मुझे अफ़सोस है .. मुझ जैसी नाचीज के कारण आपको यहाँ तक आना पड़ा. आप ही बताएं मैं क्या करू ? असल में...
माँ- असल में बात शायद ये है की नौटंकी से अब ज्यादा कमाई नहीं हो रही होगी , अब तुम्हारी उम्र भी वो नहीं रही की गाँव-गाँव जाकर मेहनत कर सको , और मेहनत मशक्कत के बाद दिन भर भांड मटका सका सको, यही ना ? तो तुमने सोचा होगा की इसका कोई इलाज ढूंढा जाए , और अजय से अच्छा इलाज और क्या हो सकता है ? अभी बच्चा है, नादाँ है . उसे आसानी से बहकाया जा सकता है , उसको आराम से फुसलाया जा सकता है और उसके सहारे दौलत भी कमाई जा सकती है . मैं असली बात समझ गयी ना ?
चन्दा - नहीं ठकुराइन साहिबा, क्या आप बी ही ऐसा सोच रही हैं ? क्या आपको लगता है , मैं ऐसा सोच भी सकती हूँ
माँ- आँखों देखी कैसे झुठला सकती हूँ चंदाबाई , मैंने अभी भी अजय को तुम्हारी चौखट से जाते हुए देखा है , इसे मैं क्या समझूं, उसकी तरह मैं तो बच्ची नहीं हूँ, उसकी तरह मेरी आँखों पर तो पट्टी नहीं बंधी है . मैं समझ सकती हूँ की कोई लड़का अकेली लड़की के कमरे में क्या कर रहा होगा ?
चन्दा- प्लीज, ऐसा अनर्थ मत कीजिये , मुझ पर न सही तो कम से कम अपने बेटे पर तो भरोसा कीजिये , जिस तरह गंगा पवित्र है, उसी तरह मेरे और अजय बाबू के रिश्ते पवित्र हैं. मैं अजय बाबू को यही सब समझा रही थी. मैं उनको परेशान नहीं देखना चाहती, वरना कबका दांट देती . यह मुझसे हो नहीं पायेगा मालकिन. आप लोग मालिक हैं, मैं तो आपके टुकड़ों पर पलने वाली कनीज हूँ. मेरी क्या औकात की मैं आपके सामने नजर ऊंची करके भी बात कर सकूं.
चन्दा सौम्य लहजे में अपनी बात रख रही थी, उसकी समस्या यह थी की वह अजय की बुराई भी नहीं करना चाहती थी , इसलिए खामोश होकर बात कर रही थी. वह अजय के परिजनों से भी नहीं उलझना चाहती थी. वह जानती थी की अजय जो चाह रहा है, उससे ऐसा ही बबाल होना निश्चित है . वह दर्द से तडपकर कह रही थी. अजय की माँ भी उसकी बातें सुनकर थोड़ी सी सामान्य हुई, उसकी आवाज की सख्ती खत्म हो रही थी , अपने हाथ मलते हुए अजय की माँ कह रही थीं-
-अब तुम ही कहो , हम कया करें, वह हमारा अकेला लाल है. अकेले बेटे की शादी मैं धूमधाम से करना चाहती हूँ. एक से बढ़कर एक सुन्दर लड़कियों के रिश्ते अभी से आने लगे हैं, अब तुम खुद बताओ , क्या तुम्हारी और उसकी जोड़ी अच्छी लगेगी ? जब तुम लोग सड़क पर निकलोगे तो लोग कहेंगे देखो दादी -पोते जा रहे हैं. तुम खुद कहो ...
चन्दा- मैंने उनको बहुत समझाया है, आप भी उंच नीच समझाइये , मैं नहीं चाहती की उनका कैरियर खराब हो, उनका भविष्य मेरी वजह से बिगड़े . मैं आपके परिवार की खुशहाली चाहती हूँ, इसके लिए अगर मुझे जान भी कुर्बान करनी पड़े तो मैं पीछे नहीं हटूंगी . आप हुक्म करें , मुझे क्या करना है ? फ़ौरन हुक्म की तामील होगी .
माँ- सच ? तुम मदद करोगी हमारी ?
चन्दा- जी हाँ, मई हर तरह तैयार हूँ. जान से बढ़कर तो कुछ भी नहीं , ये भी हाजिर है . और हाँ आपने सच कहा. अब मेरी ऐसी उम्र नहीं रही की मैं गाँव -गाँव तम्बू लगाती फिरूं, दिन भर नाच गाना करू, लेकिन ये सच नहीं है की आगे की जिंदगी के लिए मुझे दौलत चाहिए . और ये भी बिलकुल गलत है की मैं अजय बाबू की मार्फ़त आपसे दौलत लूटना चाहता हूँ. आपके एहसान पहले से ही मुझ पर कम हैं क्या ? दौलत भी कम नहीं . मेहनत और ईमानदारी से इतना कमा लिया है की सात जन्म भी चाहूँ तो बैठकर खा सकती हूँ. दौलत के लिए मैं अजय बाबू का सहारा क्यों लेती ठकुराइन साहिबा , जबकि ठाकुर साहब तो बहुत साल पहले मुझे अपनी पटरानी बनाने के लिए तैयार थे. अगर मैं उस वक्त हाँ कर देती तो जसी दौलत की आप बात कर रही हैं, उसमे से आधे की हिस्सेदार मैं भी होती . अगर मैं गलत कह रही हूँ तो जाओ, जाकर अपने पति से पूछ लो. मेरी बात झूठी निकली तो जो चाहो सजा देना. मैंने साफ़ इनकार दिया था, अपने शरीर को स्पर्श भी नहीं होने दिया , जब मैंने तुम्हारा सुहाग ही नहीं छीना तो बेटा क्या छीनुंगी .
अजय की माँ थर-थर कांपने लगी. जिस स्वाभिमान और गर्व के लिए अजय की माँ ने सब कुछ त्याग दिया था, आज उनका सब स्वाभिमान , सारा गर्व चूर-चूर हो गया. चन्दा ने बड़ी शालीनता से अपनी बात राखी , मगर उसीने अजय की माँ के सीने में भूचाल ला दिया. इस वक्त वे खुद को बहुत बौनी महसूस कर रही थीं. एक नाचने -गाने वाली ने त्याग का जो उदाहरण पेश किया था उससे वे खुद ही दबती चली गयीं.
Tuesday, April 13, 2010
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