आशा- यह तुम्हारा जोश है,भावुकता है .... जब ये सपने सचाई के धरातल से टकरायेंगे तो क्या होगा ? सब कुछ ख़त्म हो जायेगा... सारे ख्वाब और ख़याल बिखरकर मिटटी में मिल जायेंगे ....
विनीत-आप यकीन मानिए,ऐसा कुछ नहीं होगा... वो लोग दूसरे होते हैं जो वादेसे मुकर जाते हैं या फ़िर अपना स्वार्थ साधने के लिए प्यार का ढोंग रचते हैं...
चंदा- मैं भी विनीत की बातों से सहमत हूँ, आपने मुझे बेटी की तरह पाला, सहारा दिया, स्नेह दिया ... मैं उसके लिए आपको जीवन भर याद रखूंगी... आपको याद करती रहूंगी, आपका सम्मान करती रहूंगी ... लेकिन सम्मान का अर्थ यह भी ही नहीं की मैं आपकी बात मानकर अपने प्यार का गला घोंट देते हैं...दगा नहींहो सकती...
चंदा ने अपने दोनों हाथ जोड़कर यह बात इतने मार्मिक ढंग से कही की मालती और आशा के दिलों पर असर कर गयी ... उसके शब्दों में द्रढ़ता थी... लहजे में इज्जत और आंखों में सच्चाई ... मालती बोलने से हिचकिचा रही थी... बहुत ज्यादा जरूरत हुई तो थोड़ा बहुत बोल दिया करती थी... उसके दिलो-दिमाग में बहुत बड़ा तूफ़ान उठा हुआ था... वह हमेशा आशा के बारे में चिंतित रहती थी... आशा द्वारा कोठा छोड़ने की मंशा ने मालती को अन्दर ही अन्दर परेशान कर दिया था... काफी देर तक सब लोग चुप रहे... आखिरकार चंदा के सब्र का बाँध टूट गया... उसकी आंखों से गंगा -जमुना की धारा बहने लगी... वह पास में खड़ी आशा के गले से लिपट कर फ़ुट-फ़ुट कर रोने लगी... यह ऐसा द्रश्य था, जब कोई दुल्हन अपना पीहर छोड़कर सौराल के लिए विदा होती हैउर पास में खड़ी माँ या पिता से लिपटकर फ़ुट-फ़ुट कर रोने लगती है ... सब हैरान थे... इस द्रश्य को जो भी देखता वही हैरान हो जाता ... आशा नें चंदा को अपनी बांहों में ऐसे जकड लिया था, मानो उसको ज़रा भी ढीला छोड़ा तो वह उससे हमेशा के लिए जुदा हो जायेगी... इससे भी ज्यादा आशचर्य की बाटी तो ये थी की आशा की आंखों से भी आँसू निकल रहे थे... यानी की जिस आशा ने उम्र भर लोगों को खून के आँसू रुलाये थे , वही अब ख़ुद रो रही थी... उसके मन का सारा मेल धुल रहा था... कई बरसों से रूह में जो जहर इकट्ठा हो रहा था, वह अब धीरे-धीरे बह रहा था... आंसुओं की शक्ल में अब बुराइयां बह रही थीं... आशा का ह्रदय परिवर्तन हो चुका था... विनीत भी खुश होकर रोने लगा... उसकी समझ में नहीं आ रहा था की वह अपनी खुशी का इज़हार कैसे करे ... कुछ आशंकाएं जरूर थीं मगर साफ़ तौर पर इतना तो स्पष्ट हो ही गया था की आशा को उनके रिश्ते पर कोई एतराज नहीं है...यह ख़बर कोठे पर मौजूद सभी लोगों तक पहुच चुकी थी... सभी के दिलों में बजाब की हलचल थी... तरह-तरह की चर्चाएँ चल रहीं थीं... दलालों के मन में थोड़ा सा रोष जरूर था... यह कुछ दलालों को अपना अस्तित्व धोखे में नज़र आने लगा था... वे वेश्याएं बेहद खुश थीं जिनके मन में प्यार तो पल रहा था लेकिन डर के मारे वे ये बात किसी को बताती नहीं थीं... अब उन्हें उम्मीद की किरण नज़र आने लगी थी...
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