काम वासना की पूर्ति करने के लिए व्योम किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार था... सुरभि उसके मन में पल रहे खोट को तो समझ गयी थी, लेकिन यह ज्ञान उसको भी नहींथा की वह उसकी इज्ज़त पर हाथ दाल देगा... उसने अपनी समूची ताकत इकट्ठी करके व्योम को जोरदार दुलत्ती मारी... अब वह पलंग से दूर जा गिरा था... व्योम अपने आपको सभाल नहीं पाया था... इसीका फायदा उठाकर सुरभि ने हिरनी की सी कुलांच मारते हुए दूसरे कमरे में छलांग मार दी... जब तक व्योम उसे पकड़ पाटा, तब तक तो सुरभि अन्दर से कमरे का दरवाजा बंद कर चुकी थी... इस समय वह जिस कमरे में कैद थी, वह बिल्कुल अन्दर वाला कमरा था... व्योम ने टेलीफोन का तार भी डाला और टीवी की आवाज़ भी तेज़ करदी ताकि सुरभि की आवाज़ कमरे से बहार नहीं निकल पाये ... सुरभि को अब अन्हूनी की आशंका सता रही थी... उसे जल्द ही एक कागज़ मिल गया... सुरभि उसी पर अपने साथ हुए ज़ुल्म की दास्ताँ लिखने लगी... व्योम ने एक तीर और फेंकने की कोशिश की-
- अगर तुम मेरी बात मानती हो तो मैं तुम्हें रानी बनाकर रखूँगा...यह घर भी तुम्हारे नाम कर दूंगा ... सिर्फ़ एक बार मुझे अपने यौवन का रस चखने दो॥ यकीन मानो, उसके बाद मैं फ़िर कभी तुमसे कुछ नहीं कहूँगा... तुम तो रोजाना राजू के साथ मस्ती करती होंगी, मेरे साथ चाँद पल गुजारने में तुम्हारा क्या बिगड़ जायेगा / आखिरकार मैं भी इंसान हूँ , क्या कमी है मुझमें ? और उस भिखारी राजू में ऐसी क्या खासियत है, जिसकी खातिर तुम अपना घरबार भी छोड़ आयीं ...
नागिन की तरह फुंकारते हुए अन्दर से सुरभि की आवाज़ आई-
-सिर्फ़ जिस्म की भूख रखने वाला तुम जैसा हवसी इस रहस्य को क्या समझ पायेगा ? प्यार में बहुत शक्ति होती है,जिस तुम्हें इस शक्ति का अंदाज़ हो जायेगा, उसी दिन तुम इंसान बन जाओगे... शायद मेरी मौत के बाद तुम यह समझ पाओ ... मैं राजू के प्यार की पवित्रता को बरकरार रखने के लिए किसी भी हद से गुजर जाउंगी...
व्योम- तुम्हारा दिमाग तो ख़राब नहीं हो गया है... कहीं तुम्हारा मरने का इरादा तो नहीं है ? एक फटीचर की खातिर तुम अपनी जिंदगी को दांव पर क्यों लगा रही हो ? तुम मेरी दोस्त बनकर इस दुनिया में आने का असली आनंद उठा सकती हो... जिस तरह गाँव या शहर पसंद ना आने पर हम लोग उसे बदल देते हैं या फ़िर कुछ दिनों के लिए दूसरे गाँव या शहर चले जाते हैं , यह सब भी वैसा ही है... अब मेरी पत्नी मुझे उतना सुख नहीं दे पाती , जो पहले दिया करती थी... मुझे लगता है कि९ वो सुख मैं तुमसे हासिल कर पाऊंगा...अगर मेरे जैसी सोच तुम भी रखो तो इसमें बराए क्या है... यह जन्म हमें बार- बार मिलता है क्या ? फ़िर क्यों नहीं हम इसको मौज-मस्ती के साथ जियें... घुट-घुटकर जीना भी कोई जीना है...मैं चाहता हूँ की तुम भी अमीर बन जाओ ... दूसरे महिलाओं की तरह तुम्हें भी बन्ने -सवारने का हक है, तुम्हें भी आराम करना चाहिए... मन पसंद सिनेमा देखना चाहिए... मन पसंद कपड़े पहनने चाहिए... तुम्हें भी कर में घूमने का हक है... क्यों नौकरानी बनकर अपना भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही हो ?चलो, अपनी तो छोडो, कम से कम उस राजू के बारे में तो सोचो, जिससे तुम पये करने का दावा करती हो ... वह बेचारा जीवन भर इसी दरिद्रता की जिन्दगी गुजारता रहेगा... खैर , उसको भी अगर छोड़ दिया जाए तो अपने होने वाले बच्चे के बारे में तो तुम्हें सोचना ही चाहिए... क्या वे भी कीडे मकोडे की तरह रेंगते रहेंगे? कम से कम उन्हिकी की खातिर मेरी हसरत पूरी करदो...
सुरभि- तुम्हारे पास तो ये सब सुविधाएं हैं न व्योम, बड़ा घर है, कई शहरों में बंगलो हैं , ऑफिस हैं, कम्पनियां हैं, करोरों की नकदी है... इसके बावजूद तुम भिखारी बनकर मेरे सामने गिडगिडा रहे हो... अब तुम समझ गए होंगे की मेरे पास कुछ भी नहीं होते हुए सब कुछ है और तुम्हारे पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं... सच्चाई में यही ताकत होती है...
Friday, August 1, 2008
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1 comment:
प्रेरक कहानी है, बधाई।
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