Saturday, May 16, 2009

तड़प, भाग-35

राजेश के दोस्त रवि की आंखों में वासना के भाव दिखाई देते थे , कम समय में ही वह उसके बारे में काफी कुछ अंदाजा लगा चुकी थी... उसने सोचा भी नहीं होगा की उसका होने वाला पति ही उसकी इज्जत को तार-तार करने का इंतजाम कर चुका था... शैली की मुश्किल यह थी की वह राजेश की किसी भी बात को गिरा नहीं सकती थी... उसने जो कह दिया सो कह दिया , उसकी हर बात उसके लिए मायने रखती थी, वह अपनी छवि एक आज्ञाकारी प्रेमिका की बनाना चाहती थी इसलिए उसने हवेली में जाना ही बेहतर समझा... थोडी देर के बाद ही उसके मम्मी -पापा भी वहाँ पहुच गए , शैली ने उनको खेत के बारे में शुभ सूचना दी और थोडा सा इशारा करने के बाद वह चली गयी... हवेली तक वह छिपते-छिपाते पहुची... हवेली के अन्दर सिर्फ़ तीन लोग ही मौजूद थे...राजेश, रवि और रवि की प्रेमिका ...रवि अपनी प्रेमिका रोजी को मुंबई से ही लेकर आया था, वह खुले विचारों की लड़की थी...जब शैली ने हवेली में प्रवेश किया तो रोजी, रवि और राजेश जाम छलका रहे थे... थोड़े से संकोच के बाद शैली ने गिलास हाथ में थाम लिया, चीयर्स की आवाज के साथ ही फ़िर पीने का दौर शुरू हो गया...
दीपू- तुमने गिलास हाथ में क्यों पकडा ? इनकार करना चाहिए था तुम्हें ?
शैली- हाँ, वाही तो नहीं कर पाई मैं , उसीका खामियाजा तो मैं अब तक भुगत रही हूँ... उन लोगों ने ऐ मुझे पीने की ऐसी लत डाली की अभी तक भुला नहीं पाई हूँ... अब यह शराब मेरे जीवन के लिए उतनी ही जरूरी बन चुकी है जितने की तुम...
दीपू- शुक्रिया शैली... इतना प्यार देने के लिए मैं अआभारी हूँ...
शैली - फोर्मेलिती मत करो दीपू... मैं कहाँ कर रही हूँ... तुम्हारे मुह पर तारीफ़ करने कामतलब यह नहीं होता की मैं चापलूसी कर रही हूँ... मुझे तो आदत है सच कहने की...
दीपू- ठीक है, मैं आगे की बातें सुनना चाहता हूँ,। अपनी शैली में ही बताइये...
शैली-बस मैंने शराब पीनी शुरू की और रवि ने मेरे हुस्न की तारीफ़ करते हुए कहा-
- तुम बेहद सुंदर हो, मैं चाहता हूँ की तुम मेरे साथ मुंबई चलो, मैं अपने मामा से कहकर तुम्हें एक्ट्रेस बनने की कोशिश करूँगा, हंगामा हो जाएगा... अच्छी- अच्छी एक्ट्रेस की छुट्टी कर डौगी तुम... तुम्हारी यह जवानी इतनी कातिल है की देखते ही दीवाना हो गया हूँ...ये तो शुक्र है की तुम अपनी ही दोस्त निकलीं वरना गज़ब हो जाता... जब तुम राजेश की मित्र हो तो मेरी भी मित्र हो...
राजेश- बिल्कुल सही है यार , तुम्हारा उअर क्या बँटा है... शैली को अपनी ही समझो...
शैली- मैं तो राजेश की गुलाम हूँ, राजेश अगर जान भी देने को कहे तो दे दूंगी... ज़रा भी टाइम ख़राब नहीं करुँगी...
रवि- अगर राजेश तुमसे मेरे साथ सोने को कहे तो इनकार तो नहीं करोगी ?
शैली- बिल्कुल नहीं करुँगी... ओह,, यह मुझे क्या हो रहा है ? क्या सवाल पूछ रहे हो तुम ? और मैं भी ये क्या जवाब दी जा रही हूँ , लगता है मुझे बहुत चढ़ गयी है....

