- शुक्रिया सालीम... अगर तुम ना होते तो आज मैं इतनी ऊंचाई पर नहीं पहुच पाती... किसी ऑफिस में क्लर्क होती या फ़िर सब्जी की कोई छोटी-मोटी दूकान खोलकर बैठी होती... तुमने एहसान किया मुझ पर ... अगर वैश्या नहीं बनाया होता तो आज मेरे ये थाट-बाटनहीं होते... मैं बार -बार तुम्हारा आभार मानती हूँ...
सलीम- तुम मेरा मजाक तो नहीं उड़ा रही हो ?
आशा- कमाल है ... क्या तुम मजाक के लायक हो... मैंने तुम्हें खोजने में कोई कसार नहीं छोड़ी... लेकिन तुम ठहरे नम्बर एक के दलाल ... तुम मिले तो मुंबई की बदनाम गलियों में मिले... आख़िर मैंने तुम्हें पा ही लिया...
सलीम- तुमने घर बसाया की नहीं ?
आशा - अब मजाक तुम कर रहे हो सलीम, जिस लड़की की आबरू इस तरह लूट ली जाए , उसका घर भला कैसे बस सकता है... अगर तुमने मुझे जिस्म की मंदी में नीलाम नहीं किया होता तो शायद शादी भी हो ही जाती... खैर, छोडो... ये सब बेकार की बातें हैं... जिस राह से जाना ही नहीं उसके कोस गिनने से क्या फायदा ...
सलीम-अब मेरे लिए क्या आदेश है ?
आशा- तो क्या अब भी तुम दलाली कर सकते हो ? अब तो तुम्हारी उम्र भी काफी हो गई है...
सलीम - इससे क्या फर्क पड़ता है ... आज भी मैं तुम्हारे लिए एक से बढ़कर लड़की का प्रबंध कर सकता हूँ...
आशा - हाँ -हाँ , क्यों नहीं ?चोर भले ही चोरी छोड़ दे लेकिन हेरा फेरी नहीं छोड़ सकता... तुम तो वैसे भी पक्के दलाल हो... तुम जैसा सख्त जान दलाल हो तो बाट ही क्या है ?क्या अब भी शराब और शबाब का शौक रखते हो या ढलती उम्र के साथ-साथ जोश और जवानी भी रुखसत हो गए ?
सलीम- क्या कहती हो आशा ?मर्द कभी बूढे नहीं होते... सोलह साल की कमसिन भी पानी मांगने लगेगी...
आशा- एक आइटम है मेरे पास ... बहुत खतरनाक है... अभी-अभी नाथ उतरी है... अगर इच्छा हो तो आज रात पेश करूँ... तुम्हें निराशा नहीं होगी...
सलीम- नेकी , और पूछ-पूछ ?
आशा- ठीक है ... फ़िर , पीने -पिलाने का दौर शुरू कर देते हैं...
सलीम -क्या तुम भी पीने लगी हो ?
आशा- तुम भी कभी-कभी बच्चों जैसी बात करने लगते हो सलीम...
No comments:
Post a Comment