Tuesday, December 16, 2008

रंगीला रतन, भाग-50

फोटो देखकर भी सामने वाले के बारे में काफी कुछ जानकारी समझ में आ जाती है... फ़िर उसने सबसे पहला काम ये किया की अपनी एक फर्जी ई मेल आई डी तैयार की ... इसके बाद उसने न्यूज़ पेपर में लिखी एड एजेंसी के प्रतिनिधि को फ़ोन लगा दिया...

वहाँ से उसको मायूसी हाथ लगी... उसको बताया गया की अखबार कापेज छूट चुका है... कल कोई विज्ञापन नहीं प्रकाशित नहीं किया जा सकता... रंजना ने इन्तजार करना ही बेहतर समझा... उसने एक महीने का विज्ञापन अग्रिम बुक करा दिया और साथ ही क्रेडिट कार्ड से पेमेंट भी कर दिया ... वे दो दिन रंजना ने बड़ी बेचैनी के साथ गुजारे... आखिरकार वो दिन भी आया जब उसका विज्ञापन प्रकाशित हुआ... बड़ा अखबार था, रिस्पोंस आना स्वाभाविक था... सुबह से ही फ़ोन आने शुरू हो गए... पहला फ़ोन बांद्रा से था-

-हेलो, मैं

Monday, December 15, 2008

रंगीला रतन, भाग-49

कभी-कभी महसूस होता है जैसे मैं खुली आखों से सपना देख रहा हूँ...
ठीक तभी रवि की दूकान मालिक ने रवि को झकझोरकर कहा-
- तू सचमुच सपना देख रहा है रवि, अरे तुझे तो बुखार चढ़ रहा है... ये लोग कह रहे हैं की यहाँ पर एक लड़की आई थी, कहीं ऐसा तो नहीं उसी चुडैल ने तुझे कुछ खिला दिया हो ?पुलिस में शिकायत दर्ज करादूं?
रवि- नहीं सेठ जी, उसके ख़िलाफ़ शिकायत लिखवाने की कोई जरूरत नहीं है... इसमें उसकी कोई कमी नहीं है...
सेठ- मगर तू तो अभी कह रहा था की वह जादूगरनी है...
रवि- सपने में बुदबुदा रहा होउंगा ... वो बातें छोडिये... मुझे थोड़ा सा आराम करने दीजिये... मैं ख़ुद ही ठीक हो जाउंगा... सचमुच मुझे तन्हाई की जरूरत है...
सेठ- चल, किसी डॉक्टर से दवा दिल्वादूं ?
रवि -इस वक्त मुझे दवाओं की नहीं, दुआओं की जरूरत है... मेरा मतलब है तुम्हारे आशीर्वाद से मैं जल्द ही अच्छा हो जाऊँगा... अब तुम दुकान संभालो... सुबह से मैं ख़ुद दुकान पर बैठना शुरू कर दूंगा...
