Tuesday, December 2, 2008

रंगीला रतन- भाग-36

रंजना का हाल इससे ज्यादा अलग नहीं था, वह भी अपने से कम उम्र के जवान लड़के के साथ जिस्मानी सम्बन्ध बनाकर खुश थी... मन ही मन इश्वर को धन्यवाद दे रही थी... वह मांस खाने में यकीन रखती थी, हड्डियाँ गले में लटकाने में नहीं... रवि को मुंबई ले जाना उसको अच्छा नहीं लग रहा था,फ़िर भी उसकी जिद को देखते हुए कह दिया-
-इस बार तो जाना सम्भव नहीं होगा , हाँ अगली बार आउंगी तो जरूर इस बारे में गंभीरता पूर्वक विचार किया जायेगा... किसी भी काम में जल्दबाजी ठीक नहीं रहती... सोच समझकर किया गया काम हमेशा सफल होता है...
रवि- जाओ, जहाँ जाओगी हमें पाओगी... हम ऐसी चीज नहीं जिसे पत्ते पर रखकर खाया और हाथ चाटकर फेक दिया... हम तो जीने -मरने तक के साथी हैं... आसानी से नहीं भुला पाओगी...






रंजना- ये क्या कह रहे हो रवि, तुम्हें कौन कमबख्त भुलाना चाहता है... तुम कोई भुलाने वाले दोस्त हो ? मैं पल-पल तुम्हें याद करती रहूंगी... दूर रहने से सच्चा प्यार कभी कम नहीं होता , उलटा बढ़ जाता है... मैं तुम्हें रोज फोन किया करुँगी ... तब ऐसा लगेगा जैसे हम लोग साथ में ही रह रहे हैं...
रवि- जैसा भी करोगी, ठीक ही करोगी... मैं इतना जानता नहीं हूँ...
रंजना- मालिस करके तुमने मेरा पूरा शरीर फूल जैसा हल्का कर दिया है... अब मैं बेहद राहत महसूस कर रही हूँ...
रवि- मैं तो सेवक हूँ , अगर मुंबई भी आऊंगा तो इसी तरह की सेवा करता रहूँगा...
रंजना एक बार फ़िर सोच में पड़ गयी... रवि की बात में उसको दम नजर आ रहा था... उसको कहीं किराए के कमरे पर रखा जा सकता था और जरूरत पड़ने पर तलब भी किया जा सकता था... उसने रवि से एकपैग तैयार करने को कहा... आधा पीने के बाद उसने आधा पैग रवि की तरफ़ बढ़ा दिया... रवि ने आदेश का पालन किया ... इसके बाद उनके बीच एक बार फ़िर प्रणय क्रीडा शुरू हो गयी... रंजना के नग्न जिस्म की मालिस करते -करते रवि की भावनाएं भड़क उठी थीं... उसकी आंखों की पुतलियाँ सुर्ख लाल हो चुकी थीं... वासना की आग से बदन झुलसने लगा... रंजना का गदराया हुआ बदन भी अकड़ने लगा था... उसको रवि के आक्रमण का इन्तजार था... धीरी-धीरे वे दोनों करीब आए, एक दूसरे के होठों को चूमने के बाद उन दोनों के गर्म शरीर आपस में रगड़ने लगे... उन दोनों की गर्म साँसें एक दूसरे की साँसों से टकराकर क़यामत का माहोल पैदा कर रही थीं... जब रवि ने रंजना को अपने कब्जे में लेकर उस पर हावी होना शुरू किया तो रंजना के मुख से आह निकलनी आरम्भ हो गईं... मचलकर वह बोली-
- अब जो सुख मिल रहा है, काश हमेशा यही आनंद मिलता रहे...
रवि- बिल्कुल मिलेगा, क्यों नहीं मिलेगा ? न तुमने कभी किसी का अहित किया है और न ही मैंने किसी का बुरा किया है... इसलिए बेफिक्र रहो हमारे जीवन में सदा सुख ही सुख रहेंगे... कभी दुःख नहीं आयेंगे...






