बेवफा - ५३
सूरज- मै कोई घड़ी मुहूर्त देखकर तो मिला नहीं. आप ही बता दीजिए .
किरण- तुम प्यार के मामले में सचमुच अनाड़ी हो, बावले, वैलेंटाइन दे था. यानि कि प्रेम का दिवस .
सूरज- अच्छा , हाँ, सूना तो बहुत है इस दिन के बारे में.
किरण- हाँ, अब तो सारी दुनिया में हंगामा है, सब लोग इस दिन के बारे में जानते हैं. यह दिन मेरे लिए बहुत मायने रखता है. अगर तुम न मिले होते तो मेरा अस्तित्व खतरे में पद जाता.
सूरज- मेरे न मिलने से आपका अस्तित्व खतरे में कैसे पद सकता है, मै कुछ समझा नहीं.
किरण- फिर कभी बताउंगी, तुम प्यार करो, यह प्यार का दिवस है. साथ में मुझे ये भी पता है कि इस वक्त तुम भूखे शेर की तरह टूट पड़ने के लिए बेताब हो. तुम चाहते हो कि मौक़ा मिलते ही चौका जमा दो, सही या गलत ?
सूरज- बिलकुल सही. मेरा ख़याल है कि तुम्हारे जज्बात भी कुछ इसी तरह से मचल रहे होंगे . शायद तुम भी मस्ती के समुन्दर में डूब जाने के लिए परेशां हो. जीभ पर ज्यादा कंट्रोल नहीं है, इसीलिए यह बहक जाती है
मगर दिल तो अपनी जगह पर फिट है, प्यार पाने के लालायित है. इसे प्यार देना मेरा कर्तव्य है. प्यार कहूँ या फिर संतुष्टि ? शायद संतुष्टि शब्द ठीक रहेगा क्योंकि प्यार तो जिस्म से आगे का प्रतिनिधित्व करता है, जहां स्वार्थ
खत्म होता है वहाँ से प्यार और त्याग की शुरुआत होती है.
किरण- अब तुम भी बड़ी गहरी टिप्पणियाँ करने लगे हो. निशाने पर भी मै ही हूँ. और किसीके बारे में तो कुछ कहते नहीं हो /
सूरज- सामने पर तुम ही हो तो टारगेट पर भी तुम ही रहने वाली हो. सीखा भी तुमसे है . जिससे सीखेंगे , उसी पर दाव आजमाए जाते हैं, यह मेरा अकेले का नहीं, दुनिया का दस्तूर है.
किरण- मै अपनी ये जवानी और जान तुम पर न्यौछावर करती हूँ, तुम्ही इसके योग्य हो और तुम्ही इसका सदुपयोग कर सकते हो. आज के बाद मै पराये पुरुषों की तरफ देखना भी बंद कर दूंगी , गैर मर्दों की छाया से भी
दूर भागने लगूंगी , सिर्फ तुम्हारा ही नाम जपती रहूंगी , तुम्हारे प्यार को याद करती रहूंगी. तुम्हारे लिए ही जीऊँगी, तुम्हारे लिए ही मरुंगी .
सूरज- मै तो पहले भी किसी लड़की के साथ शारीरिक सम्बन्ध नहीं बना पाया था, और अब भी तुम्हारे सिवाय किसी लड़की की तरफ नहीं निहारूंगा . पत्नीव्रता बनकर रहूंगा.
किरण- वाह, क्या बात है. इसको बोलते हैं सोहबत का असर. अब तुम भी मेरी ही भाषा बोलने लगे हो. काहिर, यह जानकर अच्छा लगा. लेकिन....
सूरज- लेकिन क्या ?
किरण- मर्दों की आदत झूठ बोलने की होती है, हसीना देखकर फिसल जाते हैं और अपने पुराने सभी वादों-इरादों, कसमों को भूल जाते हैं.
सूरज- ऐसा करने वाले कोई और होते होंगे, मैं ऐसा कतई नहीं हूँ. मैं तो तुम्हारे बिना किसीकी तरफ देखूंगी भी नहीं.
किरण- देखोगे नहीं तो क्या बिना देखे ही जिस्मानी सम्बन्ध बना लोगे ?
सूरज- तुम भी न , बड़ी शरारती हो. बात-बात में मीन मेख निकाल लेती हो.
किरण- तुमसे मुहवाद करना अच्छा लगता है. खासकर जब तुम्हारे चेहरे पर भाव उतरते -चढ़ते हैं तो मन आनंद से उछल पड़ता है.
सूरज- एक बात पूछूं, सच सच कहना .
किरण- नेकी और पूछ-पूछ. कैसे यकीन नहीं करते ? कहो न जों कहोगे सही जवाब दूंगी, तुमसे प्यारा इस जग में और कौन है ?
सूरज- तुम मुझसे इतना प्रेंम क्यों करती हो ? जग में कोई किसीसे इतना प्यार करता भी है क्या ?
किरण- यही सवाल और कितनी बार करोगे सूरज ? कितनी बार मै इसका जवाब दूंगी. तुम्हें यकीन क्यों नहीं होता कि मै तुमसे अपनी जान से भी ज्यादा प्रेम करती हूँ.
सूरज- यकीन तो बहुत होता है, मगर अपनी किस्मत पर ज्यादा यकीन नहीं है, तुम जों कहती हो, करती हो उस सब पर खूब भरोसा है. मै जीवन में जीती बाजी भी हारता ही रहा हूँ, कभी जीत नहीं पाया.
किरण- हटो, मैं कैसे मान लूं, जब तुमने मुझे जीत लिया है तो और किसीकी बात मै क्या करूं ?
सूरज- तुम मुझे बना तो नहीं रही हो ? या फिर मै कोई खाब तो नहीं देख रहा ?
Tuesday, February 15, 2011
बेवफा - ५३
सूरज- मै कोई घड़ी मुहूर्त देखकर तो मिला नहीं. आप ही बता दीजिए .
किरण- तुम प्यार के मामले में सचमुच अनाड़ी हो, बावले, वैलेंटाइन दे था. यानि कि प्रेम का दिवस .
सूरज- अच्छा , हाँ, सूना तो बहुत है इस दिन के बारे में.
किरण- हाँ, अब तो सारी दुनिया में हंगामा है, सब लोग इस दिन के बारे में जानते हैं. यह दिन मेरे लिए बहुत मायने रखता है. अगर तुम न मिले होते तो मेरा अस्तित्व खतरे में पद जाता.
सूरज- मेरे न मिलने से आपका अस्तित्व खतरे में कैसे पद सकता है, मै कुछ समझा नहीं.
किरण- फिर कभी बताउंगी, तुम प्यार करो, यह प्यार का दिवस है. साथ में मुझे ये भी पता है कि इस वक्त तुम भूखे शेर की तरह टूट पड़ने के लिए बेताब हो. तुम चाहते हो कि मौक़ा मिलते ही चौका जमा दो, सही या गलत ?