सेठ समझ नहीं पाया की रवि आख़िर क्या कह रहा है ? वह तो अपनी ही उलझनों का शिकार था... ऊपर से यह नई मुसीबत आ गयी... उसका दिमाग भन्ना गया... वह चुपचाप अपनी दुकान पर जा बैठा... रवि अपने मीठे सपनों में खो गया... उधर रंजना मुंबई पहुच गयी ... मुंबई में उसका मन नहीं लग रहा था... रवि की याद रह-रह कर सता रही थी... वह डॉक्टर जैसे सम्मानित पेशे से ताल्लुक रखती थी, इसी कारण समाज में उसको एक विशेष इज्जत प्राप्त थी... वह नहीं चाहती थी की लोग उसके चरित्र पर कीचड उछालें ... यही वजह थी की वह दूर-दूर के रवि जैसे लड़कों के साथ अपने जिस्म की प्यास बुझाया करती थी... मुंबई में उसको ऐसे लड़के मिलने मुश्किल हो रहे थे जो शारीरिक रूप से मजबूत हों और भरोसेमंद भी , किसी से इन संबंधों की चर्चा न करे... दिक्कत ये थी की ऐसा लड़का मिलेगा कहाँ और कैसे ? इस मामले में किसी को भी राजदार बनाने का मतलब था अपने ही हाथों से अपनी कब्र खोदना... उसका दिन तो क्लीनिक के काम में ही बीत गया मगर रात कटनी भारी हो रही थी... शाम होते ही उसने जाम छलकाने शुरू कर दिए... जब नशा होने लगा तो तन की भूख सताने लगी... बदन में अकडन सी होने लगी... उसने एक जोरदार अंगडाई ली ...इसके बाद उसकी निगाह एक अंग्रेजी अखबार पढा... उसमें कुछ विज्ञापन उसको अच्छे लगे... एक विज्ञापन का मजमून इस प्रकार था-देशी-विदेशी पर्यटकों की मालिश करने के लिए मेल-फी मेल के आवश्यकता है... रोजाना १० से २० हजार कमाने का स्वर्ण अवसर... इस विज्ञापन को पढ़ते ही उसकी आंखों में चमक उभर आई... उसने सोचा ,क्यों न एक नया नंबर खरीदकर अखबारों में विज्ञापन दिया जाए की महिलाओं की मालिश करने वाले स्मार्ट , युवा लड़कों की आवश्यकता है... लेकिन फ़िर ख़याल आया की फ़ोन नंबर देने से तकलीफें भी हो सकती हैं... किसी का भी फोन कभी भी आ सकता है... न जाने कब किसका फोन आ जाए .... फ़िर उसको ई मेल का विचार आया... ई मेल पर वह बायोडाटा और फोटो भी मांगा सकती थी ... उससे यह आइडिया मिल सकता था की सामने वाला लड़का किस तरह का है... उसको ज्यादा लोगों में से किसी एक को चुनने का अवसर भी मिल सकता था...