Monday, December 1, 2008

रंगीला रतन , भाग-35

क्या वहाँ पर मजदूर लोग नहीं रहते ? मैंने तो यहाँ तक सुन रखा है की मुंबई में सब लोगों को कुछ न कुछ रोजगार जरूर मिल जाता है... मैं तो दूकान चलाने के बारे में भी जानता हूँ... किसी की दूकान पर काम मिल गया तो वहाँ रात को सोने का जुगाड़ भी बन जायेगा... वरना सड़क तो है ही... दिल्ली में भी मैं काफी दिन फुटपाथ पर सोया हूँ... मुंबई में भी सोना पडा तो क्या फर्क पड़ता है, तुम्हारे लिए ये भी कर लिया जायेगा...
रंजना - रवि, तुम्हारी बातें मेरे सर से ऊपर होकर निकल रही हैं... ये क्या कह रहे हो ?मेरे शहर में मेरे रहते हुए तुम फुटपाथ पर रहने की बात करते हो... ये क्या गज़ब कर रहे हो... मैं तुम्हारे स्वाभिमान को समझ सकती हूँ... मैं जानती हूँ तुम ये बातें क्यों कह रहे हो ?
रवि- हम जैसे गरीबों के पास और होता भी क्या है ? समान और स्वाभिमान ही तो होता है... अगर ये भी नहीं रहा तो हम जियेंगे कैसे ? मैं ये नहीं चाहता की लोग तुम पर उंगलियाँ उठाएं और मुझे स्वार्थी समझकर यह ताना मारें की मैंने हराम की रोटियाँ तोड़ने या फ़िर अवसर पाने के लिए ही तुमसे प्यार का नाटक किया है.... ये ताने जिस्म के साथ-साथ आत्मा को भी छलनी कर डालेंगे... मुझेकोई कोई कुछ कहे तो एक बार को सहन भी कर लूँगा मगर तुम्हें कोई कुछ बी ही कहदे , यह मुझे मंजूर नहीं.... चाहे जो हो जाए...
रंजना उसकी बातों से खुश हो गयी... वह रवि के बिस्तर कौशल से तो खुश थी ही अब उसके विचारों से भी प्रभावित हो गयी... रवि की हर अदा पर मर मिटने का दावा करने वाली रंजना -पेशे से डॉक्टर थी , समाज में उसकी एक ख़ास इज्जत थी... यही एक वजह थी की वह रवि का नाम अपने साथ नहीं जोड़ना चाहती थी... उसका सोचना था की जब भी रवि के साथ बिस्तर पर मजा लेने की बात आएगी, वह प्लेन पकड़कर सीधी दिल्ली आ जाया करेगी... यहाँ मौज मस्ती करके वह सुरक्षित मुंबई पंहुच सकती थी... किसी को पता भी नहीं चलेगा और उसका काम भी चलता रहेगा... रवि ख़ुद भी कम समझदार नहीं था , इसीलिए वह फूक-फूक कर कदम रख रहा था... रंजना जो समझ रही थी , रवि के मन में वही भावनाएं काम कर रही थीं... वह चाहता था की रंजना से मिलकर उसकी गरीबी दूर हो जाए... रंजना उसको कितना महत्व देती है, इस बात की फ़िक्र करने वालों में से वह नहीं था... उसका सिर्फ़ और सिर्फ़ एक सूत्रीय विचार यही था की रंजना उसको स्थाई काम पर रख्वादे और कभी-कभी उसको मस्ती करने का समय भी उपलब्ध हो जाए .... मगर इन बातों को जुबान पर कैसे ला सकता था... रवि और रंजना इस वक्त दोनों ही नग्न अवस्था में थे... रवि उसकी मालिश कर रहा था... दोनों पहले ही शारीरिक सुख भोग चुके थे... दोनों ही एक दूसरे से संतुष्ट थे... रवि कुंवारा था, इसलिए नारी देह पाकर वह गूला नही समा रहा था ... रंजना जैसी उच्च शिक्षित हसीना की जवानी का रस लूटकर वह अपने आपको भी ख़ास समझने लगा था...


