जीवन में मोहब्बत तो हर कोई किसी न किसी से करता ही है , मगर अक्सर लोग यह कहते मिल जायेंगे की उनके साथ उनकी महबूबा ने धोखा दिया या फ़िर किसी को उसके आशिक ने ही दगा दे दिया। दिल तोड़ने, वादा तोड़ने और झूठी क़समें खाने की सैकडों कहानियाँ हम सबने सुनी होंगी, मगर मोहब्बत का मसीहा कभी-कभी ही जन्म लेता है, ऐसा मसीहा जो मोहब्बत की परिभाषा ही बदल डालता है। राज मल्होत्रा को लोग इसी नाम से ही जानते हैं। जी हाँ, मोहब्बत का मसीहा ... सुमन ने उसकी कहानी लोगों की जुबानी ही सुनी थी। वह एक डेली न्यूज पेपर में संवाददाता क्या नियुक्त हुयी , अजीब और ख़ास बातों की तह तक पहुचना उसका जूनून बन गया, उसने राज की कहानी को भी गहराई तक समझा, उस पर मंथन किया, मगर बहुत तकलीफ सहने के बाद वह राज का जीवन चरित्र समझ पाई , राज एक खूबसूरत लड़का। लम्बाई ६ फुट । गोरा रंग , छरहरा बदन । चमकीली आँखें और चीते जैसी गज़ब की फुर्ती। जब वह सज संवरकर घर से बाहर निकलता तो देखने वाले देखते रह जाते, युवा लडकियां के दिल धड़कने लगते । कुछ तो आहें भरके रह जातीं। मगर इस सबसे बेखबर राज मुस्कराता हुआ ऐसे निकल जाता जैसे उसे दीं दुनिया की कोई ख़बर ही न हो। वह अपनी मस्ती का मालिक था। मस्ती के समुन्दर में डूबना किसे पसंद नहीं, मगर हर कोई मस्ती की अलग- अलग परिभाषाएं गढ़ लेता है। जैसे की राज को इसी में मजा आता था की मूक प्राणियों की सेवा की जाए , गरीबों की सेवा की जाए। उसे अगर कोई घायल पशु पक्षी दिखाई देता तो वह उसकी पूरी तीएमार्दारी करता । उसे पशु पक्षियों के अस्पताल तक पहुचाता और फ़िर उसका खर्च ख़ुद देता। अगर उसे पता चलता की कोई बच्चा बिना फीस के पढाई नहीं कर पा रहा है तो वह तत्काल उसका पूरा इंतजाम कर दिया करता था। यह काम वह इतने गुप्त तरीके से करता की किसीको पता भी नहीं चलता था। भले ही अच्छी बातों की रफ़्तार कम होती है मगर आहिस्ता -आहिस्ता जब नेकी की सुगंध फैलती है तो हमेशा के लिए लोगों के मन मष्तिक में बस जाती है। राज के भी खूब चर्चे होने लगे थे। कितनी ही लड़कियों के दिल की धड़कन बन चुका था राज। फ़िल्म के हीरो भी उसके सामने कुछ नहीं थे। राज के पिता का देश भर में जमा जमाया व्यापार था। उसके पिता प्रसिद्द व्यापारी थे। वे चाहते थे की राज उनके साथ व्यापार में हाथ बंटाए मगर प्रकृति प्रेमी राज की सोच ही अलग थी। न जाने क्यों तराज के दिल में यह बात घर कर चुकी थी की कोई भी व्यापारी मजदूरों का हक़ मारकर ही बड़ा आदमी बनता है। राज को लेखन से बहुत शौक था। जब भी खाली समय मिलता वह कविता लिखने बैठ जाया करता था। उसे लेखन की हर विधा का ज्ञान हो चला था, वह गीत, ग़ज़ल, कहानी, कविता सब कुछ लिखने लगा था। उसके पात्र आम इंसान हुआ करते थे, जिन्हें पढ़कर हर पाठक अपने आपको उसके पात्रों से जुडाव महसूस करने लगता था। मासिक पत्रिकाओं से निकलकर उसकी रचनाएं दैनिक अखबारों में छपने लगीं। लोग उसकी सराहना करते तो वह चुप हो जाता। अगर कोई समीक्षक उसकी आलोचना करता तब भी वह चुप रहता । इस तरह न तो ज्यादा खुश होता था और ना ही नाराज ही होता था । आराम से वह बातें सुनता और फ़िर अपने काम में लग जाया करता था। उसको अपने काम पर भरोसा था, उसे इस बात की परवाह नहीं थी की कौन उसे पसंद करता है और कौन नहीं। वह तो इस बात से भी अनजान था की कितनी लड़कियां उसे पाने के सपने देखा करती हैं, उसे स्पर्श करने के सपने देखा करती हैं। एक थी स्वीटी , जो उसके बंगले के पीछे वाले बंगले में रहती थी। वह राज की एक झलक पाने के लिए बेताब रहती थी। सोचती थी की काश एक बार राज उससे दोस्ती स्वीकार करले तो वह अपने सभी साथियों को जला सकती है। आख़िर इतना हेंडसम दोस्त मिलता ही कहाँ है, वह सोचती थी की एक बार अगर वह दोस्त बन गया तो प्यार में फ़िर कितना समय लगता है।
Thursday, October 29, 2009
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