Sunday, December 14, 2008

रंगीला रतन, भाग-48

वह अजीब पशोपेश में था... उसको लगता था की अब उसके पास सिर्फ़ तन ही बचा है... आत्मा निकल चुकी है... रंजना की उपस्थिति में वह उसके जादू को इतना महसूस नहीं कर पाया था... प्रभावित तो वह बहुत था मगर इतना ज्ञान नहीं था की रंजना के जाने के बाद वह मरने जैसा हो जायेगा... उसकी जैसे जान ही निकल गयी थी... एअरपोर्ट से लेकर दूकान तक आने में ही उसकी हालत ख़राब हो गयी... लगा जैसे अब जिया नहीं जायेगा... होठ सूख गए, बदन एंठने लगा... बड़ी अजीब अवस्था थी.... जब वह दूकान पर आया तो चक्कर खाकर नीचे गिर पडा... दुकान का मालिक वहाँ आ चुका था... उसे रवि पर बहुत गुस्सा आ रहा था... लेकिन जब उसकी ऐसी बदतर हालत देखि तो गुस्सा पल भर में ही काफूर हो गया... अब उसे रवि पर दया आ रही थी...लोगों ने उसके मुह पर पानी के छींटे मारे और जब उसको होश आ गया तो कमरे में लिटा दिया गे... धीरे-धीरे यह बात दूर -दूर तक फ़ैल गयी... लोगों को चकल्लस करने के लिए एक नया बहाना मिल गया था... फ़िर रंजना के आने की बात भी खुलने लगी... वे लोग भी सामने आए, जिन्होंने रात में एक खूबसूरत महिला को रवि के साथ कमरे में आते हुए देखा था... कुछ लोगों ने उसे अकेली कमरे में आते-जाते या फ़िर रवि के साथ बाहर निकलते हुए देखा था... बात का बतंगड़ बन चुका था... कुछ लोग इस मामले को नमक मिर्च लगाकर पेश कर रहे थे... कुछ लोग रंजना को वैश्या मानकर चल रहे थे तो कुछ का माना था की वह विदेश की रहने वाली होगी, रवि उसको बहकाकर यहाँ ले आया होगा... जितने मुह , बातें... रवि इस सबसे बेखबर होकर अपने सपनों की दुनिया में खोया हुआ था.... अब भी वह अपने साथ रंजना को ही महसूस कर रहा था...उसको लगने लगा, रंजना उसके हाथ को चूम रही है... वह रंजना की आकर्षक गोलाइयों के साथ खिलवाड़ कर रहा है... वह आह भरने लगी है... उसकी आहों में गज़ब की कसक है... रवि उसके होठों पर अपने होठ रख चुका है... उन दोनों के होठों की रगड़ काम वासना की आग पैदा कर रही है... रवि कामुक होकर उसकी गोलाइयों पर अपने हाथों का दबाव बढ़ाने लगता है...रंजना सेक्सी आहें भरने लगती है...रवि उसको देखकर बेचैनी महसूस करता है... वह रंजना के साथ प्रणय क्रीडा करना चाहता है मगर उसके हाथ पाँव अचानक काम करना बंद कर देते हैं...वह उम्मीद करता है की रंजना ही अपनी तरफ़ से अतिरिक्त प्रयास करके उस अनमोल सुख को प्राप्त करले, जिसके लिए उन दोनों के तन-मन मचल रहे हैं... मगर अफ़सोस , रंजना अपनी तरफ़ से पहल ही नहीं कर रही है... इसके विपरीत वह उसकी बेबसी देख-देखकर खूब मुस्करा रही है.... रवि उसकी मुस्कान का रहस्य जान नहीं पाता , वह अपने हाथ आगे बढ़ाने की कोशिश करता है , जो बेकार और नाकाफी साबित होती है... वह जोर से चिल्लाकर कहता है-
- ये मेरे साथ क्या हो रहा है रंजना ? तुमने मेरे ऊपर ये क्या जादू कर दिया ? क्या तुम सचमुच जादूगरनी हो ?

