Monday, February 14, 2011

Bookmark and Share ईमेल प्रिंट





अपहरण कर बच्चों की हत्या

बिलासपुर। पत्नी के वियोग और अपने मासूम बच्चों की तड़प का बदला लेने रतनपुर में एक युवक ने अपने पड़ोसी के तीन बच्चों की हत्या कर दी। पुलिस ने आरोपी मनोज सूर्यवंशी को गिरफ्तार कर लिया है। इस घटना से लोगों में भारी आक्रोश है। रतनपुर दर्रीपारा के सिंघाड़ा व्यवसायी शिवदयाल धीवर के बच्चे अजय (9), साक्षी (7) और विजय (5) करैहापारा के स्वामी विवेकानंद प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे।

शुक्रवार की दोपहर 12 बजे छुट्टी के बाद तीनों स्कूल से घर के लिए निकले और रहस्यमय ढंग से गायब हो गए। शिवदयाल ने स्कूल में पूछताछ की। शाम तक पता नहीं चलने पर शिवदयाल ने रतनपुर थाने में सूचना दी। शनिवार को भी जब बच्चों का कुछ पता नहीं चला तो पुलिस ने गुम इंसान का मामला दर्ज किया। शिवदयाल ने पड़ोसी मनोज सूर्यवंशी पर अपहरण की आशंका जताई। पुलिस ने मनोज के घर दबिश दी तो वह नहीं मिला। कुछ लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई तो पता चला कि बच्चों को दोपहर में मनोज के साथ देखा गया था।

मोबाइल से मिली मदद

पुलिस ने मोबाइल नंबर के आधार पर ट्रेस कर आरोपी मनोज को ग्राम लखराम से उसके एक रिश्तेदार के यहां से रात में ही धर-दबोचा। मनोज ने तीनों बच्चों की हत्या करना स्वीकार लिया। पुलिस ने शनिवार देर रात बच्चों के शव घर से एक किमी दूर खेत से बरामद किए । आरोपी मनोज को धारा 302, 363, 366 के तहत गिरफ्तार कर कोटा थाने में पूछताछ की जा रही है। भयभीत पीडित परिवार शवों को लेकर गृहनगर जबलपुर रवाना हो गया है।

एएसपी (ग्रामीण) आरके साहू का कहना है कि आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है। घटना को लेकर जनाक्रोश है। आरोपी ने अपने बच्चों की तड़प का अहसास कराने इस जघन्य हत्याकांड को अंजाम दिया है। उसने थाने में अपनी पत्नी को शिवदयाल के भाई शिवनाथ द्वारा भगा ले जाने की सूचना दर्ज कराई थी। रतनपुर पुलिस पर लापरवाही का आरोप है तो इसकी जांच कराई जाएगी।

बुझ गया चिराग : जबलपुर के मूल निवासी शिवदयाल का यहां मछली और सिंघाडे का कारोबार है । उसकी दो पत्नियां थीं, जिनसे तीन संतानें हुई। इस घटना ने उनके घर का चिराग ही बुझा दिया।

बच्चे अनाथ

इस हत्याकांड का आरोपी मनोज अब पुलिस की गिरफ्त में है। इस घटना ने जहां धीवर परिवार के वंश का अंत कर दिया , वहीं आरोपी के बच्चे भी अनाथ हो गए। बच्चों की मां पहले ही उन्हें छोड़कर भाग चुकी है। अब उसके मासूम बच्चों को देखने वाला कोई नहीं है।

एक को पटका, दो का गला घोटा

दर्रीपारा के शिवदयाल और मनोज पड़ोसी हंैं। दोनों परिवारों का एक-दूसरे के घर आना जाना था। आरोपी मनोज के दो बच्चे हैं। 15-20 दिन पूर्व मनोज की पत्नी सुमरित बाई को शिवदयाल का भाई शिवनाथ भगाकर ले गया। इससे मनोज, धीवर परिवार से रंजिश रखता था। विवेकानंद स्कूल की दोपहर 12 बजे छुट्टी होने पर वह अजय, साक्षी और विजय को बहला फुसला कर खेत की ओर ले गया। उसने पहले अजय को उठाकर पत्थर पर पटक दिया। खून से लथपथ बड़े भाई को देखकर दोनों भाई- बहन चीखते भागने लगे, तब आरोपी ने दोनों बच्चों का गला घोंटकर उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया।


सेप्टिक टैंक में डूबनेसे बच्चे की मौत

रायगढ़. सेप्टिक टैंक में गिरने से एक मासूम की मौत हो गई। एकता नगर हीरापुर निवासी जान खान अपने घर से कुछ ही दूर पर एक और मकान बनवा रहा है। वहां पानी भरा सेप्टिक टैंक खुला पड़ा था। जान खान के किराएदार दरबार सिदार का पुत्र लोकेंद्र (5) अपने साथी मुकेश के साथ खेलते-खेलते सेप्टिक टैंक में गिर गया। परिजनों ने उसे जिला अस्पताल लाया, जहां चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिय

Sunday, February 13, 2011

बेवफा खंडहर - 51
ूरज-अब तक तो सिर्फ यहाँ का माहोल ही रहस्यमयी लगता था मगर अब तो मुझे तुम भी रहस्मयी लगने लगी हो. हो सकता है कि यह बात बुरी लगे लेकिन सच तो यही है.
किरण- बिलकुल, तुम्हारी बात अपनी जगह सही है, लेकिन मै सिर्फ एक बात कहना चाहूंगी , भरोसा करो तो ?
सूरज- कहके तो देखिये, हर बात मानूंगा . तुम्हारी कोई बात गिरा ही नहीं सकता .
किरण- मैं कभी भी तुम्हारे साथ गद्दारी नहीं कर सकती , हमेशा ही वफ़ा करूंगी . जीवन भर तुम्हारे साथ प्त्रेम करती रहूंगी .
सूरज- मुझे कैसे भरोसा हो , यह तो बताओ . मेरे दिल को तसल्ली तो दो.
किरण- और कितनी तसल्ली दिलाऊ. जिसकी चाहो मैं कसम उठाने के लिए तैयार हूँ. मैं कभी बेवफाई नहीं कर सकती , खुद मर जाउंगी , मिट जाउंगी लेकिन तुमसे किया हुआ अपना हर वादा निभाऊंगी
.मै अपनी जुबां कटवा सकती हूँ मगर जुबान फेर नहीं सकती, यह एक सच्ची प्रेमिका का वादा है. जिस तरह और जैसे भी चाहो मै तुम्हें यकीन दिलाने के लिए तैयार हूँ. मैंने सुना है कि जब लोग वादे
निभाते हैं, तो ऐसे ही निभा देते हैं और कभी-कभी कोर्ट स्टेम्प पर लिखा भी बेकार चला जाता है.
सूरज- हाँ, ये कहावत तो मैंने भी सुनी है. उम्मीद करता हूँ कि आप जों कह रही हैं, उस पर पूरी तरह से खरा उतरेंगी .
किरण- इससे पहले तुम्हें अपना वादा निभाना होगा, एक रात में सात बार सम्बन्ध बनाने का . ऐसा करके तुम हमेशा के लिए मेरी प्यास बुझा सकते हो. तुम्हारे सिवाय इस काम को कोई और नहीं कर सकता .
तुम ही साक्षात कामदेव हो. मैंने जिस्मफरोशी का काम किया है, उस सिलसिले में बहुत से लोगों से मिली हूँ, उनमे से तुम जैसा बहादुर कोई भी नहीं है .
सूरज- क्यों ? इसमें कौन सी बड़ी बात है ? अब तक हम दोनों तीन बार प्रणय क्रीडा तो कर ही चुके हैं. चार बार बाकी है.
किरण- हाँ, मेरे राजा , और इन चारों बार लगातार आनंद लेना है. बीच में ज्यादा गैप नहीं होनी चाहिए .
सूरज- मेरे लिए तुम्हारा यह वाक्य भी किसी रहस्य से कम नहीं है. ऐसा लगता है जैसे मै किसी भुतहा किले में कैद हो गया हूँ.
किरण- जानते हो, कभी-कभी सोची हुई बात भी सच निकल जाती है.
सूरज- तुम्हारे कहने का क्या मतलब है ? मै समझा नहीं. क्या तुम ये कहना चाहती हो कि हम दोंनो वास्तव में इस भुतहा महल में है. मतलब कि यह सच्चे का भुतहा महल है ?
किरण- बिलकुल हो सकता है . वैसे भूत से तुम क्या समझते हो ? क्या धारणा है तुम्हारे मन में भूत के प्रति /
सूरज- मुझसे ज्यादा तुम बेहतर जानती हो. हर विषय में तुम्हारा ही ज्ञान सर्वाधिक है.
किरण- तारीफ़ कर रहे हो, या व्यंग्य कास रहे हो ? खैर, सर्वाधिक तो नहीं मगर जैसा है , वैसा मै बता देती हूँ.
सूरज- ठीक है अब मेहरबानी करके भूत का मतलब बताइये .
किरण- एकदम सिंपल है, भूत माने बीता हुआ . यानि जों अब नहीं है. और इसके बिना संसार की कल्पना ही नहीं की जा सकती है.
सूरज- जैसे कि ?
किरण- जैसे कि जों वक्त कल था , वह आज नहीं है. जों आअज है वह कल नहीं रहेगा. और जब तक यह वक्त जाएगा नहीं तब तक नया कैसे आएगा . क्योंकि वक्त थमता नहीं है. निरंतर चलता रहता है.
घड़ी की सुइयां आगे -पीछे हो सकती हैं, मगर समय की रफ़्तार नहीं. इसलिए भूत तो हर कोई है और हर जगह पर है. फर्ज कीजिये कि आपने किसीसे प्रेम किया और आप बेवफा निकली या आपकी
चाहने वाली बेवफा निकली, तो आप जों उसकी याद में आहें भरेंगे , वह यादें भी तो भुतहा हुई न .
सूरज- भूतकाल और भुतहा में क्या सिर्फ इतना बारीक सा अंतर है ?
किरण- समझने -समझने का फेर है. आज तक क्या कोई कह सकता है कि उसने अपनी आँखों से जागते हुए और पूरे होशोहवास में भूत नामक चिड़िया को देखा है ? जबकि सच ये है
कि सब देखे हुए होते हैं. दस मिनिट पहले हमने जों खाना खाया , उसमे जों वक्त जाया हुआ वह हमारा भूतकाल ही तो था.
सूरज- तुम कहना चाहती हो कि इस आलीशान महल नुमा होटल को भी इसी तरीके से भुतहा कहा जा सकता है ?