सूरज- बिलकुल सही. मेरा ख़याल है कि तुम्हारे जज्बात भी कुछ इसी तरह से मचल रहे होंगे . शायद तुम भी मस्ती के समुन्दर में डूब जाने के लिए परेशां हो. जीभ पर ज्यादा कंट्रोल नहीं है, इसीलिए यह बहक जाती है
मगर दिल तो अपनी जगह पर फिट है, प्यार पाने के लालायित है. इसे प्यार देना मेरा कर्तव्य है. प्यार कहूँ या फिर संतुष्टि ? शायद संतुष्टि शब्द ठीक रहेगा क्योंकि प्यार तो जिस्म से आगे का प्रतिनिधित्व करता है, जहां स्वार्थ
खत्म होता है वहाँ से प्यार और त्याग की शुरुआत होती है.
किरण- अब तुम भी बड़ी गहरी टिप्पणियाँ करने लगे हो. निशाने पर भी मै ही हूँ. और किसीके बारे में तो कुछ कहते नहीं हो /
सूरज- सामने पर तुम ही हो तो टारगेट पर भी तुम ही रहने वाली हो. सीखा भी तुमसे है . जिससे सीखेंगे , उसी पर दाव आजमाए जाते हैं, यह मेरा अकेले का नहीं, दुनिया का दस्तूर है.
किरण- मै अपनी ये जवानी और जान तुम पर न्यौछावर करती हूँ, तुम्ही इसके योग्य हो और तुम्ही इसका सदुपयोग कर सकते हो. आज के बाद मै पराये पुरुषों की तरफ देखना भी बंद कर दूंगी , गैर मर्दों की छाया से भी
दूर भागने लगूंगी , सिर्फ तुम्हारा ही नाम जपती रहूंगी , तुम्हारे प्यार को याद करती रहूंगी. तुम्हारे लिए ही जीऊँगी, तुम्हारे लिए ही मरुंगी .
सूरज- मै तो पहले भी किसी लड़की के साथ शारीरिक सम्बन्ध नहीं बना पाया था, और अब भी तुम्हारे सिवाय किसी लड़की की तरफ नहीं निहारूंगा . पत्नीव्रता बनकर रहूंगा.
किरण- वाह, क्या बात है. इसको बोलते हैं सोहबत का असर. अब तुम भी मेरी ही भाषा बोलने लगे हो. काहिर, यह जानकर अच्छा लगा. लेकिन....
सूरज- लेकिन क्या ?
किरण- मर्दों की आदत झूठ बोलने की होती है, हसीना देखकर फिसल जाते हैं और अपने पुराने सभी वादों-इरादों, कसमों को भूल जाते हैं.
सूरज- ऐसा करने वाले कोई और होते होंगे, मैं ऐसा कतई नहीं हूँ. मैं तो तुम्हारे बिना किसीकी तरफ देखूंगी भी नहीं.
किरण- देखोगे नहीं तो क्या बिना देखे ही जिस्मानी सम्बन्ध बना लोगे ?
सूरज- तुम भी न , बड़ी शरारती हो. बात-बात में मीन मेख निकाल लेती हो.
किरण- तुमसे मुहवाद करना अच्छा लगता है. खासकर जब तुम्हारे चेहरे पर भाव उतरते -चढ़ते हैं तो मन आनंद से उछल पड़ता है.
सूरज- एक बात पूछूं, सच सच कहना .
किरण- नेकी और पूछ-पूछ. कैसे यकीन नहीं करते ? कहो न जों कहोगे सही जवाब दूंगी, तुमसे प्यारा इस जग में और कौन है ?
सूरज- तुम मुझसे इतना प्रेंम क्यों करती हो ? जग में कोई किसीसे इतना प्यार करता भी है क्या ?
किरण- यही सवाल और कितनी बार करोगे सूरज ? कितनी बार मै इसका जवाब दूंगी. तुम्हें यकीन क्यों नहीं होता कि मै तुमसे अपनी जान से भी ज्यादा प्रेम करती हूँ.
सूरज- यकीन तो बहुत होता है, मगर अपनी किस्मत पर ज्यादा यकीन नहीं है, तुम जों कहती हो, करती हो उस सब पर खूब भरोसा है. मै जीवन में जीती बाजी भी हारता ही रहा हूँ, कभी जीत नहीं पाया.
किरण- हटो, मैं कैसे मान लूं, जब तुमने मुझे जीत लिया है तो और किसीकी बात मै क्या करूं ?
सूरज- तुम मुझे बना तो नहीं रही हो ? या फिर मै कोई खाब तो नहीं देख रहा ?
सूरज- मै कोई घड़ी मुहूर्त देखकर तो मिला नहीं. आप ही बता दीजिए .
किरण- तुम प्यार के मामले में सचमुच अनाड़ी हो, बावले, वैलेंटाइन दे था. यानि कि प्रेम का दिवस .
सूरज- अच्छा , हाँ, सूना तो बहुत है इस दिन के बारे में.
किरण- हाँ, अब तो सारी दुनिया में हंगामा है, सब लोग इस दिन के बारे में जानते हैं. यह दिन मेरे लिए बहुत मायने रखता है. अगर तुम न मिले होते तो मेरा अस्तित्व खतरे में पद जाता.
सूरज- मेरे न मिलने से आपका अस्तित्व खतरे में कैसे पद सकता है, मै कुछ समझा नहीं.
किरण- फिर कभी बताउंगी, तुम प्यार करो, यह प्यार का दिवस है. साथ में मुझे ये भी पता है कि इस वक्त तुम भूखे शेर की तरह टूट पड़ने के लिए बेताब हो. तुम चाहते हो कि मौक़ा मिलते ही चौका जमा दो, सही या गलत ?
सूरज- बिलकुल सही. मेरा ख़याल है कि तुम्हारे जज्बात भी कुछ इसी तरह से मचल रहे होंगे . शायद तुम भी मस्ती के समुन्दर में डूब जाने के लिए परेशां हो. जीभ पर ज्यादा कंट्रोल नहीं है, इसीलिए यह बहक जाती है
मगर दिल तो अपनी जगह पर फिट है, प्यार पाने के लालायित है. इसे प्यार देना मेरा कर्तव्य है. प्यार कहूँ या फिर संतुष्टि ? शायद संतुष्टि शब्द ठीक रहेगा क्योंकि प्यार तो जिस्म से आगे का प्रतिनिधित्व करता है, जहां स्वार्थ
खत्म होता है वहाँ से प्यार और त्याग की शुरुआत होती है.
किरण- अब तुम भी बड़ी गहरी टिप्पणियाँ करने लगे हो. निशाने पर भी मै ही हूँ. और किसीके बारे में तो कुछ कहते नहीं हो /
सूरज- सामने पर तुम ही हो तो टारगेट पर भी तुम ही रहने वाली हो. सीखा भी तुमसे है . जिससे सीखेंगे , उसी पर दाव आजमाए जाते हैं, यह मेरा अकेले का नहीं, दुनिया का दस्तूर है.
