Thursday, August 13, 2009

दिलफेंक पडोसन, भाग-21

सलीम- दुनिया में अभी तक ऐसी कोई तकनीक ईजाद नहीं हुयी है...ये लोग सच में करते हैं , फ़िर उसको फिल्माया जाता है... यह जो कुत्ता देख रही हो, इसके साथ पहले इस महिला ने सम्बन्ध बनाए होंगे ... तभी जाकर यह फ़िल्म बन पायी है... देख रहे हो न कितनी खतरनाक है?
फरहा- इसको बंद कर दीजिये , मैं इसको बर्दाश्त नहीं कर पाउंगी... मेरे अरमान मचलने लगे हैं... मन में बहुत खलबली मची है... ऐसा लगता है जैसे की किसीने जिस्म के अन्दर बारूद भरदी हो... मुझे इस रोग से बचाओ...
सलीम- क्या कह रही हो मेरी जान... कितना मनमोहक मंजर है... देखो इस सेक्सी महिला को... कैसा आनंद मिल रहा होगा... इसके चेहरे की तरफ़ तो देखो, कितनी सुखी दिख रही है... इसके दिल में तमाम खुशियाँ देखी जा सकती हैं... कुत्ता भी प्रशिक्षित दिख रहा है... यह भी खूब मजे लेलेकर सहयोग कर रहा है...
फरहा- लेकिन परेशान तो मैं हो रही हूँ... मेरे दिल की धड़कन कितनी बढ़ गयी है, यह देखिये न मैं कितनी बेचैन हूँ... मेरी बेताबी तुम इसीसे समझ सकती हो की मैं ठीक ढंग से बोल भी नहीं पा रही हूँ...
सलीम- अब तुम्क्पो बोलना भी है और इसी स्टायल से सुख भी भोगना है... धीरे -धीरे मैं तुम्हें सब कुछ सिखा दूंगा, मजा कैसे लिया जाता है इसकी पूरी जानकारी मेरे पास है... मैंने पहली वाली बीबी से सब कुछ सीख लिया है...
फरहा- क्या तुम अपनी वाइफ से भी इतना ही सुख पाते थे ?
सलीम- जितना सुख तुम देते हो, इतना वह कभी नहीं दे पाई... वह बहुत मोटी और झगडालू महिला है, उसके साथ जिस्मानी सुख पाने के लिए विशेष प्रयास करने पड़ते हैं... वह ज़रा भी सुंदर नहीं दिखती... तुम्हारे तो वह पैरों की धूल भी नहीं है... फ़िर भी मैं उसे झेल रहा था...
फरहा- क्यों ? क्या निकाह से पहले उसे देखकर नहीं आए थे ?
सलीम- नहीं हमारे गाँव में ऐसा चलन नहीं है... किसी रिश्तेदार से ही निकाह होता है... कभी -कभी तो लड़की -लड़का पहले ही देख लेते हैं और कभी नहीं भी देख पाते... यह मेरे मामा की लड़की है... मगर मैं इसे पहले कभी भी नहीं देख पाया था... निकाह के बाद गाँव बहुत कम ही जा पाया और अब जबकितुम आ गयी हो तो जाने की कभी इच्छा ही नहीं होगी...
फरहा- अगर तुम उसे पसंद नहीं करते तो फ़िर दो बच्चे कैसे हो गए ? क्या तब कुछ नहीं सोचा ?
सलीम- बच्चे क्या हैं, वो तो हो जाते हैं... शादी तो एक सामाजिक लायसेंस की तरह होता है... मैं मुंबई में हूँ और वह गाँव में हैं मुझे नहीं लगता की वहाँ वह सिर्फ़ मेरी यादों के सहारे ही जीवन बिता रही होगी...
फरहा- क्या कह रहे हो ? क्या ऐसा भी हो सकता है ? क्या वह कर सकती है ऐसा ?
सलीम- हाँ, हाँ क्यों नहीं जब मैं उसके साथ बेवफाई कर सकता हूँ तो उससे वफ़ा की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? मैं आँखें बंद करके चलने वाला नहीं हूँ, बलिक सब कुछ टोल-मोलकर ही करता हूँ... मैं ऐसा स्वार्थी भी नहीं की सिर्फ़ सामने वाले पर ही आरोप लगाऊँ, अगर मेरी भी गलती हुई तो मैं उसको स्वीकार करता हूँ....
फरहा- तो क्या तुम्हें अपनी पत्नी पर भी संदेह है ?
सलीम- शादी जब तक नही होती तब तक अलग बात है लेकिन उसके बाद किसी महिला का बिना मर्द के एकसाल अकेले रहना मुमकिन नहीं है... खासकर मेरी जैसी पत्नी का... मेरे बिना भी वह रह रही है , इसका मतलब होता है की उसने कोई विकल्प ढूंढ लिया है...
फरहा- जो तुम कह रहे हो, इससे तो महिलाए नाराज हो सकती हैं... आप महिलाओं पर आरोप लगा रहे हैं...
सलीम- जी नहीं, सिर्फ़ एक सदस्य के बारे में अपनी राय जाहिर कर रहा हूँ...
फरहा- लेकिन वह सदस्य महिला है और आपकी पत्नी भी है...
सलीम- जी... तो आप उसे सिर्फ़ महिला कैसे कह सकती हैं, और उससे पूरे महिला समाज को कैसे जोड़ सकती हैं?
फरहा- तर्क में तो आपसे कोई नहीं जीत सकता...
सलीम- और तुमसे मोहबात में ... इस प्रणय क्रीडा की तुम सबसे हसीं खिलाडी हो...
फरहा- ठीक है मेरी जान... मैं अब तुम्हें एक ऐसी बात बताउंगी जिसे सुनकर तुम हैरत में हो जाओगे...

