Tuesday, May 4, 2010

परिंदा , भाग-८३
अजय-ये देखो न, हम तो आखिर मिल ही गए हैं, अब हारी थकी बातें करने का कोई मतलब नहीं है. मगर तुमने सताया बहुत है.मुझे बताये बिना ही चली
आयीं,मुझसे सूचना देना भी मुनासिब नहीं समझा. आखिर ऐसी क्या दिक्कत थी ?ऐसा कौन सा भूचाल आया जो तुमने ये सब किया ? और क्यों किया ?
क्या तुम्हें मेरी ज़रा भी याद नहीं आयी ? मेरे बारे में कुछ तो सोचा होता , कुछ भी नहीं सोचा .
चन्दा - मैं वक्त के हालात से मजबूर थी, इसीलिए आपके पास होकर भी बड़ी दूर थी. बस इससे आगे मुझसे कुछ न पूछिए , मैं कुछ नहीं बता पाउंगी . प्लीज...
अजय-किसीके हाथों मेरे तक खबर तो भेजनी थी, मुझे बताना तो चाहिए था कि ऐसी -ऐसी परेशानी है, तब हम दोनों मिलकर उसका हल भी निकाल लेते. मगर ये क्या हुआ
कि अपने अजय को अकेला छोड़कर चली आयी, तुमने सोचा होगा मैं तुम्हें ढूंढ नहीं पाऊंगा, मैंने इन सागर जैसी आँखों में अपने लिए प्रेम देख लिया था, अगर तुम
मुझे नकार देती तब मैं तुम्हारा पीछा नहीं करता, मगर किसी दहशत कीवजह से मैं तुम्हें अपने से दूर नहीं कर सकता. किसी भी हालत में नहीं .
चन्दा- ओह, अजय बाबू, जो हुआ सो हुआ , मुझे माफ कर दीजिए . इस वक्त आपने बहुत पी ली है, सो जाइए ... अब हम सुबह मिलेंगे और खूब जी भरके बात करेंगे.
अजय - इतनी मुश्किलों से मिली हो और चाहती हो कि इतनी आसानी से निकल जाओ. आज तो हम खुशी मनाएंगे , जश्न होगा. हम रात भर पियेंगे , नाचेंगे ,गायेंगे , खुशियाँ मनाएंगे
और खूम मस्ती करेंगे. खूब मजा लेंगे . धमाल होगा . आज हम कितने खुश हाँ, ये हम किसे बताएं ? किसके साथ शेयर करें इस खुशी को ? हम जानते हैं , तुम
हमारे माता-पिता के बारे में कछु कहना नहीं चाहती , मग नादाँ तो हम भी नहीं, ब्याह नहीं हुआ तो बरात तो बहुत की हैं. सब कुछ अनुमान लगा लिया है हमने .
सचन्दा- ठीक है, जो उचित समझो. मगर आप आराम कर लीजिए. अगर चाहो तो ये जश्न हम कल मनाएंगे . आपने शायद बहुत पी रखी है ...
अजय- हम होश में हैं, आप टेंशन न लें, ये लेडीज सर्विस वाले बार कहाँ ओरीजनल शराब पिलाते हैं ? ये तो बस उल्लू बनाते हैं. उल्लू ... पानी मिला देते हैं . शॉप पर
असली माल मिलता है. मेरी पास पडी होगी बोतल. मस्त एकदम...
और चन्दा ने उसकी बात मानली. उस रात उन दोनों ने खूब आनंद लिया, खूब खुशियाँ बांटी . अजय की फरमाइश पर चन्दा ने 'हुस्न हाजिर है मोहब्बत की सजा
पाने को, कोई पत्त्थर से न मारे मेरे दीवाने को. कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवानेको' गाना चलाया गया. चन्दा ने इस गीत पर सजीव अभिनय कर अजय को भाव विभोर
कर दिया. भले ही चन्दा कमजोर हो गयी थी, मगर उसके नृत्य और अभिनय का कोई सानी नहीं था. अजय ने जबसे होश संभाला , तब से लेलेकर अब तक उसे कभी
इतनी खुशी हासिल नहीं हुई, जितनी कि आज मिली थी. आनंद के सागर में डूबकर वह चन्दा के साथ ठुमके लगा रहा था, उसे बार -बार अपनी बांहों में भर लिया करता था . चन्दा भी हँसते -हँसते लोट -पोट हो गयी. कई साल के बाद वह खूब खुलकर हंसी थी, काम के दवाब और भाग दौड भरी जिंदगी में जैसे वहहंसना मुस्कराना ही भूल चुकी थी. आज जब अजय ने उसे हंसी की यह सौगात बक्शी तो वह अपने सारे गम भूल गयी . अजय ने उसकी कमर में हाह डालकर कपल डांस करते हुए कहा-
-जानती हो हमें एक दुसरे से मिलाने में सबसे बड़ा योगदान किसका है ? स्वीटी का , अगर स्वीटी मुझे सपोर्ट नहीं करती तो हम दोनों आज शायद मिल भी नहीं पाते , और मैं तो शायद कभी नहीं मिल पाता , क्योंकि तुम्हारे जाने के बाद तो जैसे मैं पागल हो गया था, एकदम निराश . मुझे उस अँधेरे से निकालने में स्वीतिऊ का बहुत बड़ा योगदान है, यहाँ तक कि उसीने यह पता लगाया कि तुम मुबई में मिल सकती हो.
चन्दा- अच्छा , तुम विधायक जी की बेटी की बात कर रहे हो, अपनी बचपन की दोस्त की , बहुत भली लड़की है वो, सच कहूँ तो तुम्हारी और उसकी जोड़ी बहुत जमती है.
अजय- हाँ , अच्छी तो है, बड़ी कृपा है उसकी .













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