Friday, November 28, 2008

भाग-३२ , रंगीला रतन

मैं चाहूंगी की तुम्हें हमेशा हीरे मोती ही मिलें... तुम उसीके लायक हो... जिसका जो हक़ है, वह मिलना ही चाहिए...
रमेश- कितना खुशनसीब हूँ मैं... अगर तुम नहीं मिलतीं तो क्या होता ? मैं वास्तब में तुम्हारा आभारी हूँ...न जाने कितने पुण्य के बाद मुझे यह अवसर मिला है...
रंजना जब रवि को अपने बेवफा प्रेमी रमेश की दास्ताँ सुना रही थी तो वह हर बात को तवज्जो दे रहा था, खूब ध्यान से सुन रहा था... रंजना डॉक्टर थी... उसकी ट्रेन मिस हो गयी थी इसलिए वह रवि के पास रुक गयी... रवि गज़ब का खूबसूरत नौजवान था... गाँव का दूध पीकर और शुद्ध हवा खाकर वह हट्टा-कट्टा नौजवान बन चुका था... वह दिखने में बेहद आकर्षक था...

रंजना उस पर पहली ही नजर में रीझ गयी थी... रवि का मालिक कहीं बाहर गया हुआ था इसलिए उसको यह सुखद इत्तेफाक नसीब हुआ ... उसने महसूस किया की रंजना की पलकें झपक रही थीं... वह उसके नग्न बदन की मालिश कर रहा था... रंजना को सुकून महसूस हुआ तो वह नींद के झोटे लेने लगी... रवि ने प्यार से पूछा-

- सो गईं क्या ?

रंजना- हाँ यार , ज़रा आँख लग गयी थी.... मुझे ही पता ही नहीं चला की यह सब कैसे हो गया ...

रवि- वही तो कह रहा हूँ... तुम कह भी रहीं थीं और सो भी रही थीं... मेरे ख़याल से अब तुमको सो जाना चाहिए... कल बात करेंगे... अगर तुम्हारी नींद पूरी नहीं नही हुई तो कल का दिन बी ही ख़राब हो जायेगा...

रंजना- नहीं रवि... कल तो मुझे किसी भी हालत में जाना होगा... मेरा पूरा काम बिगड़ जायेगा... हम दोनों के पास सिर्फ़ यही रात है... इसके बाद पता नहीं अब सुबह हो की नहीं हो... कल किसने देखा है... मैं बहुत डिस्टर्ब हूँ... मैं अपने दिल की हर बात तुमको बताना चाहती हूँ...

रमेश- कभी-कभी तुम दारा सिंह की तरह बहादुर बन जाती हो और कभी-कभी एकदम कायर बन जाती हो... सबसे बुरा हाल मेरा होता हैमैं कुछ समझ ही नहीं पता... खैर फ़िर क्या हुआ ?। तुम उस बेरहम रमेश के बारे में कह रही थीं जिसने प्यार का नाटक तुम्हारे साथ किया और रंगरेलियां किसी और के साथ मनाता रहा ...

रंजना- हां, मैं उसी रमेश के बारे में बात कर रही थी... उसने सिर्फ़ रागिनी या प्रभा ही नहीं बल्कि कई और महिलाओं के साथ भी अन्तरंग सम्बन्ध बना रखे थे... वह रोजाना इन दोनों महिलाओं की शारीरिक जरूरतों को पूरा करता था... इसके बदले में वे वे रमेश को पढाई का खर्च दिया करती थीं... इस कारण रमेश एक नंबर का अय्याश बन चुका था... रोजाना शराब पीना और मौज मस्ती करना ही उसकी दिनचर्या थी... इस कारण उसकी पढाई भी डगमगाने लगी... उसका स्वास्थय भी बिगाड़ने लगा था... वह चेहरे से बेहद मासूम लगता था मगर था बड़ा घाघ... वह जितना जमीन के ऊपर नजर आता था उतना ही जमीन के अन्दर भी था...