Friday, May 15, 2009

तड़प, भाग-34

मैं अपनी तरफ़ से कोई कमी नहीं छोडूंगा.... तुम्हें स्वर्ग जैसा सुख देने की हर सम्भव कोशिश करता रहूँगा... पहले तुम हवेली पर आओ, रात भर भर वहीं ठहरो फ़िर देखना कमाल...
शैली- बहुत मुश्किल होता है घर से बाहर रात गुजारना... मुझे लगता है मम्मी -पापा को सब भनक लग चुकी है, इसी कारण मैं उनके सामने झिझकती रहती हूँ, मन में ग्लानी सी रहती है...
राजेश- ये सब तुम्हारा वहम है, ऐसा कुछ नहीं होता... दोस्ती और मोहब्बत की बात वो भी समझते हैं... वो भी जानते हैं की इश्क क्या होता है, अगर ऐसे ही छिछोरेपन की बात होती तो वे तुम्हें जरूर टोकते...
शैली- माँ वृद्ध होने को आयीं, बीमारी ने समय से पहले ही उन्हें बुढापे की तरफ़ धकेल दिया है... अब तो काम भी नही होता... मैं उनका हाथ नहीं बँटा सकती, इसका मलाल होता है...
राजेश- तुम्हें फ़िक्र करने की जरूरत नहीं है... हमारी हजारों एकड़ खेती किस दिन काम आएगी, तुम अपने पिताजी से कहना की की हमारी नहर के किनारे वाली १० बीघा भूमि को जोतने लगें, अच्छी फसल देती है, उसीसे तुम्हारे घर के सारे खर्चे निकलते रहेंगे...
शैली- इस बारे में उनसे क्या कहूँगी ? कोई भी इतनी जमीन ऐसे ही कैसे देने को राजी हो जाएगा ? यहाँ तक की लेने वाला भी हजार बार सोचेगा ... उनके मन में ग़लत ख़याल आ सकते हैं...
राजेश- ऐसी बात नहीं है, हमारे खानदान के बारे में हर कोई जानता है... सबको मालूम है की हम अपने शुभचिंतकों में ऐसे जमीन बाँटते रहते हैं...
शैली- तुम कह भी दो तो क्या होता है , जमीन तो तुम्हारे पिताजी के नाम होगी?
राजेश- नहीं, सारी जमीन अलग-अलग लोगों के नाम है, मेरी बात कोई नहीं गिराएगा, जो भी कह दिया वह पत्थर की लकीरहै...कोई उसे काटने वाला नहीं है...
शैली- ठीक है तो किसी दिन अच्छा सा मुहूर्त देखकर उसे पहले पिताजी के नाम लिखवा दीजिये वरना तुम्हारे खानदान के लोग बाद में झगडा करेंगे ...
राजेश- नहीं ऐसा कोई नहीं कर सकता , फ़िर भी अगर तुम्हारे मन में कोई संशय है तो कोई दिक्कत नहीं, सोमवार को तुम मेरे साथ चलना , तुम्हारे ही नाम लिखवा दूंगा... फ़िर तुम्हारा ये रोजाना का खर्चों का झंझट मिट जाएगा...
शैली- ठीक है, मैं पिताजी को समझा बुझाकर आती हूँ... लेकिन यह बात लीक नहीं होनी चाहिए...
राजेश- पागल हुई हो क्या ? इस तरह की बातें लीक करने के लिए होती हैं क्या ?
इसके बाद जब राजेश अपने शहरी दोस्त रवि को लेकर उसके घर से निकला तो शैली को कुछ खटका सा लगा... उसको रवि की नीयत कुछ अच्छी नहीं लग रही थी..., रवि का ध्यान शैली के उफनते हुए यौवन पर टिका हुआ था... जब वह साँस लेती तो उसके सीने के वक्ष ऊपर नीचे होने लगते थे और रवि की दिलचस्पी उसी में ज्यादा थी...