Thursday, February 10, 2011

बेवफा खंडहर - 50
किरण- कोई दिशा तो मिले, दुनिया ने एक दस्तूर बना लिया है, मुझे बताओ कि अगर किसी की शादी होती है तो क्या वाह उसके साथ सुहागरात नहीं मनाएगा ?क्या वह जीवन भर सिर्फ प्यार
करके ही विवाह के रिश्ते तो कायम रख सकता है, किसी एक जोड़े का उदाहरण तो बताओ .
सूरज- हाँ, यह संभव नहीं दीखता .
किरण- फिर तुम किस पाक मोहब्बत की दुहाई देते हो ? समाज ने सिस्टम ही ऐसा बना दिया है.
सूरज- तो क्या यह भी सीमित दायरे में रहने का परिणाम है. ?सोचता हूँ कि यह न जाने कैसा रहस्य है. हम कौन सी दुनिया से आते हैं और न जाने कौन सी दुनिया में चले जाते हैं. सब कुछ सपना जैसा
लगता है. सुबह अगर आँख खुल जाए तो बेहतर वरना सोते ही रह जाते हैं. ये जीवन -मरण न जाने क्या है ?
किरण- इसके बारे में शाश्त्रों में भी बहुत कुछ लिखा गया है ,लेकिन सब कुछ अधूरा ही है.
सूरज- आपको इसके बारे में इतना कुछ कैसे पता है ? क्या तुम इस सब्जेक्ट में कुछ ज्यादा ही रूचि लेती हो ? क्या तुमने भी इससे जुडी किताबें पढ़ी हुई हैं ? महसूस तो होता है कि तुम्हे इस बारे में
बहुत कुछ ज्ञान है. मै डिस्कस करना चाहता हूँ , कुछ समझना चाहता हूँ. हांलाकि यह मेरा कभी भी विषय नहीं रहा है. मै तो फ़िल्मी गीत पढ़ने में मजा लेता रहा हूँ.
किरण- यह प्यार का मौसम है, प्यार करने से मन तो क्या रूह भी प्रफुल्लित हो जाती है , इसीलिए जीवन में जब कभी भी ऐसे पल नसीब हों ,उन्हें खोना नहीं चाहिए . यहाँ पर हम दोनों के सिवाय
कोई और नहीं है. क्यों न हम लोग इस प्यार के रस को लूट लें, फिर से एकाकार हो जाएँ. जब हम दोनों की महकती हुई साँसे आपस में टकराती हैं तो स्वर्ग जैसा आनंद मिलता है, ऐसी अनुभूति होती है
जैसे कि हम इस जहां के सबसे खुशनसीब हैं. ऐसा एहसास होता है जैसे हमने इस संसार को जीत लिया है.
सूरज- पहले कभी मैं इतना कामुक नहीं होता था. ऐसा नहीं है कि मै कोई साधू था या नामर्द था. उत्तेजना मुझे भी महसूस होती थी लेकिन मैंने किसी महिला के साथ कभी संसर्ग नहीं किया . मैंने कभी
भी इस नजर से किसीको देखा नहीं, शायद ऐसा इसलिए भी हुआ होगा क्योंकि मुझे ऐसा अवसर ही नहीं मिल पाया. मैंने कोशिश तो बहुत की थी.
किरण- शायद इसीलिए तुम अपनी कामशक्ति का अंदाजा नहीं लगा पाए. तुम बहुत कामुक हो, ताकतवर हो. जी चाहता है कि दिन रात तुम्हारी सेवा करूं, तुमसे लिपटी राहू, प्रेम करती रहूँ और तुम्हारे
बदन से लिपटकर ही फना हो जाऊं .