किरण- मै अपनी ये जवानी और जान तुम पर न्यौछावर करती हूँ, तुम्ही इसके योग्य हो और तुम्ही इसका सदुपयोग कर सकते हो. आज के बाद मै पराये पुरुषों की तरफ देखना भी बंद कर दूंगी , गैर मर्दों की छाया से भी
दूर भागने लगूंगी , सिर्फ तुम्हारा ही नाम जपती रहूंगी , तुम्हारे प्यार को याद करती रहूंगी. तुम्हारे लिए ही जीऊँगी, तुम्हारे लिए ही मरुंगी .
सूरज- मै तो पहले भी किसी लड़की के साथ शारीरिक सम्बन्ध नहीं बना पाया था, और अब भी तुम्हारे सिवाय किसी लड़की की तरफ नहीं निहारूंगा . पत्नीव्रता बनकर रहूंगा.
किरण- वाह, क्या बात है. इसको बोलते हैं सोहबत का असर. अब तुम भी मेरी ही भाषा बोलने लगे हो. काहिर, यह जानकर अच्छा लगा. लेकिन....
सूरज- लेकिन क्या ?
किरण- मर्दों की आदत झूठ बोलने की होती है, हसीना देखकर फिसल जाते हैं और अपने पुराने सभी वादों-इरादों, कसमों को भूल जाते हैं.
सूरज- ऐसा करने वाले कोई और होते होंगे, मैं ऐसा कतई नहीं हूँ. मैं तो तुम्हारे बिना किसीकी तरफ देखूंगी भी नहीं.
किरण- देखोगे नहीं तो क्या बिना देखे ही जिस्मानी सम्बन्ध बना लोगे ?
सूरज- तुम भी न , बड़ी शरारती हो. बात-बात में मीन मेख निकाल लेती हो.
किरण- तुमसे मुहवाद करना अच्छा लगता है. खासकर जब तुम्हारे चेहरे पर भाव उतरते -चढ़ते हैं तो मन आनंद से उछल पड़ता है.
सूरज- एक बात पूछूं, सच सच कहना .
किरण- नेकी और पूछ-पूछ. कैसे यकीन नहीं करते ? कहो न जों कहोगे सही जवाब दूंगी, तुमसे प्यारा इस जग में और कौन है ?
सूरज- तुम मुझसे इतना प्रेंम क्यों करती हो ? जग में कोई किसीसे इतना प्यार करता भी है क्या ?
किरण- यही सवाल और कितनी बार करोगे सूरज ? कितनी बार मै इसका जवाब दूंगी. तुम्हें यकीन क्यों नहीं होता कि मै तुमसे अपनी जान से भी ज्यादा प्रेम करती हूँ.
सूरज- यकीन तो बहुत होता है, मगर अपनी किस्मत पर ज्यादा यकीन नहीं है, तुम जों कहती हो, करती हो उस सब पर खूब भरोसा है. मै जीवन में जीती बाजी भी हारता ही रहा हूँ, कभी जीत नहीं पाया.
किरण- हटो, मैं कैसे मान लूं, जब तुमने मुझे जीत लिया है तो और किसीकी बात मै क्या करूं ?
सूरज- तुम मुझे बना तो नहीं रही हो ? या फिर मै कोई खाब तो नहीं देख रहा ?
सूरज- मै कोई घड़ी मुहूर्त देखकर तो मिला नहीं. आप ही बता दीजिए .
किरण- तुम प्यार के मामले में सचमुच अनाड़ी हो, बावले, वैलेंटाइन दे था. यानि कि प्रेम का दिवस .
सूरज- अच्छा , हाँ, सूना तो बहुत है इस दिन के बारे में.
किरण- हाँ, अब तो सारी दुनिया में हंगामा है, सब लोग इस दिन के बारे में जानते हैं. यह दिन मेरे लिए बहुत मायने रखता है. अगर तुम न मिले होते तो मेरा अस्तित्व खतरे में पद जाता.
सूरज- मेरे न मिलने से आपका अस्तित्व खतरे में कैसे पद सकता है, मै कुछ समझा नहीं.
किरण- फिर कभी बताउंगी, तुम प्यार करो, यह प्यार का दिवस है.
किरण- तुम प्यार के मामले में सचमुच अनाड़ी हो, बावले, वैलेंटाइन दे था. यानि कि प्रेम का दिवस .
सूरज- अच्छा , हाँ, सूना तो बहुत है इस दिन के बारे में.
किरण- हाँ, अब तो सारी दुनिया में हंगामा है, सब लोग इस दिन के बारे में जानते हैं. यह दिन मेरे लिए बहुत मायने रखता है. अगर तुम न मिले होते तो मेरा अस्तित्व खतरे में पद जाता.
सूरज- मेरे न मिलने से आपका अस्तित्व खतरे में कैसे पद सकता है, मै कुछ समझा नहीं.
किरण- फिर कभी बताउंगी, तुम प्यार करो, यह प्यार का दिवस है.
Monday, February 14, 2011
बेवफा -५२
किरण- समझने -समझने का फेर है. आज तक क्या कोई कह सकता है कि उसने अपनी आँखों से जागते हुए और पूरे होशोहवास में भूत नामक चिड़िया को देखा है ? जबकि सच ये है
कि सब देखे हुए होते हैं. दस मिनिट पहले हमने जों खाना खाया , उसमे जों वक्त जाया हुआ वह हमारा भूतकाल ही तो था.
सूरज- तुम कहना चाहती हो कि इस आलीशान महल नुमा होटल को भी इसी तरीके से भुतहा कहा जा सकता है ?अगर बात यही है तो इसमें डरने जैसी कोई बात ही नहीं है.
किरण- तो क्या तुम डर गए थे ? बिस्तर पर तो इतने बड़े फौलादी बनते हो , और सचमुच हो भी, फिर इतनी छोटी -छोटी बातों से कैसे डर जाते हो. प्यार की दुनिया के तुम कच्चे खिलाड़ी हो
जबकि बिस्तर की दुनिया के बेताज बादशाह हो. ऐसे चोके -छक्के जमाते हो कि दिल सन्न रह जाता है. आत्मा भी तृप्त हो जाती है. , देखती हूँ कब तक इस तारह के सुख देते रहते हो ? मैंने तो ठान लिया है कि
अपनी सारी चल -अचल संपत्ति तुम्हारे नाम कर दूंगी और घर पर रहकर रोजाना शाम को तुम्हारे आने की राह देखा करूंगी .
सूरज- अच्छा जी, इतना लंबा मामला सोचकर रखा है.
किरण- ये तो कुछ भी नहीं, मैंने तो बच्चों के नाम तक सोच लिए हैं. अगर आराम से घर पर बैठकर खाने में तुम्हें शर्म आती है तो कोई बात नहीं, तुम बिजनेस संम्हालना , मैं तुम्हारे बच्चों को सभाल लूंगी .