Wednesday, August 12, 2009

दिलफेंक पडोसन, भाग- 20

सलीम उसका आमंत्रण समझ रहा था लेकिन उसे चिढाने के लिहाज से वह थोडी देर खामोश रहा... फरहा बेताब हो रही थी... उसके दिल की धड़कनें बढती जा रही जा रही थीं... वह अपनी प्यास बुझाने के लिए प्रयासरत थी... सलीम भी कम बेचैन नही था...उसकी रग- रग में फरहा बस चुकी थी... फरहा की मदमस्त जवानी का नशा उसके सर चढ़कर बोल रहा था... वह जोरदार अंगडाई लेते हुए बोला-
-अब मैं और तुम एक हो चुके हैं, इस प्यार को कभी कम मत करना... यही प्यार को डोर के सहारे हमको जीवन का सफर तय करना है... मैं तुम्हें अपनी शरीके हयात बनाने की योजना बना चुका हूँ...तुमने अपने परिवारवालों से इसका जिक्र किया की नही ?
फरहा- जब मैंने हाँ करदी है तो और किसीको बीच में लाने की जरूरत नहीं है... तुम अपनी बीवी से पूछलो... ऐसा ना हो की वह बेवजह अड़ंगा डाले... तब तक मैं भी पक्का निर्णय ले लुंगी... वैसे भी अब क्या बच्चा है ? तुम मेरा सब कुछ तो लूट ही चुके हो... मेरे तन और मन पर अपना अधिकार जमा चुके हो... सबसे बड़ा समर्पण होता है... और मैं अपना कुंवारा बदन तुम्हें सौंप चुकी हूँ....
सलीम- मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो सिर्फ़ लड़की का जिस्म हासिल करने के लिए ही प्यार का दिखावा करते हैं... मैं जन्म जन्म तक साथ देने के इरादे से तुम्हें मिला हूँ... मेरा प्यार सच्चा है...
फरहा- मैं भी तुहें दिल से चाहती हूँ... मैं जीवन में कभी भी तुमको शिकायत का मौका नहीं दूंगी... तुहें दिन रात प्यार कर दूंगी... तुम जब भी मुझे हासिल करना चाहोगे मैं सहर्ष तैयार हो जाउंगी... भले ही अभी तक हमने कानूनन निकाह नहीं किया मगर मैं तन और मन से तुम्हारी पत्नी बन चुकी हूँ... जब भी चाहो आजमाकर देख लेना... मैं भी इस तरह की लड़की नहीं हूँ जो सिर्फ़ मर्दों को मूर्ख बनने के इरादे से ही उन्हें जाल में फंसाती हैं...
सलीम- हम दोनों के विचार आपस में बहुत ज्यादा मिलते हैं तभी तो हम लोग एक दूसरे के इतने करीब आ चुके हैं... और देखो लगता भी ऐसे ही है जैसे की वर्षों एक दूसरे के करीब रहे हों...कितना अपनत्व है... इसे सदा ऐसे ही बनाए रखना ...
सलीम- मैं मर भी गया तो भी यह मोहब्बत कम नहीं होगी... अब मैं तुमको अपने आपसे भी ज्यादा प्यार करने लगाहूं... पता नहीं कहाँ से इतना प्यार उमड़ आया है... मैं तो हैरान हूँ... पहले कभी कभार अकेले में महिला की याद तो सताया करती थी लेकिन इतनी बेताबी कभी नहीं देखी गयी...
फरहा- मैं ? मुझे देखिये न... मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था की किसी लड़के के साथ इस तरह जिस्मानी सम्बन्ध बनूंगी... फिल लाइन में संघर्ष करने के बाद भी मैंने कभी कोई समझौता नहीं किया... तब भी यह हाल है ... ऐसा बुरा हाल तो मेरा कभी नहीं हुआ... इस वक्त मेरा पूरा जिस्म अकड़ रहा है... इच्छा हो रही है की तुम इसे ढंग से मसल डालो... आह.... देखो न अब इसका इलाज तुम्हारे ही हाथ में है...
सलीम - यह ऐसा सुख है की जितना बेसब्री का दुःख उठाओगी उतना ही ज्यादा मजा ले पाओगी...
फरहा- ऐसे तो किसी भी क्षण प्राण निकल जायेंगे... क्यातुहें तभी सुख का एहसास होगा... मैं कामोत्तेजना के आगोश में पहुच चुकी हूँ... मुझे अपनालो... मेरे सब दुःख दर्द दूर कर डालो...
सलीम- फ़िक्र मत करो आज मैं तुहें एक नई फ़िल्म दिखाता हूँ, उसेदेखने के बाद तुम्हारी भावनाएं और भी भड़क उठेंगी... तुम मतवाली होकर मोर की तरह नाचने लगोगी... मुझे पुकारोगी , खूब सहलाओगी और मुझमे समाने का प्रयास करोगी... जानती हो हम कितने खुशकिस्मत हैं ? सबको ऐसा प्यार नसीब नहीं होता...
फरहा- मैं इस आग में जलने लगी हूँ... मुझे अब कुछ दिखाई नही दे रहा...
सलीम को उसकी हालत पर तरस आ गया... उसने जल्दी से एक ब्लू फ़िल्म स्टार्ट करदी... इस फ़िल्म का संगीत बेहद उत्तेजक था... फ़िल्म के द्रश्य उससे भी ज्यादा डेंजर... एक गोरी और मोटी विदेशी महिला बिल्कुल नग्न अवस्था में दिख रही थी... एक कुत्ता उसके पास आया और उसके ख़ास अंग को चाटने लगा, इस बार फरहा के साथ-साथ सलीम भी गर्म हो गया... उसका दिमाग भन्नाने लगा... जब कुछ नही सूझा तो कुत्ते की तरह वह भी फरहा के बदन को चूमने लगा... फरहा ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया फ़िर उसे अपने यौवन द्वार पर रख दिया... सलीम इशारा पाकर शुरू हो गया... इससे फरहा को थोडी सी राहत मिली... लेकिन यह आंशिक थी...सलीम पूछने लगा-
- कैसा लग रहा है मेरी जान ? गजब की फ़िल्म है ना ? देखो दूसरे लोग कहाँ से कहाँ पहुच गए हैं ?
फरहा- क्या यह सच में भी हुआ होगा , या कैमरा और कम्प्युटर की मदद से ऐसा हो गया है ?
