सूरज- मोहब्बत पर अक्सर लोग फना होने की बात क्यों करते हैं, ये बात मेरी समझ में कभी नहीं आई . मोहब्बत में जीने की बात की जानी चाहिए. आखिर तुमने ही तो कहा है कि जीवन प्यार करने के लिए
है , तुम्हारी इन होठों की पंखुड़ियों को चूमना बड़ा सुहाना लगता है. तुम्हारी जीभ का रस चखना बड़ा अच्छा लगता है. इतने कम समय में तुमने मुझे जों प्यार दिया है, उसे मै कभी नहीं भुला पाउँगा . मुझे तुम्हारी
हर बात मंजूर है, तुम जों भी कहोगी, तुम तो खैर मुझे राजा बनाकर अपने पास रखना चाहती हो मगर मैं गुलाम बनकर भी जीने के लिए राजी हूँ.
किरण- ऐसा न कहो मेरे राजा, तुम तो मेरे सरताज हो, बिन तुम्हारे मेरा क्या क्या है ? तुमने मुझे जों तृप्ति दी है, उस सुख का अनुमान तुम नहीं लगा सकते. यह सुख अमर है.
सूरज- मैंने कुछ खास नहीं किया. जों कुछ किया , वह तुम्हारी दें है, तुमने मेरे मन में प्यार के बीज अंकुरित किये थे, वे अल्प समय में ही पल्लवित और पुष्पित हो गए हैं. मैं उनकी सुगंध से सारे जहां को महका हुआ
महसूस कर रहा हूँ.
किरण- मैं इस प्यार को सहेजकर रखूंगी, कभी भी भुला नहीं पाउंगी . तुम मेरी नजर से देखोगी तो जान पोगी कि तुमने मुझ पर कितना उपकार किया है. अगर आज की रात ठीक सात बार तुम मुझे संतुष्ट कर सकते हो
तो मैं तुम्हें असली मर्द समझूंगी . क्या ऐसा कर पाओगे ?
सूरज- हाँ, हाँ क्यों नहीं ? तुममे हिम्मत होनी चाहिए , मै तो बड़ा पार कर दूंगा . सात बार छोडिये . आठ बार की गारंटी है. आठ बार तक मै प्रणय क्रीडा कर सकता हूँ.
किरण- तब तो मेरा उद्धार ही हो जाएगा. फिर मै कभी नहीं तरसुंगी . हमेशा -हमेशा के लिए तृप्त हो जाउंगी . मेरा यकीन मानो.
सूरज- एक रात में ही आखिर ऐसा क्या हो जाएगा ? एक रात में तो कोई भी तृप्त नहीं हो सकता.ये तुम क्या बोलती रहती हो ?
किरण- इस रहस्य को तुम नहीं समझ पाओगे , यह राज ही ऐसा होता है. जिसे किसीको बताया नहीं जा सकता . लेकिन एक न एक दिन तुम इसे जरूर जान जाओगे. यह मेरा पक्का वादा है.
सूरज-अब तक तो सिर्फ यहाँ का माहोल ही रहस्यमयी लगता था मगर अब तो मुझे तुम भी रहस्मयी लगने लगी हो. हो सकता है कि यह बात बुरी लगे लेकिन सच तो यही है.
किरण- बिलकुल, तुम्हारी बात अपनी जगह सही है, लेकिन मै सिर्फ एक बात कहना चाहूंगी , भरोसा करो तो ?
सूरज- कहके तो देखिये, हर बात मानूंगा . तुम्हारी कोई बात गिरा ही नहीं सकता .
किरण- मैं कभी भी तुम्हारे साथ गद्दारी नहीं कर सकती , हमेशा ही वफ़ा करूंगी . जीवन भर तुम्हारे साथ प्त्रेम करती रहूंगी .
सूरज- मुझे कैसे भरोसा हो , यह तो बताओ .

Wednesday, February 9, 2011

यह अडवांस मैटर है.