अच्छा , एक बात तो है कि तुम मर्दों में ये बू बहुत बड़ी खतरनाक होती है. . हम लोग तो अपने पुरुष साथी के दुःख को अपना दुःख , सुख को अपना सुख , उसकी दौलत को अपनी दौलत और अपनी दौलत को
उसकी दौलत समझते हैं, यानि कि भेद ही खत्म कर देते हैं लेकिन तुम लोग इसको अपने स्वाभिमान का मसला बना लेते हो. ऐसा क्यों होता है भला ? तुम दुनिया से अलग हो, सबसे अच्छे हो, सबसे हटकर
हो इसलिए मैं तुमसे पूछ रही हूँ.
सूरज- शायद और और पुरुष में एक अंतर यह भी होता है. जहां तक सुख या दुःख की बात है तो हम मर्द भी अपनी महिला साथी के दुःख को अच्छी तरह से महसूस करते हैं , उसमे साथ भी देते हैं मगर मेरा पर्सनल
ख़याल ये है कि जों मर्द अपनी औरत की कमाई पर जिन्दा रहे , उसको मर्द होने का अधिकार नहीं है.
किरण- यही वो भावना है जों हमें तुमसे हीन बनाती है.
सूरज- अब तुम पक्षपात कर रही हो.
किरण- अच्छा जी , और आप ? आप तो और भी व्यक्तिगत होते जा रहे हैं.
सूरज- शुरुआत तो आपने की है, मगर देखो, फिर भी मैं आखिर में तुम्हारा ही साथ देने वाला हूँ, क्योंकि अपनी प्रेमिका को हराना भी मै उचित नहीं मानता.
किरण- दरियादिली तो ऐसे दिकाह रहे हो जैसे कि वास्तव में हरा ही दोगे ?
सूरज- ठीक है तो फिर जोर आजमाइश हो जाए, मगर तकलीफ वही आती है कि आप पर विजय पाकर मुझे क्या हासिल होगा . इसलिए तुमसे हारना ही बेहतर है.
किरण- फ़िक्र न करो सूरज, मै अगर जीत भी गयी तो तुम्हें हारने नहीं दूंगी , जीती हुई बाजी पलट डालूंगी.
सूरज- और अगर जीत हुई तो ?
किरण- अगर मेरी जीत हो भी जाती है तो मैं अपने लिए नहीं, तुम्हारे लिए जीतूंगी . मेरा अपने लिए जीतना कोई मायने रखता .
सूरज- फिर ये लड़ाई किसलिए, जब जीत का अर्थ ही नहीं तो उसका मोह क्यों पाले हुए हो ?
किरण- अपने लिए नहीं, बिलकुल नहीं. तुम्हारे लिए . जबसे तुम मिले हो, मेरा हर पल तुम्हारे लिए समर्पित है. जानते हो , तुम मुझसे कब मिले थे ?
सूरज- मै कोई घड़ी मुहूर्त देखकर तो मिला नहीं. आप ही बता दीजिए .
किरण- तुम प्यार के मामले में सचमुच अनाड़ी हो, बावले, वैलेंटाइन दे था. यानि कि प्रेम का दिवस .
सूरज- अच्छा , हाँ, सूना तो बहुत है इस दिन के बारे में.
किरण- हाँ, अब तो सारी दुनिया में हंगामा है, सब लोग इस दिन के बारे में जानते हैं. यह दिन मेरे लिए बहुत मायने रखता है. अगर तुम न मिले होते तो मेरा अस्तित्व खतरे में पद जाता.
सूरज- मेरे न मिलने से आपका अस्तित्व खतरे में कैसे पद सकता है, मै कुछ समझा नहीं.
किरण- फिर कभी बताउंगी, तुम प्यार करो, यह प्यार का दिवस है.
किरण- समझने -समझने का फेर है. आज तक क्या कोई कह सकता है कि उसने अपनी आँखों से जागते हुए और पूरे होशोहवास में भूत नामक चिड़िया को देखा है ? जबकि सच ये है
कि सब देखे हुए होते हैं. दस मिनिट पहले हमने जों खाना खाया , उसमे जों वक्त जाया हुआ वह हमारा भूतकाल ही तो था.
सूरज- तुम कहना चाहती हो कि इस आलीशान महल नुमा होटल को भी इसी तरीके से भुतहा कहा जा सकता है ?अगर बात यही है तो इसमें डरने जैसी कोई बात ही नहीं है.
किरण- तो क्या तुम डर गए थे ? बिस्तर पर तो इतने बड़े फौलादी बनते हो , और सचमुच हो भी, फिर इतनी छोटी -छोटी बातों से कैसे डर जाते हो. प्यार की दुनिया के तुम कच्चे खिलाड़ी हो
जबकि बिस्तर की दुनिया के बेताज बादशाह हो. ऐसे चोके -छक्के जमाते हो कि दिल सन्न रह जाता है. आत्मा भी तृप्त हो जाती है. , देखती हूँ कब तक इस तारह के सुख देते रहते हो ? मैंने तो ठान लिया है कि
अपनी सारी चल -अचल संपत्ति तुम्हारे नाम कर दूंगी और घर पर रहकर रोजाना शाम को तुम्हारे आने की राह देखा करूंगी .
सूरज- अच्छा जी, इतना लंबा मामला सोचकर रखा है.
किरण- ये तो कुछ भी नहीं, मैंने तो बच्चों के नाम तक सोच लिए हैं. अगर आराम से घर पर बैठकर खाने में तुम्हें शर्म आती है तो कोई बात नहीं, तुम बिजनेस संम्हालना , मैं तुम्हारे बच्चों को सभाल लूंगी .
अच्छा , एक बात तो है कि तुम मर्दों में ये बू बहुत बड़ी खतरनाक होती है. . हम लोग तो अपने पुरुष साथी के दुःख को अपना दुःख , सुख को अपना सुख , उसकी दौलत को अपनी दौलत और अपनी दौलत को
उसकी दौलत समझते हैं, यानि कि भेद ही खत्म कर देते हैं लेकिन तुम लोग इसको अपने स्वाभिमान का मसला बना लेते हो. ऐसा क्यों होता है भला ? तुम दुनिया से अलग हो, सबसे अच्छे हो, सबसे हटकर
हो इसलिए मैं तुमसे पूछ रही हूँ.
सूरज- शायद और और पुरुष में एक अंतर यह भी होता है. जहां तक सुख या दुःख की बात है तो हम मर्द भी अपनी महिला साथी के दुःख को अच्छी तरह से महसूस करते हैं , उसमे साथ भी देते हैं मगर मेरा पर्सनल
ख़याल ये है कि जों मर्द अपनी औरत की कमाई पर जिन्दा रहे , उसको मर्द होने का अधिकार नहीं है.
किरण- यही वो भावना है जों हमें तुमसे हीन बनाती है.
सूरज- अब तुम पक्षपात कर रही हो.
किरण- अच्छा जी , और आप ? आप तो और भी व्यक्तिगत होते जा रहे हैं.
सूरज- शुरुआत तो आपने की है, मगर देखो, फिर भी मैं आखिर में तुम्हारा ही साथ देने वाला हूँ, क्योंकि अपनी प्रेमिका को हराना भी मै उचित नहीं मानता.
किरण- दरियादिली तो ऐसे दिकाह रहे हो जैसे कि वास्तव में हरा ही दोगे ?