Monday, August 10, 2009

दिलफेंक पडोसन, भाग-18

फरहा- ये आप क्या कह रहे हैं ? दिखने में तो वे पंडित जी बड़े सीधे और सरल लगते हैं... मगर तुम बता रहे हो की नौकरानी से लगे पड़े थे और जब तुमने उनको रेंज हाथों पकडा तो तुम्हें भी ऑफर करने लगे ?
सलीम- अरे मैं तो हैरान रह गया था... उस नौकरानी ने अचानक मुझे अपनी तरफ़ खीच लिया था , मैं बेड पर गिर पडा... वह नौकरानी थोडी उम्र दराज थी लेकिन जिस्म बड़ा कंटीला था , एक बार तो इच्छा हुई की बहती गंगा में मैं भी हाथ धोलूँ , मगर फ़िर कुछ सोचकर मैंने साफ़ इनकार कर दिया... वह कहने लगी-
- अगर आप मुझे स्वीकार नहीं करोगे तो किसीसे कह दोगे... एक बार मजा लेकर देखो , फ़िर अपनी मास्टरनी को भी भूल जाओगे... मैंने अभी तक शादी नहीं की... अभी तक ये पंडित जी ही आनंद भोगते हैं... अगर तुम भी अपनी प्यास बुझाने लगो तो मुझे कोई ऐतराज नही होगा...
पंडित जी- हाँ भी मास्टर जी... सच कह रही है... मैं भी इससे पूरी तरहसे सहमत हूँ... अब बूढा हो चुका हूँ यार... इसको मनमाफिक मजा नहीं दे पाटा हूँ... तुम जैसा नौजवान हो तो अपना भी दिल बहल जाए और इसको भी आनंद मिल जाए... यह बेचारी थोड़े ही इसके बदले कुछ लेती हैयह तो बस मिजाज की रंगीली है... मौज मस्ती लेना पसंद है... भरोसेमंद भी है... अब इसका फैसला करना तुम्हारे हाथ में है... ऐसे अवसर जीवन में बार-बार नहीं मिलते ... घर बैठे हुस्न की मलिका तुम्हें पुकार रही है... इसीको अपने यहाँ काम पर रखलो... जब जी में आए तभी किवाड़ बंद करके सुख लेलेना ... जब जी करे तो रात में रोक लेना...
फरहा- फ़िर भी तुमने ऐसे समय को हाथ से जाने दिया... शायद एकाध बार तो मस्ती ली ही होगी...
सलीम- क्या कह रही हो... मैं तुम्हें ऐसा दीखता हूँ क्या ? तुम्हारे ऊपर दिल आ गया है , इसका मतलब यह नहीं की मैं बाद चलन हूँ या फ्व्फिर रंगीन मिजाज हूँ...
फरहा- तुम तो इतनी जल्दी नाराज हो गए... मैं तो बस यूँ ही कह रही थी, अब की बात थोड़े ही कर रही हूँ ... अब तो तुम्हारा सारा समय मुझे चाहिए... जब टाइम पास करने का कोई रास्ता नहीं था, उस वक्त अगर तुम इस तरह का कोई रास्ता ढूंढ लेते तो मुझे कोई परेशानी नही होती....
सलीम- तुम मिल गयी हो , और मुझे क्या चाहिए... मेरे लिए तुम्हीं सब कुछ हो...
फरहा- अच्छा ठीक है... कोई बात नहीं , इस टोपिक को बंद करके अब हम लोग चलते हैं फ़िल्म देखने...
सलीम- थियेटर में अब मजा नहीं आता... यहीं पर जानदार फ़िल्म दिखाता हूँ... कल जो देखिये वह इतनी मजेदार नहीं थी... आज तुम्हें दिखाता हूँ की सेक्सी महिलायें किस कदर अपनी जवानी के जोश से मजबूर हो जाती हैं और फ़िर वे कौन सा रास्ता अपनाने के लिए तैयार हो जाती हैं... यहाँ तक की वे जानवरों से भी जिस्मानी ताल्लुकात बनाने से नहीं चूकती... ऐसी कहानी सिर्फ़ फिल्मों में नहीं हकीकत में भी होती हैं...
फरहा- मैं नहीं मानती... भला लड़कियों के लिए लड़कों की क्या कमी है जो वे ऐसा रास्ता चुनेंगी... अब मुझे ही देखो, अगर मैं किसी बी ही लड़के को अपना बदन सौंपने की पेशकश करुँ तो बताओ कौन सा लड़का मना करेगा ?
सलीम- मैंने ख़ुद उस नौकरानी को इनकार कर दिया था... और किसकी कहूं...
फरहा- आपकी बात इसलिए अलग है क्योनी उस समय नौकरानी के अलावा तीसरा व्यक्ति भी मौजूद था और यह पेशकश अचानक की गयी थी... अगर वही नौकरानी अकेले में तुमसे कहती तो मना नहीं कर पाते तुम भी...
सलीम- अच्छा जी... बात वैसे तुम सच कह रही हो... अगर वह नौकरानी उस वक्त गैर व्यक्ति के साथ आपत्तिजनक अवस्था में नही पकडी जाती तो हो सकता है की मेरे मन में भी उसके प्रति हमदर्दी जाग्रत हो जाती, प्यार उमड़ सकता था ...क्योंकि भले ही वह नौकरानी थी , लेकिन जवानी में भन्ना रही थी... बहुत गज़ब दिखती थी... तभी तो उसकी हर जगह डिमांड रहती थी...
फरहा - अब वह यहाँ नहीं आती क्या ?
सलीम- नहीं उस दिन के बाद एकाध बार आई थी, फ़िर शायद झिझक और शर्म की वजह से उसने काम छोड़ दिया, सुना है अब वह पंडित से अलग जगह पर मिलती है...
फरहा- अब दुनिया को जाने दीजिये... अपने प्यार की बात करते हैं...

Sunday, August 9, 2009

दिलफेंक पडोसन,17

सालों को लगता था की उसने पहले ही दिन अपना कम कर दिया है, यानी की वह मोर्चा मार चुका है , जबकि फरहा को लगता था जैसे की वह अपनी जंग पहले ही दिन जीत चुकी है... यह एक ऐसी जंग चल रही थी जिसमे दोनों ही अपने आपको जीता हुआ महसूस कर रहे थे... सच्चाई यह थी की उन दोनों ही हार चुके थे... सलीम दौलत हार रहा था और फरहा अपना चरित्रजब सलीम आ गया तो फरहा ख़ुद उसे ऊपर तक लेकर गयी... इस द्रश्य को सोसाइटी के कई सदस्यों ने अपनी आंखों से देखा, कुछ ने खुसर फुसर भी की मगर फ़िर सब अपने-अपने कामों में जुट गए... वैसे भी मुंबई में किसीके पास फालतू बातों के लिए वक्त ही कहाँ है... दूसरे के फटे में टांग डालने के बजाय सब लोग अपनी- अपनी फटी सीने में लग जाते हैं.... सलीम से चाबी लेकर उसने ख़ुद दरवाजा खोला और अपने घर चाय बनाने चली गयी... वह बेहद खुश थी... उसे खुश देखकर उसकी नानी भी खुश हुयी ... बोली-

- बहुत खुश हो फरहा ? क्या बात है , कहीं कारूं का खजाना मिल गया है क्या ? पहले तो कहती थीं की यहाँ नहीं आउंगी, और अब देखो... पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं... हम भी तो जानें की आख़िर बात क्या है ?