Thursday, November 27, 2008

भाग-३१

रमेश- तुम्हारे लिए अभी भी पूरा दम-ख़म बाकी है... मैं ठहरा सेवक... ढोलिया का क्या काम होता होता है ढोल बजाना... कोई समय हो या फ़िर कैसा भी माहोल हो, वह अपने कर्तव्य का निर्वहन करता ही है...
प्रभा - हाँ, ये बात तो है... मैं सोच रही थी की मजा तो मैं भी पहले ही ले ही चुकी हूँ , फ़िर क्यों न अब तुम्हें आराम करने दूँ... आखिरकार तुम कहीं भागे थोड़े ही जा रहे हो...
रमेश- मेरा इतना ख़याल रखने का शुक्रिया... मैं जीवन भर तुम्हें याद करता रहूँगा...
प्रभा- एहसान तो तुम्हारा है मुझ परतुमने मेरे अंधेरे रास्तों को उजालों से रोशन कर दिया है...
रमेश- और मैंने तो डॉक्टर बन्ने की आश भी छोड़ दी थी... यह तो अच्छा हुआ की तुमने अपनी सहेली से मेरा यह काम करवाने का आश्वाशन दिलवा दिया... जब उन्होंने कह दिया है तो उस पर अमल भी करेंगी ही... वैसे तो सभ्रांत महिला लग रही थीं...
प्रभा- इसमें डाउट करने जैसी कोई बात नहीं है... वह मेरी बचपन की सहेली है... मैं उसको बहुत अच्छी तरह से समझती हूँ... उसका अरबों का व्यापार है... जुबान की पक्की है... थोडी सी मनचली और जिद्दी किस्म की है... बस इतना ध्यान रहे की उसको कभी नाराज ही मत करना... जब भी एडमिशन का समय हो तभी बता देना... सारा काम वह ख़ुद करवा डालेगी... अगर चाहो तो कुछ पैसे मैं एडवांस भी दिलवा सकती हूँ...
रमेश- यह काम कल हो करवा देंगी तो अच्छा रहेगा, क्योंकि मुझे रुपयों की सख्त जरूरत भी है... ऐसा मैं इसलिए नहीं कह रहा हूँ की मुझे रागिनी पर विश्वाश नहीं है... बल्कि जरूरत की वजह से कह रहा हूँ... तुम तो समझ रही हो न...
प्रभा- हाँ , अच्छी तरह से... तुम्हें रागिनी से मिलवाने का मकसद भी यही है की तुम्हारी आर्थिक तकलीफें दूर होती रहें... तुम भी याद करो की कोई मिली थी... वरना तुम जैसे खूबसूरत नौजवान का प्यार मैं हरगिज नहीं बांटती ...
रमेश- अगर ऐसी बात है तो मैं पैसे और प्यार में से प्यार को चुनना पसंद करूँगा ... मुझे रागिनी की दौलत से तुम्हारे मोहब्बत की अथाह दौलत पसंद है...
प्रभा- तुम्हारी भावनाओं को मैं अच्छी तरह से समझती हूँ... मगर यह भावुक होने का समय नहीं है... अच्छा वक्त हमेशा नहीं मिलता... कहते हैं की दुनिया में रोजाना सोने चांदी की नदी बहती हैं... जो पारखी लोग होते हैं वे इन्हें हासिल कर लेते हैं और नादाँ के हाथों में पत्थर के सिवाय कुछ नहीं मिलता...