सूरज- ठीक है तो फिर जोर आजमाइश हो जाए, मगर तकलीफ वही आती है कि आप पर विजय पाकर मुझे क्या हासिल होगा . इसलिए तुमसे हारना ही बेहतर है.
किरण- फ़िक्र न करो सूरज, मै अगर जीत भी गयी तो तुम्हें हारने नहीं दूंगी , जीती हुई बाजी पलट डालूंगी.
सूरज- और अगर जीत हुई तो ?
किरण- अगर मेरी जीत हो भी जाती है तो मैं अपने लिए नहीं, तुम्हारे लिए जीतूंगी . मेरा अपने लिए जीतना कोई मायने रखता .
सूरज- फिर ये लड़ाई किसलिए, जब जीत का अर्थ ही नहीं तो उसका मोह क्यों पाले हुए हो ?
किरण- अपने लिए नहीं, बिलकुल नहीं. तुम्हारे लिए . जबसे तुम मिले हो, मेरा हर पल तुम्हारे लिए समर्पित है. जानते हो , तुम मुझसे कब मिले थे ?
सूरज- मै कोई घड़ी मुहूर्त देखकर तो मिला नहीं. आप ही बता दीजिए .
किरण- तुम प्यार के मामले में सचमुच अनाड़ी हो, बावले, वैलेंटाइन दे था. यानि कि प्रेम का दिवस .
सूरज- अच्छा , हाँ, सूना तो बहुत है इस दिन के बारे में.
किरण- हाँ, अब तो सारी दुनिया में हंगामा है, सब लोग इस दिन के बारे में जानते हैं. यह दिन मेरे लिए बहुत मायने रखता है. अगर तुम न मिले होते तो मेरा अस्तित्व खतरे में पद जाता.
सूरज- मेरे न मिलने से आपका अस्तित्व खतरे में कैसे पद सकता है, मै कुछ समझा नहीं.
किरण- फिर कभी बताउंगी, तुम प्यार करो, यह प्यार का दिवस है.
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Sunday, February 13, 2011
बेवफा खंडहर - 51
ूरज-अब तक तो सिर्फ यहाँ का माहोल ही रहस्यमयी लगता था मगर अब तो मुझे तुम भी रहस्मयी लगने लगी हो. हो सकता है कि यह बात बुरी लगे लेकिन सच तो यही है.
किरण- बिलकुल, तुम्हारी बात अपनी जगह सही है, लेकिन मै सिर्फ एक बात कहना चाहूंगी , भरोसा करो तो ?
सूरज- कहके तो देखिये, हर बात मानूंगा . तुम्हारी कोई बात गिरा ही नहीं सकता .
किरण- मैं कभी भी तुम्हारे साथ गद्दारी नहीं कर सकती , हमेशा ही वफ़ा करूंगी . जीवन भर तुम्हारे साथ प्त्रेम करती रहूंगी .
सूरज- मुझे कैसे भरोसा हो , यह तो बताओ . मेरे दिल को तसल्ली तो दो.
किरण- और कितनी तसल्ली दिलाऊ. जिसकी चाहो मैं कसम उठाने के लिए तैयार हूँ. मैं कभी बेवफाई नहीं कर सकती , खुद मर जाउंगी , मिट जाउंगी लेकिन तुमसे किया हुआ अपना हर वादा निभाऊंगी
.मै अपनी जुबां कटवा सकती हूँ मगर जुबान फेर नहीं सकती, यह एक सच्ची प्रेमिका का वादा है. जिस तरह और जैसे भी चाहो मै तुम्हें यकीन दिलाने के लिए तैयार हूँ. मैंने सुना है कि जब लोग वादे
निभाते हैं, तो ऐसे ही निभा देते हैं और कभी-कभी कोर्ट स्टेम्प पर लिखा भी बेकार चला जाता है.
सूरज- हाँ, ये कहावत तो मैंने भी सुनी है. उम्मीद करता हूँ कि आप जों कह रही हैं, उस पर पूरी तरह से खरा उतरेंगी .
किरण- इससे पहले तुम्हें अपना वादा निभाना होगा, एक रात में सात बार सम्बन्ध बनाने का . ऐसा करके तुम हमेशा के लिए मेरी प्यास बुझा सकते हो. तुम्हारे सिवाय इस काम को कोई और नहीं कर सकता .
तुम ही साक्षात कामदेव हो. मैंने जिस्मफरोशी का काम किया है, उस सिलसिले में बहुत से लोगों से मिली हूँ, उनमे से तुम जैसा बहादुर कोई भी नहीं है .
सूरज- क्यों ? इसमें कौन सी बड़ी बात है ? अब तक हम दोनों तीन बार प्रणय क्रीडा तो कर ही चुके हैं. चार बार बाकी है.
किरण- हाँ, मेरे राजा , और इन चारों बार लगातार आनंद लेना है. बीच में ज्यादा गैप नहीं होनी चाहिए .
सूरज- मेरे लिए तुम्हारा यह वाक्य भी किसी रहस्य से कम नहीं है. ऐसा लगता है जैसे मै किसी भुतहा किले में कैद हो गया हूँ.
किरण- जानते हो, कभी-कभी सोची हुई बात भी सच निकल जाती है.
सूरज- तुम्हारे कहने का क्या मतलब है ? मै समझा नहीं. क्या तुम ये कहना चाहती हो कि हम दोंनो वास्तव में इस भुतहा महल में है. मतलब कि यह सच्चे का भुतहा महल है ?
किरण- बिलकुल हो सकता है . वैसे भूत से तुम क्या समझते हो ? क्या धारणा है तुम्हारे मन में भूत के प्रति /
सूरज- मुझसे ज्यादा तुम बेहतर जानती हो. हर विषय में तुम्हारा ही ज्ञान सर्वाधिक है.
किरण- तारीफ़ कर रहे हो, या व्यंग्य कास रहे हो ? खैर, सर्वाधिक तो नहीं मगर जैसा है , वैसा मै बता देती हूँ.
सूरज- ठीक है अब मेहरबानी करके भूत का मतलब बताइये .
किरण- एकदम सिंपल है, भूत माने बीता हुआ . यानि जों अब नहीं है. और इसके बिना संसार की कल्पना ही नहीं की जा सकती है.
सूरज- जैसे कि ?
किरण- जैसे कि जों वक्त कल था , वह आज नहीं है. जों आअज है वह कल नहीं रहेगा. और जब तक यह वक्त जाएगा नहीं तब तक नया कैसे आएगा . क्योंकि वक्त थमता नहीं है. निरंतर चलता रहता है.
घड़ी की सुइयां आगे -पीछे हो सकती हैं, मगर समय की रफ़्तार नहीं. इसलिए भूत तो हर कोई है और हर जगह पर है. फर्ज कीजिये कि आपने किसीसे प्रेम किया और आप बेवफा निकली या आपकी
चाहने वाली बेवफा निकली, तो आप जों उसकी याद में आहें भरेंगे , वह यादें भी तो भुतहा हुई न .