- आप भी कमाल करती हैं नानी... अगर मैउन चुप होती हूँ तो आफत खादी हो जाती है और खुश रहती हूँ तो टोकाटाकी शुरू हो जाती है... फ़िर आप लोग ही तय करें की मुझे करना क्या है ? जब हसने कहोगी , हसूंगी और रोने कहोगे तो रो लुंगी... तब तो सब कुछ शांत हो जाएगा न ?

नानी - क्या कहती हो बेटी... रोएँ तुम्हारे दुश्मन... मुझे तो तुम तभी अच्छी लगती हो जब तितलियों की तरह घूमती फिरती हो... धमाल मचाती फिरती हो... तुम्हारे होठों को खामोशी नही सुहाती... लेकिन इस जमाने से डर लगता है... आजकल के मर्द बड़े सयाने होते हैं... बहला-फुसलाकर अपना काम निकाल लेते हैं और फ़िर दूध में से मक्खी की तरह निकालकर फेंक देते हैं... इस तरह के लड़कों से बचना...

फरहा- मैं अब बच्ची नही हूँ नानी... बुरा भला सब समझती हूँ, तुम फ़िक्र मत करो... मुझे कोई चीट नहीं कर सकता... मैं कोई अबला, अनपढ़ या गाँव की गंवार नहीं हूँ जो की कोई मुझे ब्लेक कर सकता है, या यूज कर सकता है... मैं ख़ुद ऐसे लोगों को सबक सिखाने में सक्षम हूँ...

नानी- हाँ, बेटी... यह तो अच्छी बात है... मगर इस ज़माने की क्या कहें... यहाँ अगर एक बार किसी लड़की के दामन पर दाग लग गया तो वह जीवन भर नहीं धुल पाटा...

फरहा- ये सब पुरानी बातें हैं , तुम किसीकी बात मत सुनना ... मैं हूँ बात करने के लिए... कोई कुछ बोलकर तो देखे... किसीकी हिम्मत नहीं है... मैं चलती हूँ... चाय तैयार हो गयी है, लीजिये पहले आप और नानाजी पियेंगे फ़िर पिलाकर आऊंगी उस टीचर को... थका हारा आया है... मैं चली... अपनी दवा ले लेना...

थर्मस में चाय लेकर जब फरहा सलीम के घर पहुची तो वह हाथ मुह धोकर सेंत लगा रहा था... आज वह पहले के मुकाबले ज्यादा खुश था... उसने सभी खिड़कियाँ पहले से ही बंद कर राखी थीं... अब फरहा गेट भी बंद करके आ चुकी थी सो जैसे ही फरहा उसके पास पहुची, सलीम ने उसको अपनी बांहों में भरकर चूम लिया... फरहा छटपटाने लगी... सलीम उसके होठों का रसपान करने लगा... मन में क्लाम्क्रीदा के भाव जाग्रत होने लगे... उसने फरहा के गले को कई बार चूमा, उसने सोने का हार जो पहन रखा था... सलीम ने उस उंगली को भी चूम लिया जिसमे उसने सोने की अंगूठी पहनाई थी... फरहा भी उस पर खूब प्यार न्यौछावर करने लगी ... वह इतना अपनापन दिखाने की कोशिश कर रही थी जैसे की वह उसकी पत्नी नहीं प्रेमिका हो... सलीम भी उससे खूब प्यार कर रहा था... उसको निर्वार्स्त्र करके उसके सीने को मसल रहा था... ऐसा करने से फरहा बेचैन हो रही थी... उसने बेताब होकर कहा-

-ऐसा मत करिए , पहले चाय पीलिजिये... मैं बेचैन हो जाउंगी, ऐसा ना हो की कुछ गड़बड़ हो जाए,,,,

सलीम- कुछ नहीं होगा मेरी जान... मेरा पास तुम्हारे अधरों का बेशुमार अमृत मौजूद है और तुम चाय पीने को कहती हो, मैं तो एक क्षण के लिए भी तुमसे अलग नहीं हो पाऊंगा... अब मुझे अपनी सीने में बसा लीजिये... देखिये फ़िर किसी भी रास्ते से निकल नहीं पाऊँ...मैं तुमको धड़कन बनाकर अपने दिल में बंद कर चुका हूँ...

फरहा- आज मेरी नानी कुछ अजीब सी बातें कर रही थी, मुझे लगता है उनको हमारे बारे में कुछ डाउट हो चुका है, जब मेरी नानी होकर वो मेरे पे शक कर सकती हैं तो सोसाइटी के और लोग क्यों नहीं करंगे, ऐसा ना हो की हम लोग बदनाम हो जाएँ...