Thursday, May 14, 2009

तड़प,भाग-33

दीपू- ऐसा बोला उसने ? उस राजेश ने जो तुमसे प्यार का दावा करता था ?
शैली- हाँ यार, मैं तो सन्न रह गयी थी... मैं समझ नहीं पाई की इस बात का मतलब क्या है , दरअसल मैं ठहरी गाँव की सीधी सादी लड़की ... मुझे दुनिया के दांव पेच का ज्ञान नहीं था ... मैं मोहब्बत पर कुर्बान होने वाली दीवानी थी... जब किचन में थी तभी राजेश का शहरी दोस्त रवि वहां आ धमका ... उसने पीछे से मुझे अपनी बांहों में कसकर कैद कर लिया और मेरे hoth को choom लिया ... कुछ kshan के लिए तो मैं सोच भी नहीं पाई की मुझे क्या करना chaahiye , मैं अभी विचार कर ही रही थी की तभी राजेश वहाँ आ धमका .... वह मुस्कराते हुए बोला-
-आखिरकार रवि को अपना हक़ छीनकर ही लेना पडा न... अगर तुम राजी से इससे प्यार कर लेतीं तो क्या बिगड़ जाता ।, मेरे ख़याल से तुम्हें शर्म या झिझक हो रही होगी... शहरों में यह सब सामान्य बात है... वहाँ तो एक दूसरे की प्रेमिकाओं को भी बदल लिया जाता है, सेक्स करने के बाद फ़िर सब सामान्य हो जाता है... जब तक जवानी है तब तक इसका रस लेना चाहिए, बुढापे में कोई किसी को नहीं पूछता ... तुम और हम चाहकर भी कोई मजा ने अहं ले पायेंगे, अरे शरीर के अंग भी काम करना छोड़ देते हैं... इसलिए मौज मस्ती जहाँ मिले , वहाँ प्यार से स्वीकार करो, खूब आनंद लो...
शैली- मैं आपकी प्रेमिका हूँ , किसी दूसरे को छूना भी मेरे लिए पाप है...
राजेश- बात बिल्कुल सही है, मैं मानता हूँ... स्वीकार है मुझे लेकिन दूसरे के साथ, और यह रवि कोई दूसरा नहीं है , हमारा अपना है... मेरे जिगर का टुकडा है ये... जो मेरा है वो तुम्हारा भी तो हुआ न , यह क्यों नहीं समझतीं....