Friday, December 12, 2008

रंगीला रतन भाग-४६

रंजना जब रवि को रमेश के साथ गुजारे अंतरण क्षणों के बारे में बताती तो उसके तन-मन में आग लग जाती... वह रंजना की बातों को नजरअंदाज करने लगा... वह कामवासना की आग में बुरी तरह से झुलस रहा था... उसके जेहन में इस वक्त सिर्फ़ रंजना की कातिल जवानी ही कौंध रही थी.... उसने बेचैन होकर कहा-
- आह... आनंद की कोई सीमा नहीं है... इतना सुख तो शायद स्वर्ग जाने वालों को भी नसीब नहीं होता होगा....
रंजना- ठीक कहते हो... आज तो कुछ ज्यादा ही मजा मिल रहा है...
रवि- ऐसे आलम में किसी बीते वक्त की बातें करना उचित होगा क्या ? अगर हाँ तो मुझे खुशी होगी...
रंजना- बहुत स्मार्ट हो गए हो रवि , काफी टोल-मोलकर बोलने लगे हो...
रवि- तुम्हारे साथ रहकर अगर इतना भी नहीं सीख पाया तो क्या फायदा होगा ? जब तुम दिल्ली छोड़कर चली जाओगी तो हरदम तुम्हारे बारे में ही सोचा करूँगा... साथियों को बताया करूँगा की किस तरह एक परी मेरे सपने में आई और फ़िर किस तरह वह मेरी दुनिया बदलकर चली गयी...एक दिन टीवी पर मैंने एक फ़िल्म देखि थी , उसमे हीरो एक डायलोग मारता है... हीरो इन से कहता है की "तुम बहुत अमीर हो मेमसाब, मुझ जैसे गरीब के साथ एकाध रात गुजारना भले ही तुम्हारे लिए तफरीह जैसी छोटी बात होगी मगर हमारे लिए तो यह हजार जिन्दगी जी लेने के समान है " ... मैं उस हीरो की तरह तो तुमसे नहीं कह सकता... क्योंकि फ़िल्म और हकीकत में बहुत अन्तर होता है... इसलिए उस फर्क को यहाँ पर महसूस भी तो होना चाहिए...
रंजना ने रची गालों को चूम लिया... वह उसको जितना गंवार समझ रही था, वास्तब में वह इतना था नहीं... वह जब धीरे-धीरे खुलने लगा तो रंजना को उस पर प्यार आ गया... वह उसके जिस्म से लिपट गयी और उसे वस्त्र की तरह धारण करने लगी... अब रंजना की समझ में आया की समझदारी सिर्फ़ ज्यादा पढ़ लिख लेने से ही नहीं आ जाती... उसके लिए प्राकृतिक देन और माहोल का भी बहुत बड़ा असर होता है... रवि पूरे जोश में था... उसको इस बात की भी खुशी थी की आहिस्ता-आअहिस्ता उसका जादू रंजना के सर चढ़कर बोलने लगा था... दिल्ली में उसका वास्ता सभी तरह के लोगों से पड़ता रहता था... इस कारण वह होशियार हो गया था... उसने अंग्रेजी भाषा के कुछ शब्दों को ऐसे याद कर लिया था और उन शब्दों को इस अंदाज में बोलता था मानो इस भाषा का बहुत बड़ा ज्ञाता हो... रंजना की तारीफ करती हुई बोली-
- इसका मतलब ये हुआ की अगर तुम मुंबई आ गए तो मराठी भाषा बहुत जल्दी सीख जाओगे... तुम्हारे अन्दर संभावनाए अंजर आ रही हैं... जिसके अन्दर सीखने की लगन होती है वह सब कुछ जान जाता है...
रवि- कुछ बातें तो मैं अब भी जानता हूँ... हमारे पड़ोस में एक सुनार की दूकान है... वह मूल रूप से महाराष्ट्र का ही रहने वाला है... वह बताता है की वहाँ पर प्याज को कांदा और बहन को ताई कहते हैं....
रवि की इस मासूम सी बात पर रंजना खूब खिलखिलाकर हंस पडी ... दोनों प्यार की ऐसी दुनिया में मगन थे जहाँ कोई दुःख का नाम भी नहीं होता है...