सलीम- तुम घबराती क्यों हो... मैं हूँ ना तुम्हारे साथ... हम लोग पहले ही सबसे अपना कोई रिश्ता बता देते हैं जैसे भाई की साली या फ़िर ऐसा ही कोई दूसरा रिश्ता... इससे सब जान जायंगे की रिश्तेदारी वाली बात है...

फरहा- मगर मेरे नानी- नाना... वे क्या कहेंगे... जब कोई उनसे पूछेगा तो वे नहीं बता पायेंगे...शक करेंगे वे अलग से... इससे अच्छा तो यही है की हम दूर का कोई रिश्ता बता देंगे... और कोई कहेगा क्या ? इस सोसाइटी में ऐसा कौन सा चरित्रवान बैठा है जिसने कभी किसीके साथ सम्बन्ध नहीं बनाया हो... अरे सबकी औकात जानता हूँ मैं... वह तीसरे माले पर जो पूजा हवं कराने वाले पंडित जी रहते है न, एक दिन मैंने उनको और उनकी नौकरानी को एक ही बेड पर बिल्कुल नग्न अवस्था में देख लिया था... वे सेक्स करने में मशगूल थे... उन्होंने जल्दबाजी इतनी की थी की दरवाजा लगाना ही भूल गए थे... इत्तेफाक से जब मैं दरवाजा खोलकर अन्दर घुसा तो खुसर -फुसर की आवाज सुनी, मैं बैडरूम में गया तो दोनों लगे पड़े थे... वे पूरे जोश में थे और उनकी साँसे जोर -जोर से चल रही थीं... काम क्रीडा में वे इतने मगन थे की मेरे कदमो की आहात भी नहीं सुन पाये... जब मुझे सामने खड़े देखा तो दोनों शर्मिंदा होने के बजाय मुझे भी उस क्रीडा में शामिल होने का आमंत्रण देने लगे, नौकरानी ने तो मुझे अपनी बांहों में भीचकर बेड पर ही गिरा दिया था और वह पंडित जी दौकर दरवाजा बंद करने चले गए थे...

