Thursday, April 15, 2010

भाग-६४
चंदा- मुझे अपनी कला पर भरोसा है. मैं अकेली जी रही थी, अकेली जी लूंगी.जब मुझे यहाँ कल का सूरज भी नहीं देखना है तब अपनी कम्पनी का सब ताम-झाम
यहीं छोड़ना होगा, और मैं इसके लिए सहर्ष तैयार हूँ, जब आप सब लोग इसीमे खुश हैं तो मैं भी इसीमे अपनी खुशी तलाश लुंगी , मैं हमेशा के लिए चली जाउंगी.
मेरे पास जो नकद जमा पूँजी है , उसीसे अपनी बसर कर लुंगी.
माँ- तुम हमें समझने की कोशिश तो करो , यह जान तो लो की मैं सच्चे दिल से ये सब कर रही हूँ. भगवान साख्शी है, इस वक्त मेरे मन में तुम्हारे लिए पूरा आदर
सम्मान है, पूरा प्यार है. जब हर साल तुम यहाँ आती हो और अपना खेल खत्म करके जाती हो तब भी तो हम तुम्हें बख्शीश देते थे , तो अब क्या हो गया , क्या अब
इतनी पराई समझ रही हो की ज़रा सी सी बात भी नहीं मान सकती. प्लीज ये रखलो, बुरे समय काम आयेंगे.
चन्दा- जब आपका प्यार मेरे साथ है तो मुझे किसी बुरे वक्त की परवाह नहीं है, आपके इसी आदर से मुझे ऊर्जा मिलती रहेगी. यकीं मानिए मैं खुश रह लुंगी.
माँ- एक प्रार्थना और है चंदाबाई ...
चन्दा - आप आदेश करें, मेरी तरफ से निराशा नहीं मिलेगी.
माँ- तुम्हारे जाने वाली बात अजय को मत बताना, तुम्हें उसीकी की कसम है... चुपचाप चली जाना , हमारी जीप थोड़ी देर के बाद दरवाजे तक आ जायेगी , जब
उसमें बैठकर जा सकती हो . स्टेशन तक या उससे आगे जहाँ तक जाना हो, जीप जायेगी . आशा करती हूँ तुम इस खानदान और मेरी मजबूरियों को समझोगी
अजय के पिता विधान सभा का चुनाव लड़ना चाहते हैं, एक बड़ा राजनीतिक दल उनेहं टिकेट दे रहा है , अगर इस बार उन्हें टिकट मिल गया तो वे जीत
भी जायेंगे , मगर तुम्हारे और अजय के बीच का रिश्ता उन्हें चुनाव हरा सकता है, अजय के रिश्ते की बात जिस खानदान से चल रही हैं, वह बड़ा खानदान है
राजनीति में भी उनका अच्छा -खासा दखल है. अगर अजय का रिश्ता वहाँ हो गया तो विअज्य निश्चित है , वर्ना.....
चन्दा- मैं समजह गयी , मेरी वजह से आपके खानदान को कोई तकलीफ नहीं आएगी. मैं वादा करती हूँ.
और फिर इसके बाद चन्दा उसी शाम चली गयी , कहाँ गयी , क्यों गयी ? किसी को इस बात का पता नहीं चला . हाँ , चन्दा ने अपने मैनेजर रंजन को जरूर एक
पत्र लिखा था, इसी से नौटंकी कंपनी संभाल गयी, रोजाना न्तामाशे होते रहे , मगर चन्दा के आकर्षक न्रत्य और दिल को छूने वाली संवाद अदायगी दर्शकों को जरूर खली
. मगर कोई यह नहीं जान पाया की चन्दा कहाँ गयी. अजय को उसके कमरे में नजरबंद कर दिया गया. उसका घर से बाहर निकलना, दोस्तों से मिलना बंद कर दिया
गया, एक तरह से उसे कैदी जैसा ही बना दिया था, लोगों का सोचना था की समय के साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा . धीरे -धीरे अजय के सर से चन्दा का भूत उतर जाएगा.
इसिलए स्वीटी नाम की उस लड़की को गहर बुला लिया गया था , जिससे अजय के रिश्ते की बात चल रही थीं, ताकि उन दोनों में नजदीकियां बढ़ सकें. स्वीटी अपने
नाम की तरह ही स्वीट थी. सादगी की मूरत, मुस्कराए तो फूल झडें और हंसदे तो हीरे -मोतियों की बरसात हो जाए. बड़ा हसीं मंजर था.बाग में कोयल कुक रही थीं, भँवरे मंडरा रहे थे . अजय और स्वीटी वहाँ खड़े हुए फूलों को निहार रहे थे, अजय के पिता ने कई बोडी गार्ड छोड़ रखे थे. उन्हें देखकर अजय सिहर उठता था. स्वीटी पूछ रही थी-
- लगता है आपको मेरा यहाँ आना अच्छा नहीं लगा ? कहीं खोये -खोये लगते हो . मुझे तो लगता था की मुझे यहाँ देखकर तुम खुशी से फूले नहीं समाओगे मगर शायद ऐसा नहीं लगता . शायद मैं गलत थी.

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