बेवफा खँडहर वाली , भाग-49
सूरज- क्या करूं, तुम समझ ही नहीं पाती .
किरण- मैं सिर्फ प्यार की भाषा समझती हूँ, इतना ही जानती हूँ कि तुम्हारे सिवाय मेरा अस्तित्व ही नहीं है.
सूरज- इस प्यार के रंग में तुमने मुझे भी रंग लिया है.
किरण- काश, ऐसा होता. तुम मेरे प्यार के रंग में रंग पाते.
सूरज- और कैसा रंग होता है ?
किरण- तुम मेरे साथ रहोगे , तो जीऊँगी, वरना मेरा जीना बेकार है.
सूरज- तुम मेरे लिए जान क्यों देती हो ? जीवन के सफर में ना जाने कितने लोग आते हैं, जाते हैं. उनमे से कुछ दिल को बहुत अच्छे लगते हैं. कुछ सबसे ज्यादा अच्छे लगते हैं. लेकिन इसका मतलब ये
तो नहीं कि सबके लिए अपनी जान कुर्बान कर दी जाये . यह जान बहुत महत्वपूर्ण होती है.
किरण- यह जान तो कबकी जा चुकी है सूरज, और ये क्या क्या कहते हो / तुम कोई औरों जैसे नहीं हो, तुम वो नहीं हो जों जीवन के सफर में ऐसे ही मिल जाए . तुम तो मेरे लिए खास हो , सबसे खास.
सूरज- मेरे जीवन में आई हुई तुम पहली और आख़िरी लड़की हो. मैंने तो किसी लड़की को स्पर्श भी नहीं किया है. आज जब तुम्हें स्पर्श किया तो मै धन्य हो गया हूँ. मैं कैसे रह सकता हूँ तुम्हारे बिना .
किरण- तुम सिर्फ शब्दों पर ध्यान देते हो. शब्दों पर प्रभाव है तुम्हारा. इनको कभी जमीं पर भी उतारा कीजिये .
सूरज- मै तो चाहता हूँ कि प्यार के बीच में शब्द आयें ही नहीं , मगर कर भी क्या सकता हूँ. तुम बात भी बहुत करते हो, आओ न मेरे सीने में बस जाओ और बस अब बोलना बंद कर दीजिए .
किरण मुस्करादी , मुस्कराने की उसकी अदा बहुत उम्दा थी. सूरज के सीने में हलचल सी होने लगी . वे दोनों एक बार फिर से नग्न हो चुके थे. काम वासना की आग ने उनको झुलसा दिया था .
सूरज की आँखें लाल हो उठी, अब आंखों से वासना के लाल -लाल डोरे तैरने लगे . किरण बोली-
- क्या इतनी जल्दी तुम फिर से सेक्स के लिए तैयार हो ?
सूरज - हाँ , ये काम तो मै दिन और रात भर भी कर सकता हूँ, इसके लिए तो मै उधार का खाता हूँ.
किरण- यही तो तुम्हारी खासियत है, ऐसा जवां मर्द आसानी से नहीं मिलता , जों भी तुम्हारे साथ शादी करेगी , वह बड़ी खुशनसीब होगी .
सूरज- मेरे मन में एक सवाल उठ रहा है, कहो तो अर्ज करूं, ?
किरण- बोलो न , तुम तो मेरे दिल के मालिक हो .
सूरज- सवाल कड़वा लग सकता है , मगर करूँगा जरूर.
किरण- मै बुरा नहीं मानूंगी . कहो न प्लीज, मन में जों भी है , बेहिचक कहो .
सूरज- मैं सोचता हूँ कि तुम सिर्फ शारीरिक संबंधों पर ही ज्यादा ध्यान दे रही हो ? एक तरफ तो तुम कहती हो जिस्म की कोई उपियोगिता नहीं है और दूसरी तरफ आपका ध्यान सिर्फ जिस्म पर ही है .
किरण- हाँ, ये बात तो सही है,.
सूरज- फिर इतना विरोधाभास क्यों है ?
किरण- पता नहीं, यह बात तो मेरी समझ में भी नहीं आती है, तुम्हें देखकर मै पगला जाती हूँ.
सूरज- और फिर अपने आदर्शों से भी गिर जाते हो , यही न .
किरण- हाँ, यार . बिलकुल . तुम ऐसे जवां मर्द हो जिसे देखकर मै अपने आपसे नियंत्रण खो बैठती बैठती हूँ.
सूरज- तो मै क्या समझूं ?
किरण- सिर्फ इतना कि मै तुमसे मोहब्बत करती हूँ ,बेपनाह मोहब्बत करती हूँ और तुम्हारे बिना जी नहीं पाउंगी .