शैली- ठीक है, मैं तो मूर्ख हूँ,, कुछ नहीं जानती... तुम खुश रहो ... मैं भी खुश हो ही जाउंगी... अब तो किस ले लिय्या अब तो यहाँ से हटो... मैं नाश्ता कैसे तैयार karungi ?
राजेश- ठीक है , जल्दी से नाश्ता तैयार karlo , फ़िर तो हवेली में आ जाना , वहाँ रंगमहल में हम तुम्हारा इन्तजार करेंगे...तुम्हारे समान में आज हमने स्पेसल बकरा बनवाया है , वहां पर रवि मिलेगा , रवि की प्रेमिका मिलेगी और मैं -तुम रहेंगे... हो सके तो आज किसी काम का बहान करदो, आज की रात हम साथ गुजारना चाहते हैं... समझ गयी न मेरी जान ...
शैली- ये क्या कह रहे हो , तुम्हें ज़रा भी शर्म नहीं आती, अपने दोस्त के सामने ऐसी गन्दी बात करते हो...
राजेश- ये तो कुछ भी नहीं है , ये मेरा दोस्त तो मेरी आंखों के सामने अपनी प्रेमिका के साथ प्रणय क्रीडा भी करता है, वो भी खूब मजे ले लेकर साथ देती है ...
शैली- अच्छा, ये सिर्फ़ सामने ही करते हैं, तुम्हें आमंत्रित नहीं करते ?
राजेश- कह चुके हैं कई बार ... इनको कोई आपत्ति नहीं है... इसकी प्रेमका तो मुझे अपने ऊपर खीचकर कहती है कई तुम दोनों एक साथ मेरे न्बदन की अगन बुझाओ , लेकिन तुम्हारा टेस्ट मुझे कैसे मिलेगा ... तुमने बिस्तर पर मुझे जो आनंद दिया है मेरे लिए वाही काफी है, मैं किसी दूसरी लड़की में ज़रा भी दिलचस्पी नहीं रखता ... हाँ अगर तुम्हारी इच्छा हो तो मैं इनकार भी नहीं करूँगा...
शैली- नई नई लड़कियां तुम्हें ही आकर्षक लगती हैं मगर मुझे नए लड़कों का कोई शौक नहीं है... मैं तो तुहें ही बर्दाश्त नहीं कर पाती... तुम्हीं इतना सुख देते हो जितना की किसी शादीशुदा को भी नहीं मिलता होगा... जब मैं तुम्हें ही पूरी तरह से संतुष्ट नहीं कर पाती तो मेरी इच्छा कैसे होगी ...
राजेश- अभी तो तुम्हें कुछ सुख नहीं मिला , आगे देखो होता है क्या ?