Wednesday, November 26, 2008

भाग-30

इसी कारण रमेश ख़ुद को कमतर समझने लगा था... प्रभा उसको बार-बार मुबारकबाद दे रही थी... उसके गालों को सहला रही थी... उसके शरीर से वह इतने करीब से चिपकी हुयी थी की अगर रमेश थका हुआ नहीं होता तो अब तक वह गर्म हो गया होता... प्रभा कह रही थी-
- तो रागिनी को तुमने शीशे में उतार ही लिया ... अब तुम्हारे सुनहरे दिन शुरू हो जायेंगे ...
रमेश- इश्वर जाने, मेरे साथ क्या होने वाला है ? पता नहीं मैं किस उलझन में फंस गया हूँ... कहीं ऐसा तो नहीं की मजे-मजे में ही मुझे जिगोलो बना दिया गया है...
प्रभा - दोस्ती में ऐसा नहीं कहते... तुम रागिनी के ख़ास दोस्त बन चुके हो... वह तुमसे बच्चे की उम्मीद भी कर चुकी है... ऐसे में तुम अपने आपको जिगोलो की बजाय उसका पति क्यों नहीं मानते ?
रमेश - क्योंकि पति भाड़े पर नहीं मिलते ... पति सिर्फ़ मनोरंजन की चीज भी नहीं होते...
प्रभा- ओह, कमाल करते हो रमेश... रागिनी की बात का बुरा मान रहे हो... वह सिर्फ़ पति को ही नहीं बल्कि जिन्दगी को भी मनोरंजन का साधन मानती है... सबका नजरिया अलग होता है... जिन्दगी को देखने का भी और जिन्दगी को जीने का भी... तुम बिल्कुल जुदा सोच रखते हो, मेरी उससे भी जुदा और किसी और की सबसे जुदा हो सकती है... इसमें बुरा मानने का कोई अर्थ नहीं होता... अगर आगे बढ़ना है तो दोस्तों से नए-नए आइडिये सीखने पड़ते हैं, उनकी बात माननी पड़ती है...
रमेश- मैं अपनी जान भी देने को तैयार हूँ , मुझे कोई एतराज नहीं है...
प्रभा- फ़िर दिक्कत कहाँ हैं ? तुम खुशनसीब हो जो रागिनी जैसी दोस्ती मिली है... तुमने तो देखा ही होगा की सड़कों पर कितने ही जवान लड़के घुमते रहते हैं...और उन्हें कोई नहीं पूछता ... बेचारे कितने ही तो वैश्यालय में जाकर अपने तन की आग बुझाते हैं और बहुत से तो बलात्कार जैसा अपराध ही कर डालते हैं... प्रणय क्रीडा एक प्राक्रतिक जरूरत है, इसको कोई नकार नहीं सकता... इधर-उधर गंदगी में मुह मारकर सेहत, समय और पैसा खर्च करने से तो यही बेहतर है की हम जैसे साफ़ सुथरे ,सेहतमंद और दौलतमंद लोगों से ही सम्बन्ध बना लिया जाएं... इसमें तुम्हें कहीं से भी घाटा नहीं हो रहा ... फायदा तुम्हारा ही है ...
रमेश- मैं स्वाभिमान की बात कर रहा था... जब रागिनी मैडम ५०० का नोट देकर गईं तो नजरें नीचे झुक गईं... तब से लेकर अब तक मैं अपने आपको गुनाहगार समझ रहा हूँ
प्रभा - यह भी कोई बात हुई ? प्यार में इस तरह की भावनाएं नहीं रखी जानी चाहिए... प्यार कभी उंच-नीच नहीं देखता ... यह तो उस एहसास का नाम है जो सबसे पवित्र और हसीं होता है...
रमेश- तुमने तो मेरेजेहन को ही साफ़ कर दिया ... अब मैं अपने दिल पर बोझ नहीं रखूँगा...
प्रभा- मन में कोई और संदेह तो नहीं है ?
रमेश- अब कैसा संदेह ? अब तो बस प्यार के इस कारवाँ को आगे बढाना है ... क्या एक बार और प्यार करें ?
प्रभा- अब नहीं... कुछ जोश कल के लिए भी रहने दो...