बेवफा खँडहर वाली , भाग-48
सूरज- क्या करूं, तुम समझ ही नहीं पाती .
किरण- मैं सिर्फ प्यार की भाषा समझती हूँ, इतना ही जानती हूँ कि तुम्हारे सिवाय मेरा अस्तित्व ही नहीं है.
सूरज- इस प्यार के रंग में तुमने मुझे भी रंग लिया है.
किरण- काश, ऐसा होता. तुम मेरे प्यार के रंग में रंग पाते.
सूरज- और कैसा रंग होता है ?
किरण- तुम मेरे साथ रहोगे , तो जीऊँगी, वरना मेरा जीना बेकार है.
सूरज- तुम मेरे लिए जान क्यों देती हो ? जीवन के सफर में ना जाने कितने लोग आते हैं, जाते हैं. उनमे से कुछ दिल को बहुत अच्छे लगते हैं. कुछ सबसे ज्यादा अच्छे लगते हैं. लेकिन इसका मतलब ये
तो नहीं कि सबके लिए अपनी जान कुर्बान कर दी जाये . यह जान बहुत महत्वपूर्ण होती है.
किरण- यह जान तो कबकी जा चुकी है सूरज, और ये क्या क्या कहते हो / तुम कोई औरों जैसे नहीं हो, तुम वो नहीं हो जों जीवन के सफर में ऐसे ही मिल जाए . तुम तो मेरे लिए खास हो , सबसे खास.
सूरज- मेरे जीवन में आई हुई तुम पहली और आख़िरी लड़की हो. मैंने तो किसी लड़की को स्पर्श भी नहीं किया है. आज जब तुम्हें स्पर्श किया तो मै धन्य हो गया हूँ. मैं कैसे रह सकता हूँ तुम्हारे बिना .
किरण- तुम सिर्फ शब्दों पर ध्यान देते हो. शब्दों पर प्रभाव है तुम्हारा. इनको कभी जमीं पर भी उतारा कीजिये .
सूरज- मै तो चाहता हूँ कि प्यार के बीच में शब्द आयें ही नहीं , मगर कर भी क्या सकता हूँ. तुम बात भी बहुत करते हो, आओ न मेरे सीने में बस जाओ और बस अब बोलना बंद कर दीजिए .
किरण मुस्करादी , मुस्कराने की उसकी अदा बहुत उम्दा थी. सूरज के सीने में हलचल सी होने लगी . वे दोनों एक बार फिर से नग्न हो चुके थे. काम वासना की आग ने उनको झुलसा दिया था .
सूरज की आँखें लाल हो उठी, अब आंखों से वासना के लाल -लाल डोरे तैरने लगे . किरण बोली-
- क्या इतनी जल्दी तुम फिर से सेक्स के लिए तैयार हो ?
सूरज - हाँ , ये काम तो मै दिन और रात भर भी कर सकता हूँ, इसके लिए तो मै उधार का खाता हूँ.
किरण- यही तो तुम्हारी खासियत है, ऐसा जवां मर्द आसानी से नहीं मिलता , जों भी तुम्हारे साथ शादी करेगी , वह बड़ी खुशनसीब होगी .
सूरज- मेरे मन में एक सवाल उठ रहा है, कहो तो अर्ज करूं, ?
किरण- बोलो न , तुम तो मेरे दिल के मालिक हो .
सूरज- सवाल कड़वा लग सकता है , मगर करूँगा जरूर.
किरण- मै बुरा नहीं मानूंगी . कहो न प्लीज, मन में जों भी है , बेहिचक कहो .
सूरज- मैं सोचता हूँ कि तुम सिर्फ शारीरिक संबंधों पर ही ज्यादा ध्यान दे रही हो ? एक तरफ तो तुम कहती हो जिस्म की कोई उपियोगिता नहीं है और दूसरी तरफ आपका ध्यान सिर्फ जिस्म पर ही है .
किरण- हाँ, ये बात तो सही है,.
सूरज- फिर इतना विरोधाभास क्यों है ?
किरण- पता नहीं, यह बात तो मेरी समझ में भी नहीं आती है, तुम्हें देखकर मै पगला जाती हूँ.
सूरज- और फिर अपने आदर्शों से भी गिर जाते हो , यही न .
किरण- हाँ, यार . बिलकुल . तुम ऐसे जवां मर्द हो जिसे देखकर मै अपने आपसे नियंत्रण खो बैठती बैठती हूँ.
सूरज- तो मै क्या समझूं ?
किरण- सिर्फ इतना कि मै तुमसे मोहब्बत करती हूँ ,बेपनाह मोहब्बत करती हूँ और तुम्हारे बिना जी नहीं पाउंगी .