Wednesday, May 13, 2009

तड़प, भाग-32

शैली- तुम्हारी बातों पर भरोसा करने को जी चाहता है वरना तो ऐसे मीठे- मीठे शब्द मर्द लोगों के सबसे बड़े हथियार होते हैं , हमारे गाँव का राजेश भी इसी तरह की प्यारी -प्यारी बातें किया करता था... जब उसने पहली बार मेरे जिस्म को हासिल किया तो मैं उसको पूजने की हद तक चाहने लगी थी, उसकी बेहद इज्जत करने लगी थी, वह ग़लत कहे या सही मैं उसकी हर बात को देव वाणी की तरह मानने लगी... एक रात वह मेरे घर आया , मेरे बूढे पिता की नजरों से भी यह बात छिप नहीं पायी थी, वे मेरे और राजेश के संबंधों के बारे में जानने लगे थे और शायद इसी कारण हमेशा सोच में डूबे रहते थे... जब राजेश घर आया तो पिता घर से बाहर निकल गए.... मेरी माँ सुबह से ही राजेश के खेतों में मजदूरी करने गयी हुई थी...राजेश अकेला नहीं था उसके साथ उसका एक शहर का दोस्त भी था... जब उसने मेरा परिचय karaayaa तो मैं बहुत खुश हुई ... मुझे लगा की राजेश अब सचमुच मुझे गहराई से चाहने लगा है, मैं अन्दर ही अन्दर खुश थी... राजेश का दोस्त रवि कहने लगा-
- यार राजेश तुमने प्रेमिका तो गज़ब की पाई है, अगर इसको शहर में लाया गया तो क़यामत हो जायेगी, इसको फ़िल्म स्टार बन्ने से कोई नहीं रोक सकता... यह तो धमाका है यार ... हमारी दोस्ती नहीं करवाएगा?
राजेश- ताना क्यों देता है, इसीलिए तो तुझे यहाँ लेकर आया हूँ, शैली , यह मेरा ख़ास दोस्त है... मैं और ये दोनों एक जिस्म दो जान हैं, हम एल दूसरे को अपनी सब बातें बताते हैं, मैंने तुम्हारे बारे में भी इसको सब कुछ बता दिया है... यह कहता है की तुम फ़िल्म स्टार बनने लायक हो, इसके साथ एक बार शहर चली जाओ, हो सकता है तुम्हारी किस्मत ही खुल जाए...
शैली- मेरी किस्मत तो आप हैं, और मुझे कुछ नहीं चाहिए ...
राजेश- ठीक है , ठीक है ,,,मगर कम से कम तुम मेरे दोस्त से हाथ तो मिला सकती हो....
शैली- मैं मिला चुकी हूँ... आपका ध्यान उस समय मेरी तरफ़ नहीं था...
रवि- तुम से अपना ध्यान कौन हटा सकता है, पटाखा हो तुम तो... हम इतनी दूर से तुम्हें देखने आए हैं, तुमसे मिलने आए हैं और तुम नखरे दिखा रही हो... मैंने सोचा था की तुम मोहब्बत से पेश आओगी मगर....?
राजेश- तू भी कमाल का इंसान है यार, अभी वक्त ही कितना हुआ है तुझे आए हुए , अभी ठीक से पहचान हुई है , साथ में उठेंगे बैठेंगे , दुःख सुख की बात करेंगे खाएँगे पियेंगे ऐश करेंगे ... सब ठीक हो जाएगा धीरे- धीरे... क्यों टेंशन लेते हो... अरे प्यार से बात करो , गिले शिकवे मत करो...
शैली- मैं आप लोगों के लिए नाश्ते का इंतजाम करती हूँ... अआप आराम से बैठिये,...
राजेश - मेरे यार रवि की बातों का बुरा मत माना ,, मेरे से छोटा है... इस लिहाज से तुमसे मजाक करने का इसका हक़ बनता है... इ९से इस हक़ से वंचित मत करो... मुह से बक-बक करता है लेकिन दिल का बड़ा साफ़ आदमी है... दोस्ती के लायक है ये... इससे दोस्ती करके कई लडकियां अपनी जिन्दगी बना चुकी हैं... इसका सगा मामा बहुत बड़ा फ़िल्म डायरेक्टर है , मुंबई में रहता है... यह कई लड़कियों की सिफारिश करके उनकी जिन्दगी खुश हाल बना चुका है, बहुत काम का आदमी है... जितना जमीन का ऊपर है उससे कई गुना जमीन के नीचे भी है...
रवि- चल छोड़ यार अगर ये हमसे दोस्ती नहीं करना चाहतीं तो जबरदस्ती करनी बेकार है...
राजेश-त०ऊ दिल छोटा कर रहा है क्या, मैं अभी शैली से कहता हूँ वह तुम्हें किस देकर अभी खुश कर देगी...

