चंदा-हाँ , बात बिल्कुल सही है... ऐसा है की तन-मन और आत्मा के साथ-साथ सामाजिक मान मर्यादा भी बहुत जरूरी होती है... हमारे पूर्वजों ने अगर कुछ नियम क़ानून बनाए हैं तो इसका कुछ तो महत्व होगा... मैं ये चाहती हूँ की हमसे समाज भी नाराज़ न हो...
-अरबी- हाँ -हाँ क्यों नहीं ? तुम जैसे कहो , मुझे कोई ऐतराज नहीं... मैं तो पहले ही वायदा कर चुका हूँ की तुम्हारी हर बात मानूंगा... मैं तुम पर अंधा विश्वाश करने लगा हूँ... तुम्हारी तुम जानो ,मैं अपने दिल की बात कह रह हूँ... मैं तुम्हारे लिए जाती- धर्म भाषा और वतन की दीवार भी गिराने के लिए तैयार हूँ...
चंदा- मुझे ग़लत मत समझो... मैं भी प्यार की हर कीमत चुकाने के लिए तैयार हूँ...
Thursday, September 18, 2008
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