अजय ने स्वीटी की तरफ ऐसे देखा जैसे कोई किसी संत महापुरुष को देखता है .स्वीटी कि आँखों में सहयोग के भाव थे, उसकी मुस्कान बेहद मोहक थी. अजय को स्वीटी की उपस्थिति से बल मिल रहा था. आजकल उसे बेगाना जैसा बना दिया गया था, उसकी माँ भी उसके सामने ज्यादा नहीं आ रही थी. दिन में एकाध बार आ भी गयी तो खिची -खिची सी रहती थी. बिना कहे सुने लंबे -लंबे कदम रखती हुई निकल जाती थी. और अजय के पिता विजयप्रताप सिंह तो एक बार भी उसके सामने उपस्थित नहीं हुए , कोई बात नहीं हुई. अब अजय पूरी तरह से नौकरों के हवाले था. ये नौकर उसके पिता के वफादार थे. घर में गम जैसा माहौल था. अजय को अभी तक पाता नहीं चला कि चन्दा कहाँ पर है, उसे कहीं भेज दिया गया है या फिर भगा दिया गया है. उसके दोस्तों के घर आने पर पाबंदी थी. फोन को देखना तो दूर उसका ख़याल भी नहीं आये , ऐसे इंतजाम किये गए थे. एक बस स्वीटी ही ऐसी थी जो मौत के घर में सुकून कि तरह थी. वह हवा के शुद्ध झोंके कि तरह थी. वह प्राण दायक वायु की तरह थी. स्वीटी ही उसकी एकमात्र दोस्त थी. और यह सब जानबूझकर किया जा रहा था, स्वीटी और अजय के रिश्ते की बात तो पहले से ही पक्की थी, बस औपचारिकता का जामा पहनाया जाना था. और जब अजय और स्वीटी के परिजनों को लगा कि पानी अब हद से गुजरने लगा है तो फ़ौरन स्वीटी को कवच बनाकर भेज दिया गया, इसके पीछे उनकी सोच ये थी कि अगर स्वीटी अजय के साथ रहेगी तो उसके सामने वह चन्दा जैसी उम्रदराज महिला को जल्द ही भूल जाएगा और स्वीटी के प्यार में खो जाएगा, स्वीटी थी भी गजब कि जीनियस और सुन्दर, वह अभी कली ही तो थी. मुस्कराती तो फूल झरने लगते थे, अभी-अभी उसके सीने के उभार बढ़ने ही शुरू हुए थे, ललचाए लोगों कि द्रष्टि से बचने के लिए अब स्वीटी अपने यौवन के उभारों को छिपाने लगी थी, मगर दुपट्टे में भला हिमालय को समाया जा सकता है क्या ? स्वीटी को जब अजय काफी देर तक घूरने लगा तो मुस्कराते हुए पूछने लगी-
-ऐसे क्या देख रहे हो अजय बाबू, मेरा साथ अच्छा नहीं लग रहा है क्या ? शायद आपकी दोस्त बहुत खूबसूरत होगी, और किस्मतवाली भी जो आप जैसा चाहने वाला दोस्त मिला. आप जैसा प्यार करने वाला मिला. ऐसा नसीब हर किसीका नहीं होता. सब लोगों को प्यार के बदले प्यार नहीं मिलता. सुना है सबको पूरा जहाँ नहीं मिलता. कोई जिसे टूटकर चाहता है, वह किसी और को चाहता है. दस्तूर सा लगता है , जमाने का.
अजय- तुम कैसे बहकी-बहकी शायरों जैसी भाषा बोल रही हो. लिखने -लिखाने का भी शौक है क्या ?
स्वीटी- हाँ , शायरी तो दर्द से जन्म लेती है. जब सीने में दर्द का तूफ़ान उठता है तो उस समय कुछ शब्द कुलबुलाने लगते हैं, लोग इन शब्दों को शेरो शायरी , कविता या गीत गज़ल का नाम दे देते हैं. मैंने भी थोडा बहुत लिखा है , मगर वह क्या है, कैसा है, कुछ पता नहीं. जो दिल में आता है , उसे कागज़ पर उतारती रहती हूँ.
अजय- वाह, बहुत गुनी हो तुम तो. तुम आज हारी थकी बातें क्यों करती हो, तुम भी तो जहां में किसी से कम नहीं हो, कितना मीठा बोलती हो, कितनी अच्छी बातें करती हो, वो क्या कम किस्मत वाला होगा जिसे तुम्हारा साथ मिलेगा, जो तुम्हें चाहेगा वह भी तो दुनिया का सबसे किस्मतवाला होगा. मैं दुआ करूँगा कि कि तुम्हें चाहने वाला सबसे सुन्दर,, सबसे ताकतवर और सबसे ज्यादा समृद्ध और सुखी हो , ताकि वह तुम्हें हमेशा खुश रख सके.
स्वीटी- शुभकामनाओं के लिए शुक्रिया अजय बाबू....
अजय- इसमें शुक्रिया कि क्या बात है ? क्या कभी अपनों को धन्यवाद दिया जाता है ?
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