सूरज- भूतकाल और भुतहा में क्या सिर्फ इतना बारीक सा अंतर है ?
किरण- समझने -समझने का फेर है. आज तक क्या कोई कह सकता है कि उसने अपनी आँखों से जागते हुए और पूरे होशोहवास में भूत नामक चिड़िया को देखा है ? जबकि सच ये है
कि सब देखे हुए होते हैं. दस मिनिट पहले हमने जों खाना खाया , उसमे जों वक्त जाया हुआ वह हमारा भूतकाल ही तो था.
सूरज- तुम कहना चाहती हो कि इस आलीशान महल नुमा होटल को भी इसी तरीके से भुतहा कहा जा सकता है ?
ूरज-अब तक तो सिर्फ यहाँ का माहोल ही रहस्यमयी लगता था मगर अब तो मुझे तुम भी रहस्मयी लगने लगी हो. हो सकता है कि यह बात बुरी लगे लेकिन सच तो यही है.
किरण- बिलकुल, तुम्हारी बात अपनी जगह सही है, लेकिन मै सिर्फ एक बात कहना चाहूंगी , भरोसा करो तो ?
सूरज- कहके तो देखिये, हर बात मानूंगा . तुम्हारी कोई बात गिरा ही नहीं सकता .
किरण- मैं कभी भी तुम्हारे साथ गद्दारी नहीं कर सकती , हमेशा ही वफ़ा करूंगी . जीवन भर तुम्हारे साथ प्त्रेम करती रहूंगी .
सूरज- मुझे कैसे भरोसा हो , यह तो बताओ . मेरे दिल को तसल्ली तो दो.
किरण- और कितनी तसल्ली दिलाऊ. जिसकी चाहो मैं कसम उठाने के लिए तैयार हूँ. मैं कभी बेवफाई नहीं कर सकती , खुद मर जाउंगी , मिट जाउंगी लेकिन तुमसे किया हुआ अपना हर वादा निभाऊंगी
.मै अपनी जुबां कटवा सकती हूँ मगर जुबान फेर नहीं सकती, यह एक सच्ची प्रेमिका का वादा है. जिस तरह और जैसे भी चाहो मै तुम्हें यकीन दिलाने के लिए तैयार हूँ. मैंने सुना है कि जब लोग वादे
निभाते हैं, तो ऐसे ही निभा देते हैं और कभी-कभी कोर्ट स्टेम्प पर लिखा भी बेकार चला जाता है.
सूरज- हाँ, ये कहावत तो मैंने भी सुनी है. उम्मीद करता हूँ कि आप जों कह रही हैं, उस पर पूरी तरह से खरा उतरेंगी .
किरण- इससे पहले तुम्हें अपना वादा निभाना होगा, एक रात में सात बार सम्बन्ध बनाने का . ऐसा करके तुम हमेशा के लिए मेरी प्यास बुझा सकते हो. तुम्हारे सिवाय इस काम को कोई और नहीं कर सकता .
तुम ही साक्षात कामदेव हो. मैंने जिस्मफरोशी का काम किया है, उस सिलसिले में बहुत से लोगों से मिली हूँ, उनमे से तुम जैसा बहादुर कोई भी नहीं है .
सूरज- क्यों ? इसमें कौन सी बड़ी बात है ? अब तक हम दोनों तीन बार प्रणय क्रीडा तो कर ही चुके हैं. चार बार बाकी है.
किरण- हाँ, मेरे राजा , और इन चारों बार लगातार आनंद लेना है. बीच में ज्यादा गैप नहीं होनी चाहिए .
सूरज- मेरे लिए तुम्हारा यह वाक्य भी किसी रहस्य से कम नहीं है. ऐसा लगता है जैसे मै किसी भुतहा किले में कैद हो गया हूँ.
किरण- जानते हो, कभी-कभी सोची हुई बात भी सच निकल जाती है.
सूरज- तुम्हारे कहने का क्या मतलब है ? मै समझा नहीं. क्या तुम ये कहना चाहती हो कि हम दोंनो वास्तव में इस भुतहा महल में है. मतलब कि यह सच्चे का भुतहा महल है ?
किरण- बिलकुल हो सकता है . वैसे भूत से तुम क्या समझते हो ? क्या धारणा है तुम्हारे मन में भूत के प्रति /
सूरज- मुझसे ज्यादा तुम बेहतर जानती हो. हर विषय में तुम्हारा ही ज्ञान सर्वाधिक है.
किरण- तारीफ़ कर रहे हो, या व्यंग्य कास रहे हो ? खैर, सर्वाधिक तो नहीं मगर जैसा है , वैसा मै बता देती हूँ.
सूरज- ठीक है अब मेहरबानी करके भूत का मतलब बताइये .
किरण- एकदम सिंपल है, भूत माने बीता हुआ . यानि जों अब नहीं है. और इसके बिना संसार की कल्पना ही नहीं की जा सकती है.
सूरज- जैसे कि ?
किरण- जैसे कि जों वक्त कल था , वह आज नहीं है. जों आअज है वह कल नहीं रहेगा. और जब तक यह वक्त जाएगा नहीं तब तक नया कैसे आएगा . क्योंकि वक्त थमता नहीं है. निरंतर चलता रहता है.
घड़ी की सुइयां आगे -पीछे हो सकती हैं, मगर समय की रफ़्तार नहीं. इसलिए भूत तो हर कोई है और हर जगह पर है. फर्ज कीजिये कि आपने किसीसे प्रेम किया और आप बेवफा निकली या आपकी
चाहने वाली बेवफा निकली, तो आप जों उसकी याद में आहें भरेंगे , वह यादें भी तो भुतहा हुई न .
सूरज- भूतकाल और भुतहा में क्या सिर्फ इतना बारीक सा अंतर है ?
किरण- समझने -समझने का फेर है. आज तक क्या कोई कह सकता है कि उसने अपनी आँखों से जागते हुए और पूरे होशोहवास में भूत नामक चिड़िया को देखा है ? जबकि सच ये है
कि सब देखे हुए होते हैं. दस मिनिट पहले हमने जों खाना खाया , उसमे जों वक्त जाया हुआ वह हमारा भूतकाल ही तो था.
सूरज- तुम कहना चाहती हो कि इस आलीशान महल नुमा होटल को भी इसी तरीके से भुतहा कहा जा सकता है ?
Thursday, February 10, 2011
बेवफा खंडहर - 50
किरण- कोई दिशा तो मिले, दुनिया ने एक दस्तूर बना लिया है, मुझे बताओ कि अगर किसी की शादी होती है तो क्या वाह उसके साथ सुहागरात नहीं मनाएगा ?क्या वह जीवन भर सिर्फ प्यार
करके ही विवाह के रिश्ते तो कायम रख सकता है, किसी एक जोड़े का उदाहरण तो बताओ .
सूरज- हाँ, यह संभव नहीं दीखता .
किरण- फिर तुम किस पाक मोहब्बत की दुहाई देते हो ? समाज ने सिस्टम ही ऐसा बना दिया है.
