं किया करुँ तो वो भी कम कर दूंगा...








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