Tuesday, May 12, 2009

तड़प, भाग-31

शैली को अथाह सुख की अनुभूति होने लगी... यह ऐसा सुख था जिसके लिए शैली कई कई दिनों तक तरस जाती थी... इसका मतलब यह नहीं की उसको ग्राहकों का टोटाथा.... वह नंबर वन की कालगर्ल थी... हफ्ते भर पहले भी लोग उसको बुक करने को तैया रहते थे... ज्यादातर ग्राहक उसको अपने साथ दिल्ली कोकाता, केरला के अलावा अन्य देशों में भी ले जाते थे, वह किसीको निराश भी नहीं करती थी... कहीं वह किसीकी पत्नी की हूमिका निभाती थी तो कहीं पर प्रेमिका की... लोग उसे अपनेव्यवसाय के लिए भी इस्तेमाल करते थे... शैली को इस बात से कोई मतलब नहीं था... उसे बस अच्छी सेवा देने से मतलब था... अपनी तरफ़ से शैली को नाखुश नहीं करती थी.... वह अपने आप में एक मिसाल बन चुकी थी... कई बार तो इसा भी हुआ जब कोई ग्राहक उसके पास मोल भाव करने आया मग पर्याप्त पैसा नहीं लाया तो वह उसे भ खुश कर देती थी... बस ग्राहक पसंद आना चाहिए... उसके पास ज्यादातर वे ग्राहक आए हे जिन्हें अपनी पत्नी से मानसिक सुख शान्ति नसीब नहीं हो पाती ही... उनका मुख्या उद्देश्य मन की शान्ति होता था, तन की शान्ति नही... तन का सुख भी वे अपना ही वसूलते थे... जितनी देर अक चाहा शैली के जिस्म से खेलेऔर फ़िर निढाल होकर खर्राटे भरने लगे... उन्हें शैली की भावनाओं, इच्छाओं या आजुओं से कोई लेना देना नहीं होता था... शैली को भी किसी चीज की जरूरत है या नहीं, इससे उन लोगों को कोई मतलब ही नहीं होता था... अपने तरीके से उसका बदन लूटने के बाद वे चलते बनते थे...उसने लोगों को अक्सर यह कहते सुना था की दरिया के किनारे अह्ने वाले ही प्यासे अह जाते हैं।,,, उसे लगता जैसे यह कहावत किसीने उसी के लिए बनाई है, वह रात भर तदपि रहती थी और ग्राहक लोग अपना मजा लूटकर चलते बनते थे... इस लिहाज से शैली को काफी दिनों के बाद एक अच्छा साथी मिला था , वह अपने सुख के साथ-साथ शैली का भी ध्यान रखता था...उसको संतुष्ट करने के लिए विशेष प्रयास करता था...इससे शैली बेहद खुश थी, वह जानी थी की कालगर्ल से प्यार तो सब कर सकते हैं मगर सिर्फ़ कमरे के अन्दर... उन्हें अपनाने के लिए कोई तैयार नहीं होता... शैली यह सब विचार कर रही थी और दीपू उसके यौवन द्वार को ही सहलाने में लगा था... शैली को एस छेड़छाड़ अच्छी लगता थी, उसको विचारों में गुम देखकर दीपू ने पूछ ही लिया-
- आह, यह क्या ? मैं कितनी महत् कर रहा हूँ और आप हैं की ना जाने किस दुनिया में खोई हुई हैं ?
शैली- मन ही मन तारीफ़ कर रही थीतुम्हारी, जब सामने पर करती हूँ तो बच्चों की तरह शर्माने लगती , इसलिए...समझे ? तुमने क्या समझा , बुराई कर रही हूँ ?
दीपू- मैं भी तो जानूं की मेरे बारे में तुम्हारा मन क्या कहता है?
शैली- मेरा मन कहता है कीतुम इसके राजकुमार बन चुके हो, तुम सबसे अलग हो और अच्छे हो....
दीपू- अभी तुमने मेरे बारे में ऐसी राय क्यो बनाली ? पहले देखो, बरतो, समझो फ़िर कुछ कहना...
शैली- जितना देख समझ चुकी हूँ उतना ही काफी है, जीवन के पल मुट्ठी में रेत की अरह निकले जा आहे हैं, मैं हर पल को तुम्हारी नाम कर देना चाहती हूँ.....
दीपू- मैं भी अपनी जान से बढ़कर चाहने लगा हूँ ,

