Sunday, October 25, 2009

भाग-31

दीप्ति दौलत और शौहरत के चक्कर में ऐसी फंसी की सुख चैन भी भूल गयी , उसे हरदम बस अपने ग्राहक ही ध्यान में रहने लगे। ग्राहकों की पसंद के हिसाब से भाषण तैयार करना। फ़िर जिस सब्जेक्ट पर उसने सवाल पूछे हैं, उनका अध्ययन करना। ठीक से जवाब देना। अखबार वालों से निरंतर संपर्क में रहना। टीवी रिपोर्टर्स को पिलाना -खिलाना, ये सब बातें उसे अपने आप से अलग करती जा रही थीं। कभी जब वह तन्हाई में होती तो अपने अतीत के पन्ने पलटकर देखती , तब उसे पता चलता की कितनी द्पूर निकल आई है वह। इतनी दूर की वहा से वापस लौटने की कोई छोटी सी पगडंडी भी नजर नहीं आती थी। उसकी बडी बहन खुश थी। उसके अपने बच्चे थे जो दीप्ति के सहयोग से बड़े-बड़े स्कूलों में पढ़ते थे, उसीके सहयोग से उसकी इतनी प्रोपर्टी बन गयी थी की वह बिना कुछ किए भी अच्छी खुश हाल जिन्दगी बसर कर सकती थी।

उसको अपने अच्छे दिन याद आते थे, उन दिनों उसके पास ज्यादा दौलत नहीं हुआ करती थी मगर खुशियाँ कदम चूमती थीं, कभी-कभी तो उसकी जेब मेंकोफी पीने तक के पैसे भी नहीं होते थे, इसके बावजूद वह खुश रहती थी। आज उसके पास में अथाह दौलत है, सभी सुख सुविधाएं हैं मगर शान्ति कहीं गुम हो गयी है, सुकून कहीं गायब है। हर समय मन में एक अजीब सा खौफ बना रहता था, वह कभी -कभी तन्हाई में ख़ुद से ही सवाल करती और फ़िर ख़ुद ही हसने लगती थी। उसके जीजा जब कई कई दिनों तक उसके यौवन का रस लूटते तो उसे स्वर्ग जैसा आभास होता था, मन प्रफुल्लित रहता था । यूँ कहने को तो उसके पास सब कुछ था मगर जब वह हिसाब किताब लगाती तो एहसास होता की उसकी झली तो खाली की खाली थी, जीवन में कोई स्थाईए रंग ही नहीं था। उसकी बहन के पास बच्चे थे जो दीप्ति की मदद से अच्छे स्कूलों में पढ़ते थे, दीप्ति की मदद से ही उसका जीजा आसपास के गावों का सबसे बड़ा जमींदार बन चुका था। अब उसे कमाने की भी कोई जरूरत नहीं रह गयी थी। मगर दीप्ति के पास सिर्फ़ शौहरत थी, और दौलत थी। लेकिन क्या सिर्फ़ इसीके सहारे जीवन जिया जा सकता है क्या ? उसे याद आने लगे वे दिन जब उसकी एक सहेली उसे समझाया करती थी-

- ये तुम ग़लत कर रही हो दीप्ति । इश्क की यह आग जिस दिन भड़केगी न , उस दिन तुम्हारा समूचा वजूद इसमें भस्म हो जाएगा । मर्दों का ज्यादा कुछ नहीं बिगड़ता है, उनसे कोई कुछ ज्यादा पूछताछ भी नहीं करता । सब लोग लास्ट में लड़की को ही दोष देते हैं, और फ़िर भुगतना हम लोगों को ही पड़ता है, मर्दों को नहीं। तुम्हारे जीजा तो मौज मस्ती लेकर अलग पड़ेंगे और फ़िर फंसेगी तू। तेरी बहन भी नफरत करने लगेगी तुझसे , क्या तू अपनी बहन का घर तोड़कर खुश रह सकेगी।

दीप्ति- मैं ऐसी नौबत ही नहीं आने दूंगी, दीदी का घर बरबाद करने से पहले मैं ख़ुद ही बरबाद हो जाउंगी।

सहेली- आख़िर बात तो वही हुई न। चाकू सेब पर गिरे या सेब चाकू पर , अंत में जो नुक्सान होता है वह सेब का ही होता है,। इसलिए कह्त्ति हूँ अभी से अपनी आँखें खोल ले। गाँव में भी सबको ख़बर लगती जा रही है। तू विदेश में क्या रहकेआयी है, गाँव के तौर तरीके ही भूल गयी है। यहाँ पर कोई भी खुश नहीं है तेरी रासलीला से। अगर यही सब चलता रहा तो एक दिन ऐसा आएगा की तू किसी और से शादी करने लायक भी नहीं रहेगी। सब चुगली कर देंगे तेरी, समझ रही है लैला।

दीप्ति -अभी से शादी कौन मूर्ख करता है, अभी तो समय है। आराम से की जायेगी, पहले कैरियर और साथ में मौज मस्ती , उसके बाद शादी, तब की तब सोचेंगे। चल मेरी फ़िक्र छोड़कर तू अपने बारे में सोच। तेरी कहीं सैटिंग हो पाई की नहीं।

सहेली- ठीक है दीप्ति, अगर ज्यादा कुछ कहूँगी तो बुरा लगेगा तुझे , सोचोगी की मैं जलकर कह रही हूँ।

दीप्ति- नहीं यार, इतनी बुरी भी नहीं हो तुम। मैं जानती हूँ तुम मेरी भलाई की बात करती हो मगर मैं क्या करुँ, मुझे अपने आप पर ही गुस्सा आ रहा है, मैं कंट्रोल नहीं कर पाती यार , जीजा की सूरत ही मेरे मन मन्दिर में बस गयी है, बस मुझे वही दिखाई देती है, उनके बिना मेरा जन्म अधूरा है। मैं पशोपेश में हूँ , शादी किस्से किस्से करुँगी, कैसे होगा ये सब, जीजा की यादें दिल से कैसे निकलेंगी , मगर कोई राह नहीं सूझती।

सहेली- तू अपनी पढाई पर ध्यान दे, बाकी सब भूल जा। मेरा कहना मान। यहाँ का माहौल तेरे लायक ही नहीं है। हमारा यह गाँव बहुत पिछडा है, यहाँ के विचार उससे भी ज्यादा पिछडे हुए हैं। तुझे कोई नहीं समझ पायेगा यहाँ।



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