Tuesday, November 25, 2008

भाग-29

रागिनी- हां, प्रभा मुझसे बहुत प्यार करती है... इतना की मैं बयान नहीं कर सकती...

प्रभा- अगर ये संतुष्ट हो जाए तो मुझे लगता है जैसे की मैं ख़ुद संतुष्ट हो रही हूँ... अगर ये खाना खा ले तो भूख मेरी मिट जाती है... यह मेरी जान से भी बढ़कर है... इसको खुशी देखकर मुझे बहुत अच्छा लगता है...

रागिनी- अब मैं फ्रेश होकर आती हूँ तुम और रमेश मिलकर एश करो... तुम्हारी सारी तकलीफें दूर हो जायेंगी... रमेश जादू जानता है... यह ऐसा जादूगर है , जो जादू तो दिखाता होई है, साथ ही जादू तैयार भी करता है...

प्रभा- ठीक है... अब मेरी फ़िक्र छोडो... तुम दोनों ही यहाँ से बाथरूम की तरफ़ चलो, मैंने खाना तैयार करवा दिया है... नहाने -धोने के बाद खाना खा लीजिये...

रागिनी- नहीं, नहीं ऐसे मजा नहीं आएगा... जब तक तुम भी रमेश के साथ जिस्मानी सुख नहीं भोगोगी तब तक आनंद अधूरा ही रहेगा... मैं यहीं पर रहूंगी... अपने सामने तुमको सुख लूटते हुए देखूंगी...

प्रभा- नहीं.... आज इच्छा नहीं है... फ़िर कभी सही... रमेश तो यहीं रहता है, जब भी मन करेगा, तभी इसकी सेवाएँ ली जा सकती हैं...

रागिनी- इससे पहले भी तो हम इस प्रकार प्रणय क्रीडा का मजा उठा चुके हैं... तुम उस नए लड़के के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना रही थीं और मैं तुम दोनों को उत्साहित कर रही थी... आह, उस समय कितना अच्छा नजारा था... मन में लड्डू फ़ुट रहे थे... तुम उसके होठों को चूम रही थिओं और मैं आनंदित हो रही ...

प्रभा- उस वक्त बी ही तो तुमने ही जिद की थी... मैंने स्वीकार करली... क्या करती, आखिरकार तुम्हारी हर बात तो मुझे माननी ही पड़ती है... और ऐसा मैं किसी मजबूरी के तहत नहीं बल्कि , प्यार की खातिर करती हूँ...

रागिनी- उसी तरह अब भी मेरी बात मानलो... मानोगी तो फायदे में रहोगी ....

प्रभा- कल रही... अगर तुम्हारी इतनी ही इच्छा है तो कल हम दोनों मिलकर साथ-साथ इश्क का खेल खेलेंगे... मैं भी मानसिक रूप से तैयार हो जाउंगी और कल रमेश भी शारीरिक रूप से फिट रहेगा...

रमेश उन दोनों की बातों को ध्यान से सुन रहा था... आखिरकार रागिनी ही मान गयी... उसने प्रभा की बात को स्वीकार कर लिया... रागिनी ने खाना खाने से इनकार कर दिया था... वह जाते-जाते रमेश को ५०० रुपये का एक नोट भी देती गयी... थोडी सी ना नुकर के बाद जिसे रमेश ने स्वीकार कर लिया था... पहली बार ऐसा करते हुए उसे महसूस हुआ जैसे किसीने उसके स्वाभिमान को कुचला है... वह अपनी ही नजर में गिरा हुआ था... उसको लगा जैसे उसको भी पुरूष वैश्या बना दिया गया है... जिस तरह महिला वेश्याओं को दौलत देकर उनके जिस्म का मनचाहा उपयोग किया जाता है , ठीक वैसा ही व्यवहार उसके साथ किया जा रहा था... वह ख़ुद को किसी से नजर मिलाने के काबिल भी नहीं समझ रहा था... ऐसा नही होता है, जब इंसान का नैतिक पतन शुरू हो जाता है...