सूरज- तो क्या यह भी सीमित दायरे में रहने का परिणाम है. ?सोचता हूँ कि यह न जाने कैसा रहस्य है. हम कौन सी दुनिया से आते हैं और न जाने कौन सी दुनिया में चले जाते हैं. सब कुछ सपना जैसा
लगता है. सुबह अगर आँख खुल जाए तो बेहतर वरना सोते ही रह जाते हैं. ये जीवन -मरण न जाने क्या है ?
किरण- इसके बारे में शाश्त्रों में भी बहुत कुछ लिखा गया है ,लेकिन सब कुछ अधूरा ही है.
सूरज- आपको इसके बारे में इतना कुछ कैसे पता है ? क्या तुम इस सब्जेक्ट में कुछ ज्यादा ही रूचि लेती हो ? क्या तुमने भी इससे जुडी किताबें पढ़ी हुई हैं ? महसूस तो होता है कि तुम्हे इस बारे में
बहुत कुछ ज्ञान है. मै डिस्कस करना चाहता हूँ , कुछ समझना चाहता हूँ. हांलाकि यह मेरा कभी भी विषय नहीं रहा है. मै तो फ़िल्मी गीत पढ़ने में मजा लेता रहा हूँ.
किरण- यह प्यार का मौसम है, प्यार करने से मन तो क्या रूह भी प्रफुल्लित हो जाती है , इसीलिए जीवन में जब कभी भी ऐसे पल नसीब हों ,उन्हें खोना नहीं चाहिए . यहाँ पर हम दोनों के सिवाय
कोई और नहीं है. क्यों न हम लोग इस प्यार के रस को लूट लें, फिर से एकाकार हो जाएँ. जब हम दोनों की महकती हुई साँसे आपस में टकराती हैं तो स्वर्ग जैसा आनंद मिलता है, ऐसी अनुभूति होती है
जैसे कि हम इस जहां के सबसे खुशनसीब हैं. ऐसा एहसास होता है जैसे हमने इस संसार को जीत लिया है.
सूरज- पहले कभी मैं इतना कामुक नहीं होता था. ऐसा नहीं है कि मै कोई साधू था या नामर्द था. उत्तेजना मुझे भी महसूस होती थी लेकिन मैंने किसी महिला के साथ कभी संसर्ग नहीं किया . मैंने कभी
भी इस नजर से किसीको देखा नहीं, शायद ऐसा इसलिए भी हुआ होगा क्योंकि मुझे ऐसा अवसर ही नहीं मिल पाया. मैंने कोशिश तो बहुत की थी.
किरण- शायद इसीलिए तुम अपनी कामशक्ति का अंदाजा नहीं लगा पाए. तुम बहुत कामुक हो, ताकतवर हो. जी चाहता है कि दिन रात तुम्हारी सेवा करूं, तुमसे लिपटी राहू, प्रेम करती रहूँ और तुम्हारे
बदन से लिपटकर ही फना हो जाऊं .
सूरज- मोहब्बत पर अक्सर लोग फना होने की बात क्यों करते हैं, ये बात मेरी समझ में कभी नहीं आई . मोहब्बत में जीने की बात की जानी चाहिए. आखिर तुमने ही तो कहा है कि जीवन प्यार करने के लिए
है , तुम्हारी इन होठों की पंखुड़ियों को चूमना बड़ा सुहाना लगता है. तुम्हारी जीभ का रस चखना बड़ा अच्छा लगता है. इतने कम समय में तुमने मुझे जों प्यार दिया है, उसे मै कभी नहीं भुला पाउँगा . मुझे तुम्हारी
हर बात मंजूर है, तुम जों भी कहोगी, तुम तो खैर मुझे राजा बनाकर अपने पास रखना चाहती हो मगर मैं गुलाम बनकर भी जीने के लिए राजी हूँ.
किरण- ऐसा न कहो मेरे राजा, तुम तो मेरे सरताज हो, बिन तुम्हारे मेरा क्या क्या है ? तुमने मुझे जों तृप्ति दी है, उस सुख का अनुमान तुम नहीं लगा सकते. यह सुख अमर है.
सूरज- मैंने कुछ खास नहीं किया. जों कुछ किया , वह तुम्हारी दें है, तुमने मेरे मन में प्यार के बीज अंकुरित किये थे, वे अल्प समय में ही पल्लवित और पुष्पित हो गए हैं. मैं उनकी सुगंध से सारे जहां को महका हुआ
महसूस कर रहा हूँ.
किरण- मैं इस प्यार को सहेजकर रखूंगी, कभी भी भुला नहीं पाउंगी . तुम मेरी नजर से देखोगी तो जान पोगी कि तुमने मुझ पर कितना उपकार किया है. अगर आज की रात ठीक सात बार तुम मुझे संतुष्ट कर सकते हो
तो मैं तुम्हें असली मर्द समझूंगी . क्या ऐसा कर पाओगे ?
सूरज- हाँ, हाँ क्यों नहीं ? तुममे हिम्मत होनी चाहिए , मै तो बड़ा पार कर दूंगा . सात बार छोडिये . आठ बार की गारंटी है. आठ बार तक मै प्रणय क्रीडा कर सकता हूँ.
किरण- तब तो मेरा उद्धार ही हो जाएगा. फिर मै कभी नहीं तरसुंगी . हमेशा -हमेशा के लिए तृप्त हो जाउंगी . मेरा यकीन मानो.
सूरज- एक रात में ही आखिर ऐसा क्या हो जाएगा ? एक रात में तो कोई भी तृप्त नहीं हो सकता.ये तुम क्या बोलती रहती हो ?
किरण- इस रहस्य को तुम नहीं समझ पाओगे , यह राज ही ऐसा होता है. जिसे किसीको बताया नहीं जा सकता . लेकिन एक न एक दिन तुम इसे जरूर जान जाओगे. यह मेरा पक्का वादा है.
सूरज-अब तक तो सिर्फ यहाँ का माहोल ही रहस्यमयी लगता था मगर अब तो मुझे तुम भी रहस्मयी लगने लगी हो. हो सकता है कि यह बात बुरी लगे लेकिन सच तो यही है.
किरण- बिलकुल, तुम्हारी बात अपनी जगह सही है, लेकिन मै सिर्फ एक बात कहना चाहूंगी , भरोसा करो तो ?
सूरज- कहके तो देखिये, हर बात मानूंगा . तुम्हारी कोई बात गिरा ही नहीं सकता .
किरण- मैं कभी भी तुम्हारे साथ गद्दारी नहीं कर सकती , हमेशा ही वफ़ा करूंगी . जीवन भर तुम्हारे साथ प्त्रेम करती रहूंगी .
सूरज- मुझे कैसे भरोसा हो , यह तो बताओ .
किरण- कोई दिशा तो मिले, दुनिया ने एक दस्तूर बना लिया है, मुझे बताओ कि अगर किसी की शादी होती है तो क्या वाह उसके साथ सुहागरात नहीं मनाएगा ?क्या वह जीवन भर सिर्फ प्यार
करके ही विवाह के रिश्ते तो कायम रख सकता है, किसी एक जोड़े का उदाहरण तो बताओ .
