कमरे में गज़ब का सन्नाटा छा गया . अजय की माँ का कलेजा तो उछलकर बाहर निकलने के लिए तैयार हो गया. आँखों के सामने अन्धेरा छ गया. उनका लाल , उनका अपना इकलौता बेटा इतनी बड़ी बात को कितनी आसानी से कह गया था . विजय प्रताप सिंह को तो अपने कानों पर यकीन ही नहीं हो रहा था. जैसा फिल्मों में हो जाता है, ठीक उसीतरह का सीन था और उसी खामोशी का फायदा उठाकर चन्दा आशीर्वाद लेने के लिए झुकी, ना तो किसी ने इनकार किया और ना आशीर्वाद ही दिया. अब स्वीटी के पिता के बारी थी . उबोले-
- बेटा , शादी , ब्याह गुड्डा -गुड़ियों का खेल नहीं होता, अभी तुम्हारी उम्र ऐसी नहीं है की सही और गलत का फैसला किया जा सके . माँ- बाप सदा अपनी औलाद की खुशी के लिए काम करते हैं. वे क्यों चाहेंगे की उनका पुत्र परेशान रहे, तुम्हारी और चन्दा की दोस्ती है , ठीक है . आप लोग दोस्त बने रह सकते हैं. इन्हें अपने काम [पर ध्यान देना है और आपको अपनी पढाई पर. कैरियर बनाने के बाद ही आप लोग अगर शादी की बात करें तो बेहतर होगा , इससे होगा ये की तब तक तुम्हारे सोचने समझनी की क्षमता भी परिपक्व हो जायेगी.
विजय प्रताप सिंह- हाँ , बेटे ये सही कह रहे हैं. हम तुम्हारी भलाई चाहते हैं, तुम्हें दुःख पहचाना हमारा भी उद्देश्य नहीं, हमने तुम्हें बड़ी मुश्किल से देखा है बेटा, ऐसे दिल ना तोडो.
अजय- माफ क्लीजिये बाबूजी, मैं वचन दे चुका हूँ, और आपसे ही ये सीखा है की क्षत्रिय को वचन की मर्यादा करनी चाहियी. विष दो मगर किसीको विश्वाश मत दो. मैं बड़े धर्मसंकट में हूँ,समझ में नहीं आता की क्या निर्णय लूं. एक तरफ मेरे जन्मदाता हैं, जिन्होंने मुझे जन्म दिया , मेरा सही पालन पोषण किया और दूसरी तरफ मेरी जीने का मकसद. चन्दा के बिना मैं एक पल भी जीने की कल्पना नहीं कर सकता . इससे अच्छा है की आप सब लोग मुझे आदेश दे , मैं मौत के आगोश में समा जाना चाहता हूँ. सारी दुनिया बस मेरे ही पीछे पडी है. सब लोग बस मुझे ही समझाने में लगे है , ऐसा लगता है जैसे की दुनिया का सबसे नादाँ मैं ही हूँ. अगर मेरे जाने से ही सबको खुशी होती है तो ठीक है , मैं चला जाता हूँ.
तड़प उठी अजय की माँ. उसका बेटा मरने की बात कर रहा था . स्वीटी को भी जोर का झटका लगा , बोली-
-अगर अजय चाहते हैं तो हम लोग इनकी चाहत का सम्मान क्यों नहीं कर सकते ? हमें भी इनकी भवनाओं का ख़याल रखना चाहिए. चंदाबाई में क्या कमी है , उम्र तो लगी रहती है, आज नहीं तो कल सबको इस उम्र तक पहुचना है . मेरी आप लोगों से प्रार्थना है की इनको चन्दा से मिला देना चाहिए ...
माँ- ये तुम कह रही हो बेटी ?मुझे आश्चर्य हो रहा है.
स्वीटी- हाँ, क्या अपनी बेटी की इतनी सी बात नहीं मानोगी ? आप तो मुझे अपनी बेटी से भी ज्यादा मानती हैं, माँ से बढ़कर लाड -प्यार दिया है आपने . बचपन से लेकर आज तक मैंने जो भी माँगा , जिद की , सब आपने पूरी की. शायद माँ -बाप का जन्म ही औलाद को जीवन भर देने के लिए ही होता है माँ.
माँ- ठीक कहती हो मेरी बेटी ... इसीलिए होता है. तुम्हारा दिल बहुत बड़ा है बेटी . तुम त्याग की जीती जागती मूर्ती हो. त्याग की देवी हो . मेरी क्षमता इतनी नहीं है बेटी. मेरा दिल इतना बड़ा दिल नहीं है.
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