Sunday, May 10, 2009

तड़प, भाग-30

मैं अब समझा हूँ इस प्यार के एहसास को , इसकी गहराई को... अब से पहले मैंने इसे कभी इतनी गंभीरता से नहीं लिया था , मैं सोचता था की होता होगा ऐसे ही, फिल्मों की तरह होता होगा शायद... जैसे फिल्मों में दो ढाई घंटे में ही सब कुछ हो जाता है, वैसे ही होता होगा... मेरे ख़याल से , मेरे मन में मोहब्बत की कोई फिक्स तस्बीर ही नहीं थी...
शैली- और अब ? कैसा लगा अपनी मोहब्बत से मिलकर ? अब कोई तस्बीर बनी की नहीं ?
दीपू- अब तो सीधे दिल पर छाप चुकी हो, मुझे नहीं लगता की कभी यह सूरत मेरे मन से निकल पायेगी... शायद मरने के बाद भी कोई इसे नहीं हटा सकता...
शैली- इतने भावुक मत बनो दीपू, वरना फ़िर पछताना पड़ सकता है... जिन हसीं पलों से हम गुजर रहे हैं ये बेहद नाजुक होते हैं, इन अंतरण क्षणों में मर्द लोग कोई भी वादा कर डालते हैं, कोई भी कसम खा लेते हैं लेकिन जब उन वादों , इरादों को निभाने का समय आता है तो नानी याद आ जाती है, फ़िर उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है... फ़िर पश्चाताप करते फिरते हैं , महबूब को बेवफा कहने लगते हैं ...
दीपू- इस मामले में तो तुम मेरे विचारों से पहले से ही परिचित हो, तुम्हें पता है, मैं दोस्ती में त्याग की बात करता हूँ, गिला शिकवे मुझे पसंद नहीं ... मैं कभी अपने किए वादों को शर्मिंदा नहीं होने दूंगा...मुझे जितना लगाव अपने व्यक्तित्व से है उतना ही अपने वादों से भी है...
शैली- मुझे तुम जैसे लोग बहुत पसंद हैं लेकिन ऐसे मिलते कहाँ हैं ? आजकल तो सब व्यापार देखते हैं...
दीपू- सच कहती हो , यी बात तो है... व्यवहार पर बाजार इस कदर हावियो हो गया है की अब हर दूकानदार अपनी ग्राहकी बढ़ाने के लिए काउन्टर पर एक सुंदर लड़की जरूर बिठाता है...
शैली- मैंने भी इस बात को बड़ी शिद्दत से महसूस किया है , कुछ लोग तो अपनी महिला सेक्रेटरी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए रखते हैं... और तो और बड़े -बड़े नामचीन लोग अपने खर्चे से हमको अपने व्यापारिक फायदे के लिए दूसरे लोगों का बिस्तर गर्म करने के लिए भेजते हैं... ऐसा करके वे अपने अपने काम निकाल लेते हैं... अब उनमे और दलालों में क्या फर्क रह जाता है ? वे बड़े दलाल हैं इसलिए कोई उनसे कोई सवाल नहीं कर सकता ... उनके पास दौलत है इसलिए सबका मुह बंद रहता है...
दीपू- इससे आची तो तुम हो, कुछ छिपा तो नहीं रहीं , जो भी कर रही हो डंके की चोट पर ईमानदारी के साथ कर रही हो... मुझे ऐसे लोग अच्छे नहीं लगते जो अपने मुख पर कई मुखौटे चढाये रहते हैं...


तुमने यह गीत सुना ही होगा- क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी सूरत छिपी रहे, असली चेहरा सामने आए नकली सूरत छिपी रहे... यह गीत आजकल के माहोल पर बिल्कुल फिट बैठता है...
शैली- आज क्या सिर्फ़ बातों -बातों में ही वक्त बिताने का इरादा है ?
दीपू- ऐसी बात नहीं है, तुमसे ज्यादा तुम्हारी बातों में मजा आता है, तुम इतनी कामुक बात करती हो की मेरी नस-नस मदमस्त हो जाती है। भावनाएं भड़क उठती हैं और जी चाहता है, जी चाहता है की....
शैली- क्यों रुक क्यों गए ? बोलो न....
दीपू- रहने दो... फ़िर कभी kahunga... अब jubaan से नहीं , कुछ करना होगा...
इसके बाद दीपू ने शैली के yauvan द्वार पर हरकत karni शुरू kardee...