Saturday, August 8, 2009

दिलफेंक पडोसन , भाग-16

एड्स हो या कोई और बीमारी , सबसे पहले इनसे बचने की कोशिश करनी चाहिए ,,, बचाव मजबूत होगा तो कोई बीमारी पास में फटक भी नहीं सकती... क्या मजाल है जो इंसान कभी कमजोर पड़ जाए... और अगर किसी तरह से कोई रोग लग भी गया तो उससे हार नहीं माननी चाहिए... बल्कि उससे डटकर मुकाबला करना चाहिए... तुम्हारा यह द्रष्टिकोण मुझे अच्छा लगा... इसीलिए मैं बहुत अच्छे वाला कंडोम लेकर आने वाला हूँ... फिलहाल तो ऐसा ही है... कल देखना कैसा कंडोम लाता हूँ, तुम्हारी तबियत खुश हो जायेगी...
फरहा- कुछ ख़ास है क्या ? अगर है तो फ़िर आज ही क्यों नहीं लाते ? कल का क्या है ? कल किसने देखा है ?
सलीम- हाँ है तो बहुत ख़ास .... यह ऐसा कंडोम है जो वाइब्रेट करता है... इससे तुम्हें अथाह सुख मिलेगा... यह भले ही महगा आता है... लेकिन तन-मन दोनों को संतुष्ट कर देता है... खुश हो जाओगी तुम...
फरहा- अच्छा जी, ऐसी बात है... फ़िर तो जल्दी लाओ, मुझसे अब दूरी सहन नहीं होती... तुमने मेरे मन में ऐसी हलचल मचादी है की अब मिलने की इच्छा जाग्रत होने लगी है... मन में खालिबली हो रही है...
सलीम- मन तो मेरा भी चाह रहा है की उड़कर तुम्हारे पास आ जाऊं , लेकिन ऐसा सम्भव तो नहीं है... फ़िर भी मैं जितनी जल्दी आ सकता हूँ, आने की कोशिश करूँगा... मेरे ख़याल से एक घंटे से ज्यादा नहीं लग्न चाहिए...
फरहा- तुम बहुत अच्छे हो सलीम... जल्दी आजाओ आज मैं तुम्हारे लिए गर्मागर्म पकोडे बनाने वाली हूँ...
सलीम- अच्छा, यदि ये बात है तो एक अद्धा भी डालता लाऊँ ? तब जवानी का रस पीने में खूब मजा आएगा...
फरहा- ये क्या होता है ? अद्धा ? ये किसी वेपन का नाम है क्या ? ऐसे तो हथियारों के ही कोड वर्ड होते हैं...
सलीम-नहीं , मेरी जान... यह हथियार नहीं होता मगर हथियार से कम भी तो नहीं होता ... यह शराब के अद्धे की बात हो रही है... एक गिलास पीते ही मस्त हो जाओगी... मद मस्त जवानी और भी जबरदस्त हो जायेगी... क्या तुम्हें उस सर्वे के बारे में जानकारी है जिसमे कहा गया है की अनसेफ सेक्स करने से दिमाग तेज होता है ...वेस्ट स्कॉटलैंड यूनिवर सिटी के
स्टुअर्ट ब्रॉडी और उनके कलीग ने अपनी स्टडी में पाया कि कॉन्डम के बिना सेक्स करना महिला और पुरुष दोनों की मानसिक सेहत के लिए फायदेमंद है... हालांकि यह दूसरी बात है कि असुरक्षित यौन संबंध से प्रेगनंसी और एड्ज़ जैसी बीमारी का खतरा है... ब्रॉडी के मुताबिक असुरक्षित यौन संबंध नेचरल प्रोसेस है... इसके कई फायदे हैं... स्टडी में यह बात भी पाई गई कि कॉन्डम से सेक्स करना कुछ लोगों की खराब मानसिक हालत के लिए जिम्मेदार था... रिसर्चर्स ने पुर्तगाल में 99 महिलाओं और 111 पुरुषों के ऊपर यह स्टडी की... ये वे लोग थे जो तनाव से गुजर रहे थे... ब्रॉडी ने पाया कि जो लोग अनसेफ सेक्स करते हैं, वह तनाव से दूसरों की तुलना में ज्यादा बेहतर तरीके से निपटते हैं। यही नहीं उनकी मेंटल हेल्थ भी बेहतर रहती है...
फरहा- हाँ , लेकिन दिमाग के चक्कर में पूरे शरीर का नाश हो सकता है... मैंने सुना है की एड्स जिसको हो गया , उसकी सात पुश्तें तक बेकार हो जाती हैं... इससे अच्छा तो ये है की दिमाग भले ही कम रहे मगर जिस्म सुरक्षित रहता है... अगर जिस्म नहीं तो फ़िर जान नही... जिन्दगी नही...
सलीम- हाँ, तुम बिल्कुल ठीक कहती हो , अब आगे की चर्चा हम मिलने पर करेंगे, हमारी चर्चा को इतना समय हो चुका है की मैं आधे रास्ते तक आचुका हूँ... कुछ ही समय के बाद मैं आ जाऊँगा...
फरहा- आओ मेरी जान , मैं भी बेसब्री के साथ इन्तजार कर रही हूँ...
जब तक सलीम वहाँ पहुच नहीं गया तब तक वह उसका इन्तजार ही कर रही थी... आज उसकी रंगत कुछ बदली हुयी थी... आख़िर वह कली से फूल बन चुकी थी...