Tuesday, December 9, 2008

रंगीला रतन ,भाग-44

बुरा न मानो तो एक बात कहती हूँ,मर्द और गिरगिट में ज्यादा फर्क नहीं होता...ये दोनों ही कब रंग बदल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता... इनका स्वभाव मैं आज तक नहीं समझ पाई...इनके दिल की थाह ही नहीं मिल पाती...
रवि- तुम्हारी बात का बुरा मानकर कहाँ जाऊँगा... अगर तुम ये कह रही हो तो सच ही होगा... मुझे तो तुम्हारी हर बात का भरोसा है... जो कहोगी, सोच विचारकर ही कहोगी... दरअसल मुझे तो मानव स्वभाव , मनोविज्ञान और इंसानी रिश्तों के बारे में कुछ जानकारी ही नहीं है... ज्यादा पढा-लिखा भी नहीं हूँ... अभी दुनियादारी देखि भी नहीं है... ले देकर जो सीख रहा हूँ, तुमसे ही सीख रहा हूँ...
रंजना- तुम इसलिए और भी प्यारे लगते हो... कोई बात काटते भी नहीं... अपना विचार भी नहीं रखते...
रवि- अब तुम्हारे साथ रह रह कर समझने लगूंगा...
रंजना- मैं रमेश की बेवफाई की दास्ताँ सुना रही थी... जब वह मेरे साथ बिस्तर पर होता तो खूब मीठी-मीठी बात करता था... मेरी हर बात मानता था... यहाँ तक की हमेशा मेरे ही तलवे चाटता रहता था... मुझसे दूर जाते ही वह रागिनी के पहलू में गम ग़लत करने लगता... उसके संसर्ग से रागिनी को एक बेटी भी पैदा हो गयी... एक दिन हवाई दुर्घटना में रागिनी के पति की मौत हो गयी...तबसे वह स्थाई रूप से रागिनी के पास ही रहने लगा... बिना शादी किए ही वे दोनों पति-पत्नी की तरह रहने लगे थे... धीरे-धीरे रागिनी भी रमेश की रंगीन मिजाजी को समझने लगी थी... जब उसने खर्चा देना कम किया तो रमेश जिगोलो बनकर अपना खर्च निकालने लगा था... इस दौरान उसने एक लड़की को धखा दे दिया... प्यार का नाटक करके वह उसके साथ अन्तरंग सम्बन्ध तो बना बैठा मगर जब वह कुँवारी ही माँ बन बैठी तो उसने गर्भपात कराने की सोची... उस लड़की को सातवा महीना लग चुका था... डॉक्टर कह चुके थे की ऐसे समय गर्भपात कराना खतरे से खाली नहीं होगा... वह लड़की एक लीडर की थी... रवि को जब लगा की जान फंसने वाली है तो उसने हर हालत में लड़की का गर्भपात कराने का निर्णय लिया... वह गर्भवती लड़की को लेकर मेरे पिता के क्लीनिक आया... वहाँ भी उसको निराशा हाथ लगी तो वह मेरे पिता के पैरों पर गिरकर गिदगिदाने लगा... वहाँ पर उसने ख़ुद को उस लड़की का पति बताया था... पारिवारिक कलह का वास्ता देकर वह मेरे पिता को कनवेंस करने में सफल हो गया... लड़की कम उम्र की थी... गर्भपात के दौरान उसकी मौत हो गयी... पुलिस केस बनते-बनते बच्चा... आखिरकार रागिनी ने अपने ऊंचे रसूख का फायदा उठाकर मामले को रफा-दफा कर दिया ... हांलाकि उसके कुकर्म की जानकारी मेरे पिता को भी लग गयी और रागिनी को भी... तबसे रागिनी उससे और भी ज्यादा चिढ गयी ... वह उस्ससे कटी-कटी रहने लगी थी... उसका व्यवसाय भी बड़ा था... वह उसमें उलझी रहती थी... उसी बीच रमेश ने मुझे भी अपने झूठे प्यार के जाल में फंसा लिया था... जब मेरे घरवालों को इसकी भनक लगी तो वे अवाक रह गए... वे लोग रमेश की हरकतों के बारे में जानते थे... इसीलिए उससे बेहद चिढ़ते थे... मैं उसके प्यार में दीवानी हो चकी थी... जिस पर प्यार का रंग एक बार चढ़ जाए फ़िर वह उतारे नहीं उतरता... मेरि९ उम्र भी कम थी और अनुभव भी... मेरे घरवाले रमेश से जितनी नफरत करते, मैं उससे कई गुनी मोहब्बत रमेश से करने लगती... उस वक्त मेरे दिलो दिमाग पर रमेश ही रमेश छाया था... रात को सोते समय हभी वही दिखाई देता और जागने पर भी... उसी प्यार की आग ने मेरा सब कुछ जलाकर भस्म कर दिया...

