मगर उसके दोस्त की यह बात बेचारे अजय के जीवन में खरी नहीं उतरी , वह अपनी माँ के सामने खूब झुका, उनसे अपनी मोहब्बत की भीख माँगी , लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उसकी माँ भी पत्थर की तरह सख्त हो गयी. आम दिनों में अजय रोजाना शेरे वाली माँ के मंदिर जाता था मगर उसने निर्णय किया की अब वह मंदिर नहीं जाएगा, जब हाड मांस की असली माँ ही ने ही उसे दुत्कार दिया तो मंदिर में तो पत्थर की माँ है. वहाँ जाने से क्या मिलेगा ? और क़यामत उस समय आयी जब अजय के पिता विजयप्रताप सिंह के सामने यह भेद खुला .यह भेद खोलने वाली कोई और नहीं उसको जन्म देने वाली माँ ही थी. अजय के पिता ने जब यह समाचार सूना तो मानो भूकंप आ गया.
उस पर पागलपन सवार हो गया, वह अपनी बन्दूक निकालने लगे . बड़ी मुश्किल से उसे लोगों ने रोका. वे चन्दा को मौत के घाट उतारना
चाहते थे . उनके चेले चपाटे भी खूब गुसे में थे. सबका एक ही मत था की चन्दा को या तो मौत की सजा दी जाए या फिर उसे गाँव निकाला
दिया जाना चाहिए. अजय की माँ ने उसको समझाया , उंच -नीच का वास्ता दिया और कहा-
- आप यह क्या गज़ब ढा रहे हैं. उस नामुराद के चक्कर में अपने खानदान का नाम खराब करना चाहते हैं , जानते हैं अगर उसे कुछ भी हुआ तो
मामला टूल पकड़ लेगा . आपके विरोधियों की भी कोई कमी नहीं है. मौक़ा देखकर सब दुश्मन एक हो जायंगे . फिर आपका विधायक बन्ने का सपना
महज एक सपना ही रह जाएगा. औरत का मुद्दा बनाकर विरोधी आपको घेरने का अवसर नहीं छोड़ेंगे. यह जोश में आकार होश खोने का वक्त नहीं है
शान्ति से काम करना है, बिलकुल प्यार से. तभी ऐसा हो सकता है की सांप भी मर जाए और लाठी भी नहीं टूटे. आप अपना लक्ष्य ध्यान रखिये ,
अर्जुन की तरह सिर्फ मछली की आँख पर अपनी आँख गढाए रखिये . आपका लक्षय है विधायक बनना , वो भी इसी आने वाली योजना में . टिकट
ऐसे ही आसानी से नहीं मिला करते. आपने पार्टी के लिए इतनी मेहनत की है . चन्दा देते हो. हर कार्यक्रम में बढ़ -चढ कर हिस्सा लेते हो. लोगों के काम
करते हो. अपने खर्चे से कितनी ही गली पक्की कराई हैं. कितने ही लोगों को दूसरी पार्टी से तोड़कर इस पार्टी में लेकर आये हो , यह सब कुछ बेकार चला जाएगा
अगर अब समझदारी से काम नहीं लिया गया तो .
विजयप्रताप- तो फिर आप ही बताएं , हम क्या करें, क्या हाथ पर हाथ धरे चुप बैठे रहें ? हमारे इकलौते बेटे को हमसे छीनने की कोशिश की जा रही है और
हम कुछ न करें ? आखिर ये दौलत, शौहरत, राजनीति किसके लिए है ? जब हमारा बेटा ही हमसे दूर हो जाएगा तो इतनी मेहनत हम किसके लिए करें ?
अजय की माँ अजय के पिता की बात सुनकर थोड़ी देर के लिए खामोश हो गयी , फिर अपने होठ काटते हुए बोली-
- इतना आसान नहीं है हमसे हमारे बेटे को जुदा करना . मैं मिलूंगी चन्दा से, उसे प्यार से समझाऊँगी . भीख मांगूंगी उससे अपने बेटे की . वह भी आखिर एक औरत
है, मेरा दर्द वह जरूर समझेगी . और अगर फिर भी नहीं मानी तो आप आजद है. जो चाहें सलूक करें , हमें मंजूर होगा . अगर उसे दुनिया से उठाना हुआ तो पहली
गोली उसके सीने में मेरी होगी. फिलहाल आप नौटंकी चलने दें. जब तक का उसका करार है , उसे पूरा होने दें. गाँव वालों को कुछ भी पता नहीं चलेगा . अगर नौटंकी रूकती है
तो तरह-तरह की बातें होंगी. और इस नौटंकी को देखने के लिए सिर्फ इसी गाँव के लोग तो नहीं आते. आसपास के कम से बीस गाँव के लोग आते हैं. इसलिए कुछ बवाल करना
ठीक नहीं है. इस मामले को मुझे सौंप दीजिए , मैं अपने तरीके से हेंडल करती हूँ. क्या अब वह मुझे मिल सकती है , शायद हाँ, यह समय उससे मिलने का है . आप रुकें
मैं जाकर आती हूँ. उससे विस्तार से बात करती हूँ, आखिर वह चाहती क्या है ? क्या उसे दुनिया में मेरा ही बेटा मिला था फांसने के लिए ?
वह बुदबुदाती चन्दा के कमरे की तरफ चलदी . उसके दिल में भभूडे से उड़ रहे थे.
Sunday, April 11, 2010
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