तड़प, भाग-29

जब जिस्म में ताकत होती है और जवान साथी पहलू में होता है तो जज्बात ख़ुद ही भड़कने लगते हैं...दीपू नया लड़का था, वह जिन्दगी में कुछ बनाना चाहता था , तरक्की करना चाहता था , नाम और दाम कमाना चाहता था यही कारण था की अभी तक उसने किसी लड़की से मोहब्बत नहीं की थी ... मोहब्बत के चक्कर में उलझ कर वह अपना समय बरबाद नहीं करना चाहता था...लेकिन जब शैली जैसा बम उससे लिपट ही गया तो फ़िर उसे अपना दामन बचाना भी भारी हो गया... उसे क्या पता था की इश्क वाकी इतना बुरा होता है, वह तो अब तक यही मानकर चल रहा था की जैसे आज कोई और कपड़ा पहनते हैं और कल कोई दूसरा कपड़ा पहन लेते हैं , इसी प्रकार प्रेमकी भी बदल देते होंगे ... उसे क्या पता था की यह प्यार तो इंसान को पागल बना देता है ... शैली से मिलते ही वह उसका

मुरीद बनकर रह गया था... दीपू को लगने लगा था की अब वह जिन्दा नहीं रह पायेगी, बिना शैली के अब उसको अपना जीवन निरर्थक लगने लगा था... यह कैसा परिवर्तन था , यह कौन सी शक्ति थी जो उसे उससे ही अलग करने पर तुली थी... वह शैली के बदन पर हाथ फिर रहा था, शैली आहें भर रही थी, काम वासना बढ़ाने वाले प्रसंग सुना रही थी, वह उसको ऐसे ऐसे संस्मरण सुनाती की दीपू का उत्साह कई गुना बढ़ जाया करता था , वह उस पर आक्रमण करने लगता , प्रहार और भी तेज करने लगता, शैली अपने पास कंडोम रखा करती थी और एक बार भी उसने सुरक्षा के सम्बन्ध नहीं बनाए थे... जब दीपू ज्यादा जोश में होता तो होश खोने जैसी बात करने लगता था ... कहने लगता-

-हटाओ इसे , इससे मजा नहीं आता... मैं बिना इसके ही ज्यादा आनंद का अनुभव करता हूँ...

शैली- अच्छा, भूल गए ऐड्स को, सारी शेखी राखी रह जायेगी... सारा आनंद ख़ाक में मिल जाएगा... इसका दुनिया में कहीं भी इलाज नहीं है, जानते हो इससे अच्छी तो मौत होती है... अगर किसीको यह बीमारी लग गयी तो पूरे वंश का नाश कर डालती है... इसलिए कभी भी असुरक्षित यौन सम्बन्ध नहीं बनाने चाहिए... क्या तुम्हें मालूम है की यह लाइलाज बीमारी है ?

दीपू- हाँ , पढा तो बहुत है , मगर साथ में यह भी पढा है की कंडोम बेचने वाली कम्पनियां बेवजह टूल पहुचाकर अपना प्रोडक्ट बेचना चाहती हैं,

शैली- एक बार को अगर इसे सच भी मान लिया जाए तो हर्ज भी क्या है , कौन सा लाख रुपये का खर्च आता है ? कहीं कहीं तो यह मुफ्त में भी मिल जाता है ?अगर जान है तो जहाँ है... लोग सोचते हैं की बुरी चीजें हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती, लेकिन यह विचार ग़लत है... हमको सावधान रहना चाहिए...एक पल का मजा मौत में बदल सकता है...

दीपू- तुमने तो मुझे भयभीत ही कर दिया , मेरा सारा नशा हिरन हो गया है...

शैली- मेरा , मकसद तुम्हें सचेत करना है, तुम मेरे सबसे प्यारे दोस्त है , अब तुम जहाँ भी रहोगे मैं तुम्हारी चिंता करती रहूंगी.... शायद प्यार इसीको कहते हैं...

दीपू- अब से मैं गर्व से कह सकता हूँ की इस शहर में मेरा अपना भी कोई है जो मेरी इतनी फ़िक्र करता है...मुझे चाहता है...