रंगीला रतन, भाग-43

रंजना उसकी बातों से संतुष्ट हो गयी ... अब तक वह रवि की क्षमता पर भरोसा करने लगी थी... वह जान गयी थी की रवि के अन्दर भी वही ज्वाला धधक रही है, जिसकी उसको जरूरत थी... वह प्यार की भूखो थी और रवि अथाह समुन्दर... वह जी भरके अपनी प्यास बुझाना चाहती थी... रवि भी इसके लिए तैयार था... आखिरकार रंजना बोली-
-मैं तुम अविश्वाश नहीं कर रही बल्कि सलाह दे रही हूँ... कभी-कभी मार्गदर्शन भी बहुत काम आता है...
रवि- हाँ वो तो है... अभी तुम्हारी रमेश , प्रज्ञा और रागिनी वाली बात अधूरी है... उसको कब पूरा करोगी ?
रंजना- हाँ, मैं बता रही थी की रागिनी ने रमेश के यौवन को चूसना शुरू कर दिया था... प्रज्ञा मुफ्त में आनंद उठा रही थी... रागिनी की पहुच राजनीति में भी अच्छी थी... प्रज्ञा को खुश करके वह उससे अपने कामों को निकालती रहती थी... इस तरह वे दोनों ही अपनी -अपनी जगह पर खुश थीं... रमेश की पढाई का खर्च प्रज्ञा ही उठा रही थी...
रवि- यह बात रमेश से पता चलीं या किसी और से ?
रंजना- और कौन कहता... रमेश ने शराब पीकर मेरे सामने सारा सच उगल दिया था... हांलाकि वह अपने साथ-साथ पिला तो मुझे भी रहा था मगर मैं पीने का नाटक ज्यादा कर रही थी... रमेश और मैं ठीक इसी तरह से सो रहे थे जैसे अब तुम और हम सो रहे हैं ... उसने मेरी गोलाइयों को कैद कर रखा था... मेरी सख्त गोलाइयां उस समय बेहद आकर्षक हुया करती थीं... रमेश इन्हें देख्क्लर बाबला हो जाया करता था...
रवि- इनका तो अब भी जवाब नहीं हैं... इन्हें देखते ही मेरे रौंगटे खड़े हो जाते हैं... तुमने को कामुक फ़िल्म दिखाई थी, उस फ़िल्म की हीरो इन के उभार भी इतने सुंदर नही थे, इनकी बात ही कुछ अलग है...
इसके बाद रवि ने उसके उभारों से अपने होठ सता दिए... रवि का यह अंदाज रंजना को इतना भाया की वह उसके होठों से अपने होठ रगड़ने लगी, यहाँ तक की वह रवि के संवेदनशील अंग से भी खिलवाड़ करने लगी... अब तक रवि भी थोड़ा सा समझदार हो गया था... उसकी कामशक्ति और कामक्रीड़ा के तौर तरीकों में काफी वृद्धि हुई थी... रवि उसके पूरे जिस्म को सहला रहा था.... रंजना फ़िर कहने लगी-
- मैं तो रमेश से अंशा प्रेम करने लगी थी... उसकी हर बात को पत्थर की लकीर मान लिया था... जो वह कहता मेरे लिए हर शब्द सत्य और आखिरी हो जाता...
रवि- मैंने किताबों मेरा सुना था की प्यार मेरा इंसान कुछ भी कर सकता है... क्या ऐसा हकीकत में भी होता है ?
रंजना- हाँ, प्यार में कोई कुछ भी कर सकता है... अब मुझे ही देखो न, मैंने तुमको अपने साथ के काबिल समझा , क्या पूरी दिल्ली में तुम्हारे जैसा कोई दूसरा नहीं होगा ?
रवि- क्यों नहीं हैं, करोड़ों हैं... मेरे अलावा यहाँ का हर इंसान अच्छा है...
रंजना- बात ये नहीं है, दरअसल हर आदमी की पसंद अलग होती है... कोई किसी को श्रेष्ठ मानता है और कोई किसी को... मुझे तुम्हारी सादगी और ईमानदारी ने इतना प्रभावित किया की तुम्हारी ही होकर रह गयी... इसी तरह रमेश से भी मैं दिलोजान से मोहाब्बत करने लगी थी...