सूरज- हाँ, यह संभव नहीं दीखता .
किरण- फिर तुम किस पाक मोहब्बत की दुहाई देते हो ? समाज ने सिस्टम ही ऐसा बना दिया है.
सूरज- तो क्या यह भी सीमित दायरे में रहने का परिणाम है. ?सोचता हूँ कि यह न जाने कैसा रहस्य है. हम कौन सी दुनिया से आते हैं और न जाने कौन सी दुनिया में चले जाते हैं. सब कुछ सपना जैसा
लगता है. सुबह अगर आँख खुल जाए तो बेहतर वरना सोते ही रह जाते हैं. ये जीवन -मरण न जाने क्या है ?
किरण- इसके बारे में शाश्त्रों में भी बहुत कुछ लिखा गया है ,लेकिन सब कुछ अधूरा ही है.
सूरज- आपको इसके बारे में इतना कुछ कैसे पता है ? क्या तुम इस सब्जेक्ट में कुछ ज्यादा ही रूचि लेती हो ? क्या तुमने भी इससे जुडी किताबें पढ़ी हुई हैं ? महसूस तो होता है कि तुम्हे इस बारे में
बहुत कुछ ज्ञान है. मै डिस्कस करना चाहता हूँ , कुछ समझना चाहता हूँ. हांलाकि यह मेरा कभी भी विषय नहीं रहा है. मै तो फ़िल्मी गीत पढ़ने में मजा लेता रहा हूँ.
किरण- यह प्यार का मौसम है, प्यार करने से मन तो क्या रूह भी प्रफुल्लित हो जाती है , इसीलिए जीवन में जब कभी भी ऐसे पल नसीब हों ,उन्हें खोना नहीं चाहिए . यहाँ पर हम दोनों के सिवाय
कोई और नहीं है. क्यों न हम लोग इस प्यार के रस को लूट लें, फिर से एकाकार हो जाएँ. जब हम दोनों की महकती हुई साँसे आपस में टकराती हैं तो स्वर्ग जैसा आनंद मिलता है, ऐसी अनुभूति होती है
जैसे कि हम इस जहां के सबसे खुशनसीब हैं. ऐसा एहसास होता है जैसे हमने इस संसार को जीत लिया है.
सूरज- पहले कभी मैं इतना कामुक नहीं होता था. ऐसा नहीं है कि मै कोई साधू था या नामर्द था. उत्तेजना मुझे भी महसूस होती थी लेकिन मैंने किसी महिला के साथ कभी संसर्ग नहीं किया . मैंने कभी
भी इस नजर से किसीको देखा नहीं, शायद ऐसा इसलिए भी हुआ होगा क्योंकि मुझे ऐसा अवसर ही नहीं मिल पाया. मैंने कोशिश तो बहुत की थी.
किरण- शायद इसीलिए तुम अपनी कामशक्ति का अंदाजा नहीं लगा पाए. तुम बहुत कामुक हो, ताकतवर हो. जी चाहता है कि दिन रात तुम्हारी सेवा करूं, तुमसे लिपटी राहू, प्रेम करती रहूँ और तुम्हारे
बदन से लिपटकर ही फना हो जाऊं .
सूरज- मोहब्बत पर अक्सर लोग फना होने की बात क्यों करते हैं, ये बात मेरी समझ में कभी नहीं आई . मोहब्बत में जीने की बात की जानी चाहिए. आखिर तुमने ही तो कहा है कि जीवन प्यार करने के लिए
है , तुम्हारी इन होठों की पंखुड़ियों को चूमना बड़ा सुहाना लगता है. तुम्हारी जीभ का रस चखना बड़ा अच्छा लगता है. इतने कम समय में तुमने मुझे जों प्यार दिया है, उसे मै कभी नहीं भुला पाउँगा . मुझे तुम्हारी
हर बात मंजूर है, तुम जों भी कहोगी, तुम तो खैर मुझे राजा बनाकर अपने पास रखना चाहती हो मगर मैं गुलाम बनकर भी जीने के लिए राजी हूँ.
किरण- ऐसा न कहो मेरे राजा, तुम तो मेरे सरताज हो, बिन तुम्हारे मेरा क्या क्या है ? तुमने मुझे जों तृप्ति दी है, उस सुख का अनुमान तुम नहीं लगा सकते. यह सुख अमर है.
सूरज- मैंने कुछ खास नहीं किया. जों कुछ किया , वह तुम्हारी दें है, तुमने मेरे मन में प्यार के बीज अंकुरित किये थे, वे अल्प समय में ही पल्लवित और पुष्पित हो गए हैं. मैं उनकी सुगंध से सारे जहां को महका हुआ
महसूस कर रहा हूँ.
किरण- मैं इस प्यार को सहेजकर रखूंगी, कभी भी भुला नहीं पाउंगी . तुम मेरी नजर से देखोगी तो जान पोगी कि तुमने मुझ पर कितना उपकार किया है. अगर आज की रात ठीक सात बार तुम मुझे संतुष्ट कर सकते हो
तो मैं तुम्हें असली मर्द समझूंगी . क्या ऐसा कर पाओगे ?
सूरज- हाँ, हाँ क्यों नहीं ? तुममे हिम्मत होनी चाहिए , मै तो बड़ा पार कर दूंगा . सात बार छोडिये . आठ बार की गारंटी है. आठ बार तक मै प्रणय क्रीडा कर सकता हूँ.
किरण- तब तो मेरा उद्धार ही हो जाएगा. फिर मै कभी नहीं तरसुंगी . हमेशा -हमेशा के लिए तृप्त हो जाउंगी . मेरा यकीन मानो.
सूरज- एक रात में ही आखिर ऐसा क्या हो जाएगा ? एक रात में तो कोई भी तृप्त नहीं हो सकता.ये तुम क्या बोलती रहती हो ?
किरण- इस रहस्य को तुम नहीं समझ पाओगे , यह राज ही ऐसा होता है. जिसे किसीको बताया नहीं जा सकता . लेकिन एक न एक दिन तुम इसे जरूर जान जाओगे. यह मेरा पक्का वादा है.
सूरज-अब तक तो सिर्फ यहाँ का माहोल ही रहस्यमयी लगता था मगर अब तो मुझे तुम भी रहस्मयी लगने लगी हो. हो सकता है कि यह बात बुरी लगे लेकिन सच तो यही है.
किरण- बिलकुल, तुम्हारी बात अपनी जगह सही है, लेकिन मै सिर्फ एक बात कहना चाहूंगी , भरोसा करो तो ?
सूरज- कहके तो देखिये, हर बात मानूंगा . तुम्हारी कोई बात गिरा ही नहीं सकता .
किरण- मैं कभी भी तुम्हारे साथ गद्दारी नहीं कर सकती , हमेशा ही वफ़ा करूंगी . जीवन भर तुम्हारे साथ प्त्रेम करती रहूंगी .
सूरज- मुझे कैसे भरोसा हो , यह तो बताओ .
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