रंजना उसकी बातों से संतुष्ट हो गयी ... अब तक वह रवि की क्षमता पर भरोसा करने लगी थी... वह जान गयी थी की रवि के अन्दर भी वही ज्वाला धधक रही है, जिसकी उसको जरूरत थी... वह प्यार की भूखो थी और रवि अथाह समुन्दर... वह जी भरके अपनी प्यास बुझाना चाहती थी... रवि भी इसके लिए तैयार था... आखिरकार रंजना बोली-
-मैं तुम अविश्वाश नहीं कर रही बल्कि सलाह दे रही हूँ... कभी-कभी मार्गदर्शन भी बहुत काम आता है...
रवि- हाँ वो तो है... अभी तुम्हारी रमेश , प्रज्ञा और रागिनी वाली बात अधूरी है... उसको कब पूरा करोगी ?
रंजना- हाँ, मैं बता रही थी की रागिनी ने रमेश के यौवन को चूसना शुरू कर दिया था... प्रज्ञा मुफ्त में आनंद उठा रही थी... रागिनी की पहुच राजनीति में भी अच्छी थी... प्रज्ञा को खुश करके वह उससे अपने कामों को निकालती रहती थी... इस तरह वे दोनों ही अपनी -अपनी जगह पर खुश थीं... रमेश की पढाई का खर्च प्रज्ञा ही उठा रही थी...
रवि- यह बात रमेश से पता चलीं या किसी और से ?
रंजना- और कौन कहता... रमेश ने शराब पीकर मेरे सामने सारा सच उगल दिया था... हांलाकि वह अपने साथ-साथ पिला तो मुझे भी रहा था मगर मैं पीने का नाटक ज्यादा कर रही थी... रमेश और मैं ठीक इसी तरह से सो रहे थे जैसे अब तुम और हम सो रहे हैं ... उसने मेरी गोलाइयों को कैद कर रखा था... मेरी सख्त गोलाइयां उस समय बेहद आकर्षक हुया करती थीं... रमेश इन्हें देख्क्लर बाबला हो जाया करता था...
रवि- इनका तो अब भी जवाब नहीं हैं... इन्हें देखते ही मेरे रौंगटे खड़े हो जाते हैं... तुमने को कामुक फ़िल्म दिखाई थी, उस फ़िल्म की हीरो इन के उभार भी इतने सुंदर नही थे, इनकी बात ही कुछ अलग है...
इसके बाद रवि ने उसके उभारों से अपने होठ सता दिए... रवि का यह अंदाज रंजना को इतना भाया की वह उसके होठों से अपने होठ रगड़ने लगी, यहाँ तक की वह रवि के संवेदनशील अंग से भी खिलवाड़ करने लगी... अब तक रवि भी थोड़ा सा समझदार हो गया था... उसकी कामशक्ति और कामक्रीड़ा के तौर तरीकों में काफी वृद्धि हुई थी... रवि उसके पूरे जिस्म को सहला रहा था.... रंजना फ़िर कहने लगी-
- मैं तो रमेश से अंशा प्रेम करने लगी थी... उसकी हर बात को पत्थर की लकीर मान लिया था... जो वह कहता मेरे लिए हर शब्द सत्य और आखिरी हो जाता...
रवि- मैंने किताबों मेरा सुना था की प्यार मेरा इंसान कुछ भी कर सकता है... क्या ऐसा हकीकत में भी होता है ?
रंजना- हाँ, प्यार में कोई कुछ भी कर सकता है... अब मुझे ही देखो न, मैंने तुमको अपने साथ के काबिल समझा , क्या पूरी दिल्ली में तुम्हारे जैसा कोई दूसरा नहीं होगा ?
रवि- क्यों नहीं हैं, करोड़ों हैं... मेरे अलावा यहाँ का हर इंसान अच्छा है...
रंजना- बात ये नहीं है, दरअसल हर आदमी की पसंद अलग होती है... कोई किसी को श्रेष्ठ मानता है और कोई किसी को... मुझे तुम्हारी सादगी और ईमानदारी ने इतना प्रभावित किया की तुम्हारी ही होकर रह गयी... इसी तरह रमेश से भी मैं दिलोजान से मोहाब्बत करने लगी थी...