Wednesday, August 27, 2008

भाग-90

इस धंधे में आकर भी अगर कोई लड़की पीना शुरू न करे , यह कैसे सम्भव है ?शबाब और शराब का मेल न हो तो सारा मज़ा बेकार हो जाता है... क्या तुम यह भी भूल गए की पहला जाम मुझे तुमने ही पिलाया था... शरबत में मिलाकर... शराब के साथ-साथ तुमने उसमें कामोत्तेजना बढ़ाने वाली दवा भी तो मिला राखी थी... उसे पीते ही मैं गर्म होकर तुमसे लिपटने लगी थी... याद आया ...
सलीम- छोडो भी... बहुत पुराणी बातें हैं... गढे हुए मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा ?
आशा- हाँ , ये बात भी ठीक ही है... क्या फायदा ? आज भी तुम हर बात फायदे के हिसाब से करते हो... अच्छा है... आओ, आज अपने हाथों से जाम पिलाऊंगी...
सलीम- वाह... क्या बात है ... यह घुंघराले बालों वाली लड़की कौन है ?
आशा- बड़े चालाक हो तुम... तुम्हारी नज़र भी शातिर है... आखिरकार उस छिपे हुए आइटम को ढूंढ ही लिया...
सलीम - हुस्न के असली पारखी तो हम ही हैं... पहले हम लोग ही देखते हैं...
आशा- लो , पैग बना दिया है... सच कहते हो ... अगर इन कोठों पर रोजाना घुंघरुओं का अलग-अलग संगीत्ब सुनाई देता है तो उसमें सबसे बड़ा योगदान तुम जैसे लोगों का ही होता है...
सलीम- कौन है ये ? कमसिन नज़र आती है...
आशा- एकदम करारी है... अभी-अभी तो हाथ लगी है... इसने बड़ी मुश्किल से नथ उतरवाई है... नाम तो इसका बिजली है , मगर यह सचमुच की बिजली है... तुम्हें भी देखते ही करंट लग गया ना ?
सलीम- कितने देती हो ताज़ा माल का ?
आशा - माल अच्छा हो तो पैसे की कोई सीमा नहीं है ... तुम कल से काम पर लग जाओ ...
सलीम-कल से काम पर जोर-शोर से लग जाता हूँ... आज इस क़यामत का आनंद चख लेता हूँ.... खूब मज़ा आएगा... अगर तुम कहो तो मैं तुम दोनों को साथ-साथ भी संतुष्ट कर सकता हूँ...
आशा- मैं कहीं भागी थोड़े ही जा रही हूँ.... मैं तो आख़िर तुम्हारी ही हूँ...
सलीम- बात तो तुम आज भी ऐसी करती हो की कलेजे के पार हो जाती हैं... पहले कितनी झिझकती थीं तुम ?
आशा- हाँ, पहले की तो बात ही कुछ और है ... उन बातों को अब याद करने से क्या फायदा... उस वक़्त तो मैं बिल्कुल भोली थी और तुम इतने ही मक्कार ...
सलीम- इसी बहाने मुझे गालिउँ भी दे रही हो... शराब भी पिला रही हो...
आशा- अरे नहीं... दरअसल , इस लाइन में आते ही मेरी जुबां भी गन्दी हो चुकी है... होठों पर हमेशा गालियाँ राखी रहती हैं... ये सारी देन भी आपकी ही है...
सलीम-मैंने जब मुंबई में यह सुना की तुम इतनी दौलतमंद हो गई हो तो बड़ा अच्छा लगा... तुम्हारे भेजे हुए आदमी के साथ तुंरत यहाँ चला आया ... तुम बुलाओ और मैं ना आऊँ ... भला यह कैसे हो सकता है...
























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