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Friday, August 7, 2009

दिलफेंक पडोसन , भाग-16

इन द्रश्यों को
देखकर फरहा और सलीम खूब उत्तेजित होने लगे थे... उनके मन में भी यह भावना उठने लगी थी किस तरह से वह उन फिल्मी पात्रों की तरह शारीरिक सम्बन्ध बना पाते हैं... फ़िल्म और भी ज्यादा भड़काऊ होती जा रहा थी... सलीम ने जोश में आकर फरहा को अपनी कैद में जकड लिया... यह माहोल बेहद रंगीन था... इन रंगीनियों में वे दोनों अपना एक अलग ही जहाँ बनाने के लिए बेताब थे... सलीम ने फरहा के नाजुक होठों का रसपान करना शुरू कर दिया... अब वे दोनों मोहब्बत की आख़िरी मंजिल पर जाने के लिए बेताब हो गए... उस रात सलीम ने फरहा की जवानी का जमकर आनंद लूटा... फरहा भी खुश थी, उसको सोने की अंगूठी तो मिल ही चुकी थी और सोने के हार का वादा भी मिल गया... इससे ज्यादा वह और क्या सोच सकती थी... वह सुबह होने से पहले ही वह अपने कमरे में चली गयी... सुबह होने पर उसने नित्यकर्म के बाद अपने फ्लेट में ही नाश्ता बनाने के बाद नाना- नानी को खिलाया और फ़िर सलीम को भी नाश्ता कराया... वह ऐसा माहोल तैयार करने में लगी थी जिससे की सलीम को अपनापन का एहसास हो... जब वह ड्यूटी पर चला गया तो फरहा ज्वेलर्स की दूकान पर गयी और उसे पाँच तोले के हार का ऑर्डर दे दिया... सलीम ने तो उसको पहले ही फोन कर दिया था... दूकान वाला उसकी पहचान का था इसलिए फ़ौरन हार दे दिया, फरहा ने भी झंझट से बचने के लिए ऐसे हार का चयन किया जो पहले से ही रेडी था... वह खुश थी... उसने सलीम को भी फोन करके बता दिया की घर में राशन नहीं है... सलीम ने उसको आश्वाशन दिया की हर महीने उसके घर का राशन वह ख़ुद भरवा दिया करेगा... अपने मोबाइल के पेंडिंग बिल का जिक्र भी उसने सलीम से कर दिया... सलीम ने हमेशा के लिए उसके मोबाइल बिल भरने की जिम्मेदारी स्वीकारते हुए कहा-
- अब तुम्हारी सारी परेशानियां मेरी हैं, सारे दुःख मेरे हैं और मेरे सारे सुख तुम्हारे हैं... तुम्हारे टीवी केबल का बिल , कपडा धोने का बिल, नौकरानी की पगार , लाईट बिल, मोबाइल बिल अब ये सब मेरी जिम्मेदारियां हैं... तुम सिर्फ़ ऐश करो... मैं चाहता हूँ की तुम्हें कोई टेंशन नहीं होने पाये, तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है...
फरहा- थेंक यू सलीम, तुम कितने अच्छे हो ... अब मैं बहुत जल्द अपनी मंजिल हासिल कर लुंगी... जल्दी आओ न मुझे तुम्हारी याद सता रही है, यह बहुत सुंदर हार है... मैं इसे पहनकर तुम्हें दिखाना चाहती हूँ...
सलीम- फ़िक्र मत करो मैं जल्दी ही आ जाऊँगा... वैसे भी मनपा स्कूल में सब चलता है... मैं आता हूँ, मैं ख़ुद यह देखने के लिए बेचैन हो रहा हूँ... और सुनो... किसी की नजर ना लगे इसके लिए अपनी नानी से कहकर नजर का टीका लगवा लेना... वैसे बची-खुची नजर मैं रात को आकर उतार दूंगा...
फरहा- तुम बड़े वो हो... फोन पर भी ऐसी शरारती बातें करते हो... चलो अब रखती हूँ फोन... मुझे तुम्हारे लिए सजना सवारना भी तो है...
सलीम- तुम जैसी हो वैसी ही बेहद खूबसूरत लगती हो... हूर परी भी तुम्हारे सामने कुछ नहीं है मेरी जान...
फरहा- बात बनाना तो कोई तुमसे सीखे... जब कहते हो तो ऐसे कहते हो की झूठी तारीफ़ करने लगते हो...
सलीम- और बातें काटना कोई आपसे सीखे... एक तो तारीफ़ कर रहा हूँ, मगर यह कोई नयी तारीफ नहीं है... सब लोग पहले से ही हुस्न की तारीफ़ करते चले आए हैं... मेरा नाम भी उन्हीं में शामिल हो गया...
फरहा- ज़रा संभालकर आना... ट्रेन में आजकल बहुत खतरे हो गए हैं... लटकना बिल्कुल मत... बहुत भीड़ रहती है यहाँ, जैसे सारी दुनिया के मुसाफिर यहीं आ गए हों... और ये रेलवे वाले भी कम नहीं हैं... टिकट के पैसे लेकर सबको एक ही डिब्बे में घुसने की इजाजत देदेते हैं, फ़िर चाहे कोई गिरे या मरे ... इनकी बला से....
सलीम- रेलवे वालों को कोसने से कुछ नहीं होगा, हमको भी सावधानी बरतनी होगी... हमें भी सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए, मैंने कुछ ऐसे लोगों को देखा है जो की ट्रेन की छत पर बैठकर सफर करते हैं... यह भी कोई बात हुई...
फरहा- ठीक है,,, रेल के प्रवक्ता... अब ध्यान से सुनो... kandom लाना मत bhoolnaa , कल वाले सब khatm हो चुके हैं समझे...भूल गए तो समझो हम दोनों गए... आजकल ना जाने कितने तरह के रोग लग गए हैं... मैं तो विज्ञापन देखते-देखते ही थक गयी हूँ...क्या ये सच होते हैं ?
सलीम- बिल्कुल सच ही होते होंगे, अगर सरकार कहती है तो ग़लत थोड़े ही कहती होगी... वैसे कुछ लोग ये भी कहते हैं की कंडोम कम्पनियां अपने प्रोडक्ट बेचने के लिए यौन रोग का हौव्वा खडा करती हैं... एड्स के नाम मात्र से ही लोगों को पसीने छोटने लगते हैं... पहले तो हर इंसान यही सोचता है की उसको कभी भी एड्स नहीं हो सकता... मगर जब हो जाए तो आत्महत्या तक की नौबत आ जाती है, कितने ही लोग ऐसे हैं जो मर जाते हैं...
फरहा- मरना ठीक नहीं है , यह किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता, बलिक हमको लड़ना चाहिए... जो भी परेशानी है उसका हल निकालना चाहिए...
सलीम- तुम सच कहती हो... मैं भी इन्हीं विचारों का हूँ...