Monday, November 24, 2008

रंगीला रतन- भाग-28

जब हम कुछ ग़लत निर्णय लेते हैं या फ़िर हमारे साथ कुछ होना होता है तो आत्मा के किसी कोने से इसका एहसास हो जाता है , इसके बावजूद हम उसको नजरअंदाज करते रहते हैं , किसी भी हालत में हम या स्वीकार नहीं करते की ऐसा भी हो सकता है... रमेश का भी वही हाल था... रागिनी की अजीब सी मांग ने उसको पशोपेश में उलझा दिया था... इस उलझन से निकलने की तरकीब सोचते-सोचते वह परेशान हो गया... तभे रागिनी ने उसको याद दिलाते हुए कहा-
-कहाँ खो गए ? जब प्यार के समंदर में गोता लगाने का समय हो तो ज्यादा सोचना -विचारना नहीं चाहिए...
रमेश- सोरी... मैंने यह सब सोचा भी नहीं था... मैं तोतुम्हारी सुन्दरता पर फ़िदा होकर शेर लिखने की कोशिश कर रहा था... अब आकर यह लगता है की शायर लोग किसी खूबसूरत लड़की को देखकर ही शेर लिखना सीखते होंगे... खासकर तुम्हारे होठ बेहद सुंदर हैं... इतने रसीले होठों की मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी... ओह ...
रागिनी कहना तो और भी चाहती थी, मगर वह खामोश रह गयी... उसको पहले यह आभास हुआ था की कहीं रमेश बच्चे के बारे में तो नहीं सोच रहा है, लेकिन वह तो उसकी सुन्दरता के विषय में सोच रहा था... रमेश अब पूरी तरह से उसके साथ था... जोर-जोर से प्रहार कर रहा था... इसी कारण रागिनी गर्म आहें भर रही थी... रागिनी इन गुलाबी पलों को जी जान से जीना चाहती थी... वह मोहब्बत करने की कला में पारंगत थी... उस समय उन दोनों ने जवानी का जमकर मजा लूटा... जब वे दो जिस्म एक जान हुए तब जाकर एक दूसरे से अलग हुए... रागिनी को रमेश इतना भाया की वह उसको छोड़ने के लिए भी तैयार नहीं थी... वह रमेश को बार-बार चूम रही थी... उन दोनों के संतुष्ट होने के बाद प्रभा ने कमरे पर दस्तक दी... रमेश ने उठकर दरवाजा खोला... प्रभा के होठों से मुस्कान नाच रही थी... उसने आते ही सवाल किया-
-कैसी हो रागिनी ? मैं समझती हूँ की रमेश ने तुमको निराश नहीं किया होगा ?
रागिनी- निराश तो नीचे अहं किया मगर बहुत सी शिकायतें हैं ...
प्रभा- क्या कहती हो ? मुझे नहीं लगता ऐसा कुछ हुआ होगा ? रमेश के अन्दर की आग इसके चेहरे से साफ़ दिखाई देती है... मैं हर बात मान सकती हूँ, बस यही नहीं मानूंगी... कोई एक शिकायत ही बताओ...
रागिनी- सबसे पहली और महत्वपूर्ण शिकायत तो यही है की तुमने रमेश से पहले क्यों नहीं मिलवाया... मेरी जिन्दगी के कितने दिन रमेश के बिना ही बीत गए... क्या उन दिनों को वापस लौटा सकता है रमेश ?
खुशी के मारे रागिनी से लिपट गयी प्रभा... रमेश उन दोनों की इतनी खुशी का राज नहीं समझ पा रहा था... वह कुछ पूछ पाटा, इससे पूर्व ही प्रभा ने कहा-
-मेरी सबसे प्यारी दोस्त है रागिनी... इसकी खुशी ही मेरा असली मकसद था, वह पूरा हुआ तो फूली नहीं समा रही हूँ... मन को बहुत सुकून मिला है...