Tuesday, February 8, 2011

बेवफा खँडहर वाली , भाग-47
सूरज- सच तो ये है कि मेरा मन बड़ा घबरा रहा है.
किरण- मुझसे डर तो नहीं लग रहा
सूरज- जिससे प्यार करते हैं, उससे डर कैसा ?
किरण- तो अपने चाहने वालों को इस तरह ठोकर मारकर जाता है क्या ?
सूरज- तुम तो मेरी जान हो . मेरे दिल में जिगर में हो, मेरी साँसों में हो, हर धडकन में बसी हो.मैं तुम्हारा दिल भला कैसे दुखा सकता हूँ, तुम सोच भी कैसे सकती हो कि मै तुम्हारे दिल को दुखाऊंगा
, बस ये उम्मीद कर सकता हूँ कि तुम भी मेरी भावनाओं को समझने की कोशिश करोगी . अगर तुम मेरे तरीके से सोचने का प्रयत्न करो तो सारा मामला साफ़ हो जाएगा .
किरण- मै तुम्हें खोने से डरती हूँ, मै चाहती हूँ कि किसी तरह से तुम मेरे दिल के दर्द को समझ पाओ . मेरी बातों को समझ पाओ .
सूरज- अच्छा ठीक है, मै जरूर जानने की कोशिश करूँगा. बताओ तो सही .
किरण- मेरी जों भी संपत्ति है, उस सबके मैनेजर बन जाओ , मालिक बन जाओ . और अगर ऐसा करते हो तो तुम मेरे साथ रहोगे . मै तुम्हारे बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती .
सूरज- मुझे भी तुमसे कम लगाव नहीं है. मै भी यही चाहता हूँ , लेकिन जब मै घर जाना चाहता हूँ तो इसमें तुम्हें क्या ऐतराज हो रहा है .
किरण- मेरे कहने का अर्थ ये है कि मै एक पल के लिए भी दूर रहने से मुझे डर लगता है. इसकी जब मै कल्पना करती हूँ तभी मेरी रूह तक काँप जाती है. मै विचलित हो जाती है. और जब तुम प्रणय के इन पलों
को छोड़कर जाने की बात करते हो तब मेरा बहुत बुरा हाल हो जाता है.
सूरज- क्या और लोग ऐसा नहीं करते कि अपने चाहने वालों को छोड़कर कुछ समय के लिए जाते हैं. तुम इतना डर क्यों पाले हुए हो ?
किरण- मेरे इस डर को अपने दिमाग से निकाल दीजिए . किसी भी तरह से ऐसा करो.
सूरज- आओ, मेरे करीब आओ. आकर फिर से मेरे सीने में समा जाओ. मेरे साथ इश्क करो. मोहब्बत करो. यह प्यार ही है जों तुम्हारे -हमारे मन की दहशत को खत्म कर सकते हैं.
किरण- हाँ, यार बात बिलकुल सही है. बस यही बात ठीक है. मुझे प्यार के रंग में रंगलो .मुझे अपने आगोश में ले लों और दुनिया को मुझसे दूर करदो.
सूरज ने अब किरण को अपने आगोश में भर लिया था. वह उसके होठों से अपने होठों को सटाने लगा. किरण के जिस्म में फिर से आग सुलगने लगी. यह कामवासना की आग थी. सूरज अपने होठों के स्पर्श
से इस आग को जितना बुझाने का प्रयास करता, वह उतनी ही सुलगने लगती थी. किरण के सीने पर जों उभार थे, उनमे जोश आने लगा . वह कराहते हुए बोली-
- आह, इस बेकरारी को अब बढ़ने मत दो. मुझे अच्छी तरह से भींच लों.
सूरज- ज्यादा समय भी नहीं हो पाया है और हम लोग कितने करीब आ गए हैं.
किरण- हाँ, शायद हम जन्मो -जन्मो के प्रेमी हैं, बिछड़े हुए हैं , अब मिले हैं, और फिर से जुदा होने की जिद करते हैं, मै किसी भी कीमत पर ऐसा नहीं होने दूंगी .
सूरज- तुम तो मेरी जान हो , जैसा कहोगे , वैसा कहूँगा .
किरण- कभी हंसाते हो और कभी रुलाते हो. जब भी तुम्हारे दिल में कोई कीड़ा पैदा होता है तभी यहाँ से जाने की जिद करते हो.
सूरज- क्या करूं, तुम समझ ही नहीं पाती .
किरण- मैं सिर्फ प्यार की भाषा समझती हूँ, इतना ही जानती हूँ कि तुम्हारे सिवाय मेरा अस्तित्व ही नहीं है.
सूरज- इस प्यार के रंग में तुमने मुझे भी रंग लिया है.
किरण- काश, ऐसा होता. तुम मेरे प्यार के रंग में रंग पाते.
सूरज- और कैसा रंग होता है ?
किरण- तुम मेरे साथ रहोगे , तो जीऊँगी, वरना मेरा जीना बेकार है.
