स्वीटी सुंदर थी, जवान थी और अच्छे दिल की मलिका था। जहाँ उसमे हजारों खूबियाँ थीं, वहीं एक बुराई भी थी। वह थी- उसका जिद्दी होना। वह इतनी ज्यादा जिद्दी थी की एक बार अगर उसने जिद करली तो फ़िर अपनी जान पर खेलकर भी उसे पूरा करके ही दम लेती थी। उसके घरवाले भी कभी-कभी उसके ऐसे व्यवहार से डर जाया करते थे। स्व्वेती को इस बात का बुरा लगता था की राज जैसा हेंडसम लड़का उसकी फ्रेंद्लिस्ट में क्यों नहीं है। कभी-कभी अकेले में वह उसके बारे में सोचती तो लगता जैसे की वह उसकी खूबसूरती को चिढा रहा है, उसके होठ फड़कने लगते , उसे लगता जैसे इन होठों को तो राज के होठों की गिरफ्त में होना चाहिए , उसे लगता की उसके हसीं बदन को तो राज की मजबूत बांहों में होना चाहिए । मगर राज , राज तो जैसे पत्थर की मूर्ती बन चुका था, अगर वह कभी उस्ससे आमने -सामने टकरा भी जाती तो बस औपचारिकता भर निभाता था। यह राज ऐसा क्यों है, वह अक्सर यह सवाल अपने आप से करती , और हर बार उसका सवाल सिर्फ़ सवाल ही रह जाता।बस एक ही बात उसे तसल्ली देने वाली थी। वो ये की अगर राज उसे लाइन नहीं देता था तो किसी और लड़की को भी भाव नहीं देता था, उसने खूब चौकसी कराई लेकिन कहीं उसके चक्कर चलने की बात जानकारी में नहीं आयी। इतनी जानकारी के लिए भी स्वीटी ने पूरे पचास हजार खर्च किए थे।वह अक्सर अखबारों में निजी जासूसों के विज्ञापन पढ़ा करती थी, उसने राज की जासूसी के लिए उन्हीं में से एक महिला जासूस की मदद ली। अब वह इस बात से आश्वस्त थी थी की राज किसी और लड़की के हुस्न्जाल में भी नहीं फंसा हुआ है। जासूस से ही पता चला था की राज प्रकर्ति प्रेमी है। वह पशु पक्षियों की मदद करता है, उनसे प्यार करता है और और उन्हीं पर रचनाएं लिखता है। आमतौर पर लोगों को यह काम बड़ा बोरिंग लगता है , ख़ुद स्वीटी को भी अजीब लगता था। एक बड़े घर के लड़के में जिस तरह के शौक होने चाहिए थे, जैसी आदतें होनी चाहिए थीं, राज के पास ऐसा कुछ था ही नहीं। एक दिन उसने अपनी ख़ास सहेली रचना से पुछा-
- ये राज आख़िर क्या बला है ? अजीब प्राणी लगता है ।
रचना- कौन राज ? उस लम्बू की बात करती हो, अच्छा खासा इंसान तो है। जानवर तो किसी भी एंगल से नहीं लगता। थोड़ा सा अंतर्मुखी है। ऐसे लोग आमलोगों से ज्यादा घुल मिल नाहीं पाते।
स्वीटी- और कौनसा राज । उसी लम्बू की बात कर रही हूँ जिसकी आजकल बहुत चर्चा है। हर नौजवान लड़की की जुबान पर उसीके चर्चे हैं। ये अंतर्मुखी शब्द कुछ पल्ले नहीं पडा। ये क्या होता है ? कोई बीमारी है क्या ?
रचना- नहीं यार । बीमारी नहीं होती मगर बीमारी जैसी ही होती है। तू क्यों इंटरेस्ट ले रही है इस अंतर्मुखी में।
स्वीटी- मुझे चिढ होती है उसके व्यवहार से। कोई मुझे इस तरह नजरअंदाज करे यह अच्छा नहीं लगता।
रचना- रहम कर बेचारे पर। सीधा लड़का है।
स्वीटी- अच्छा जी, बड़ा तरस आ रहा है बेचारे पर। क्या बात है ? बड़ी दया आ रही है ?
रचना- हाँ, वो है ही ऐसा। लाखों में एक । करोड़ों में एक।
स्वीटी- दुनिया में अपनी तरह का अकेला ही क्यों नहीं कहतीं ? म्यूजियम में लगाने लगाने लायक। मुझे तो शक होने लगा है की वह आदमी भी है की नहीं। अगर वह इंसान होता तो उसकी भ्वानाएं कभी नहीं भड़कती ?
रचना- इतना बडा इल्जाम , बेचारे पर।
स्वीटी- बेचारा ? हूँ ...... मैं नहीं मानती। या तो दिखावा करता है, या फ़िर उसके अन्दर आग है ही नहीं। होगी तो भड़केगी न। तुम क्या सोचती हो ?
रचना- तुम तो मुझ पर ऐसे नाराज हो रही हो जैसे की मैं ख़ुद राज हूँ। तुम ऐसा क्यों नहीं करतीं की इन सवालों के जवाब सीधे राज से ही जानो। उसके बारे में उससे बेहतर और कौन जान पायेगा।
स्वीटी- तुम तो चिढ़ने लग गईं। ऐसे बात की जाती हैं क्या ?
रचना- चिढ़ने की बात करती हो तुम, और तुम जैसी न जाने कितनी लड़कियां। मुझसे आकर राज के बारे में पूछती हैं, जब मैं मेरी राय रखती हूँ तो बहस करने लगती हैं।
स्वीटी- हाँ तो किसके पास जाएँ, तुम हमारी सबसे प्यारी सहेली जो हो, साथ में मनोविज्ञान की स्टूडेंट भी।
तचना- अच्छा , अब मस्का मत लगाओ , राज का ध्यान छोड़कर किसी और लड़के पर डोरे डालो। मेरी तरह। जैसे मैं उसे कबका अपनी लिस्ट से बाहर कर चुकी हूँ।
Friday, October 30, 2009
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