Monday, December 8, 2008

रंगीला रतन, भाग-42

उसका सीना गर्व से फूल रहा था... रंजना बेफिक्र थी... इतनी बेफिक्र की उसको दुनिया से जैसे कोई मतलब ही न हो... जल्द ही वे एक फाइव स्टार होटल के पास जाकर रुके... रवि ने ऊपर निगाह उठाई... इतने विशाल होटल की उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी... उसने हमेशा रोटी, कपड़ा और मकान तक का सपना ही देखा था... यह नजारा तो उसकी सोच से भी अलग था... रंजना ने होटल में जो कमरा बुक कराया था, वह और भी शानदार था... उसमे से ऐसी महक आ रही थी, जिससे शरीर तो शरीर आत्मा भी महकती जा रही थी... नीचे कालीन बिछी हुई थी... काफी देर तक तो रवि यह भी नहीं समझ पाया की उसको करना क्या है ? बैठना कहाँ है ? उस वक्त रंजना फ्रेश होने बाथरूम चली गयी थी... आते ही उसने कहा-
-तुम अभी तक खड़े क्यों हो ?बैठो आराम से ... आज हम इसी कमरे में रहने वाले हैं... आज मैं बहुत खुश हूँ... केई सालों के बाद मुझे इतनी खुशी नसीब हुई है... आज इस खुशी को सेलिब्रेट करते हैं...
रवि ने थोडी सी शरारत से काम लिया ... वह बेड पर अकेला लेटने के बजाय रंजना को भी लेकर गिर पड़ा... अब वह रंजना के गालों को चूम रहा था... रंजना ने अपने दहकते हुए होठ रवि के होठों से सटा दिए... रवि के दिमाग में झन्नाटा छा गया... उसका संवेदनशील अंग जोर-जोर से दहाडें मार रहा था... रंजना उस अंग से विशेष प्यार करने लगी... उसको सहलाने से रंजना को सुखद अनुभूति का एहसास होता था... रंजना की इस हरकत से रवि के मन में काम वासना की आंधी चलने लगती थी... वह उग्र होकर रंजना के सीने पर दबाव बढ़ाने लगता था... रंजन इसके बाद जब गर्म आह भरने लगती तो वह और भी बेचैन हो जाता... रंजना का अंदाज वाकई बेहद कातिल था... उसका फिगर भी जबरदस्त था... वह सुबह-सुबह नियमित तौर पर सर करने जाती थी तथा व्यायाम करती थी... इसी कारण उसका बदन आकर्षक हो गया था... उसके पेट पर ज़रा भी अतिरिक्त चर्बी दिखाई नहीं देती थी... उसके चेहरे पर भी गज़ब की चमक थी... रही सही कसर उसके बेबाक अंदाज से पूरी हो जाया करती थी... जब रवि ने उसके कपडों को हटाना शुरू किया तो वह थोड़ा सा विरोध करने लगी मानो इशारा कर रही हो की अभी नहीं... मगर रवि पर तो जैसे दीवानगी का जूनून सवार था... वह अपनी धुन में मगन था, रंजना की गोलाइयों से प्यार कर रहा था, इस बीच जो भी रुकावटें आयीं , उसने सबको पार किया... हर रुकावट को काबू में करना उसको बखूबी आता था... रंजना हर पल कामुक होती जा रही थी... रवि ने पूछा-
-यह इनकार कैसा है ? दिल की धडकनों का हाल भी तो समझो... ये क्या कहती हैं ?
रंजना- हाँ, हाँ, सब समझती हूँ... मगर वक्त की नजाकत को भी समझो... यह समय प्यार करने का है... मगर तुम, तुम तो सीधे मंजिल की तरफ़ दौड़ने लगते हो...
रवि- सफर पर मेरी कोशिश यही रहती है की जितना जल्दी हो सके अपनी मंजिल पर पहुच जाना चाहिए , आख़िर मकसदभी तो वही होता है...
रंजना- लेकिन जो आनंद धीरे-धीरे चलने में है, वह सरपट दौड़ने में कहाँ ?
रवि- बेफिक्र रहो, मैं खूब संभल -संभलकर चलता हूँ, न तो ख़ुद गिरूंगा और न ही गिरने दूंगा...