बेवफा खँडहर वाली , भाग-46
सूरज और किरण की हालत इस समय सांप और छछुंदर जैसी थी. वह न तो उसे निगल ही सकता था और ना उगल ही सकता था. वह उसके जी का जंजाल बन गयी थी. दिखने में वह हसीन थी .
कामुक थी , उसकी अदाएं बेहद दिलकश थीं, लेकिन जब उसे यह एहसास होता कि जिस कमरे में वे दोनों मौजूद हैं , वह कुछ अजीब तरह का है तो उसका हाल बेहाल हो जाया करता था . उसके
मन के संदेह को वह पढ़ भी लिया करती थी. यह बात उसके लिए और भी ज्यादा आश्चर्य जनक थी. हिम्मत करके सूरज ने एक बार कह भी दिया -
- अब तो खाना भी हो गया है, अगर आप अपनी गाड़ी भेज सकें तो मुझे गाँव तक भिजवा दीजिए . बाइक को मै बाद में ले जाउंगा .
किरण- गाड़ी भी आपकी है , मै भी आपकी हूँ, कोई गैर थोड़े ही हूँ. तुम मुझे अपना क्यों नहीं मान पा रहे हो ?
सूरज- अगर आपको अपना नहीं मानता तो भला यहाँ इस तरह क्यों नहीं होता ?
किरण- अगर तुम्हारा वश चलता तो यहाँ से भाग खड़े होते , मै गलत कह रही हूँ तो दिल पर हाथ रखकर कहदो .
सूरज- तो इसका मतलब ये हुआ कि आप मुझे यहाँ लेकर आई थीं . आया तो मै अपने मन से था, मदद मांगने आया था और इस वक्त भी सहायता की गुहार कर रहा हूँ.
किरण- भले ही अपने दिल से आये थे मगर मुझसे मिलने तो नहीं आये थे, वो तो तुम्हारी मर्दानगी पर मेरा ही मन आ गया .
सूरज- आपके साथ बिताए हर पल को मै जीवन भर भी नहीं भूल पाउँगा . आपका मै बेसब्री से इन्तजार करूँगा और जैसे ही मौक़ा मिला मिलने भी आउंगा .
किरण- क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मेरी इस छोटी सी दुनिया में ही तुम अपना आशियाना बनालो . यहाँ तुम्हें किसी तरह की कोई चिंता नहीं होगी. मै कोई कमी नहीं रहने दूंगी
सूरज- मुझे ऐतराज नहीं है. मगर घर तो जाना ही होअगा .
किरण- तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करते ? जहां तक घर की बात है , मैं इनकार थोड़े ही कर रही हूँ. सच बात तो ये है कि तुमने मुझे पागल जैसी बना दिया है. अब मै तुम्हारे बिना जीने की कल्पा भी नहीं
कर सकती. ऐसा लगता है जैसे तुमने मेरी ऊपर कोई जादू सा कर दिया है.
सूरज- जादूगर तो तुम हो.
किरण- अगर ऐसा होता तो तुम मेरे साथ ऐसा व्यवहार नहीं करते. मुझे ठुकराकर इस तरह नहीं जा सकते थी.
सूरज- अपने घर तो हर किसीको जाना ही होता है. ऐसा कौन होगा जों अपने घर ना जाकर एक जगह पर ही कैद होकर रह जाएगा . क्या यहाँ कोई मोबाइल नहीं है ?
किरण- तुम्हारे मोबाइल का क्या हुआ ?
सूरज- जैसे ही मेरी मोटर साइकिल टकराई , मोबाइल भी जेब से गिर गया था, वह सीधा पानी में जा गिरा, उसे निकालने का भी कोई अर्थ नहीं था. खराब हो गया होगा .
किरण- हाँ, सो तो है. दरअसल मोबाइल तो मेरे पास है , लेकिन किसी काम का नहीं है.
सूरज- क्यों ? ऐसी क्या तकलीफ है ?
किरण- यहाँ नेटवर्क नहीं है. अभी तक टावर नहीं लग पाए हैं.
सूरज- तो फोन से काम चल जाएगा . मेरा एक नंबर लगवादों . घर में लोग परेशां होते होंगे .
किरण- तुम्हारी तबियत तो ठीक है न , अरे बेमतलब रात में किसीको तकलीफ देते हो. तुम्हींने तो कहा था कि तुम्हारे घरवालों को मालूम है कि तुम लेट सेट होते रहते हो.
सूरज- सच तो ये है कि मेरा मन बड़ा घबरा रहा है.
किरण- मुझसे डर तो नहीं लग रहा
सूरज- जिससे प्यार करते हैं, उससे डर कैसा ?
किरण- तो अपने चाहने वालों को इस तरह ठोकर मारकर जाता है क्या ?
सूरज- तुम तो मेरी जान हो . मेरे दिल में जिगर में हो, मेरी साँसों में हो, हर धडकन में बसी हो.