Wednesday, September 24, 2008

भाग-115

दोनों के मन में काम वासना का तूफ़ान उठ रहा था ... नशे की हालत में वह ग़लतकाम को भी अच्छा समझ रही थी... चंदा इतनी ज्यादा कामुक थी की ख़ुद ही अरबी शेख को आमंत्रित कर रही थी... जो चंदा अपनी आबरू बचाने के लिए सारी दुनिया से टकरा सकती थी और टकराई भी थी, उसी चंदा ने अरबी शेख के सामने ख़ुद ही समर्पण कर दिया था... इसी लिए तो शराब को बुद्धि विनाशक भी कहा जाता है...
जब दोनों नग्न अवस्था में प्रणय क्रीडा कर रहे थे तो शेख ने पुछा -
- क्या अब मेरे सिवाय निंदा रह पाओगी ?
चंदा- जीने की कल्पना करना भी बेकार है ... क्योंकि ऐसा सम्भव ही नहीं है... इससे पहले मैंने जितना भी समय बिताया, अब समझती हूँ की वह बेकार ही गया... अगर तुम मिल गए होते, तो मेरा वह निरर्थक जीवन भी सार्थक हो जाता ... सच कहूं तो जीवन का असली मकसद अब जाकर मेरी समझ में आया है... अब मैंने जाना है की जिस जीवन में रंगीनियाँ न हों, खुशियाँ न हों, वह जीवन मौत के समान है... तुमने कुछ ही घंटों में मेरे सोचने का, जीवन जीने का नजरिया बदल दिया है...
-तुमसे मिलकर मुझे जो असीम सुख मिला है, मैं उसका शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता.... तुम्हारी तुम समझो, मैं तो अब अपने वताकं जाने लायक भी नहीं रहा हूँ... अगर जाऊँगा तो तुम्हें साथ लेकर जाऊँगा... वरना मैं भी यहीं बस जाऊँगा... यहाँ रहकर भी व्यापार किया जा सकता है...
चंदा- सच, ये तो मेरे लिए बहुत ख़ुशी की बात है... इसका मत्य्लब ये हुआ की अब हम दोनों ही एक दुसरे से मोहब्बत करने लगे हैं... पता नहीं मेरे अन्दर ऐसा क्या है की आप इतना रीझ रहे हैं, मैं तो खुद को कुछ नहीं समझती... वैसे भी आपके लिए मेरी क्या उपियोगिता हो सकती है ?
अरबी शेख- बात उपियोगिता की नहीं, दिल की है, प्यार की है... अब मैं यह बात किस्से पूछने जाऊं की तुम्हारीकिस अदा ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया है... बस मेरे लिए इतना ही काफी है की मुझे तुमसे प्यार है और तुम भी मुझ पर जान छिड़कती हो... मैं तो इसी ख़ुशी को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा...
चंदा- आह, क्या अब बातों से ही काम चलाते रहोगे या फिर कुछ करोगे भी ? देखो तो सही, मेरा गला सूख रहा है... दिल भी जोर-जोर से धड़क रहा है... मेरे मन ने न जाने कितनी तमन्नाएं पाल ली हैं... इन तमन्नाओं को तुम पूरा कर सकते हो...
शेख - तुम ठीक कहती हो... बेशक मैं ऐसा कर सकता हूँ और यहाँ तक की मैं तुमसे इसी तरह की अपेक्षाएं कर सकता हूँ...क्या तुम अपने फैसले खुद लेने की स्थिति में हो या फिर?
चंदा-ये क्या कहते हो, मैंने तो अपनी जिन्दगी तुम्हें सौंप दी है ... अब चाहे जो करो, मुझे कोई ऐतराज नहीं होगा... अगर अधिकार जताओगे तो ख़ुशी ही होगी...
शेख दिल से खुश हो गया वह जिस बात को जानना चाहता था, चंदा ने उसके सकारात्मक जवाब दिया था... शेख सक्रिय हो गया... वह चंदा के संगमरमर जैसे अनछुए बदन को चूमने लगा... उसका स्पर्श चंदा को बेहद ऊत्तेजित कर रहा था... जब शेख उसको सताने का प्रयास करने लगा तो चंदा ने उसके संवेदन शील अंग से छेड़छाड़ करनी शुरू करदी... उसने शेख की दुखती रग पर हाथ रख दिया था...

No comments: