बेवफा खँडहर वाली , भाग-45
सूरज- तुम्हें ठुकराने का साहस भला कौन कर सकता है ?
किरण- और किसकी कहूँ, तुम हो न . साक्षात मेरे सामने हो.
सूरज- मै तो लिपटा हुआ हूँ तुमसे. मैं कहाँ दूर हूँ.
किरण- इन्हीं नजदीकियों को तो हमेशा के लिए और भी करीब लाने की बात कर रही हूँ.
सूरज- पहले ये बताओ कि तुम्हें मेरे साथ प्रणय क्रीडा करके मजा आया कि नहीं ?
किरण- अच्छा, इसका मतलब ये हुआ कि अपने मुंह से तारीफ़ करने का इरादा है क्या ? चलो , फिर से किये देती हूँ. इतना मजा या कि शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता . साक्षात कामदेव भी अगर आता है
तो फेल हो जाएगा. मैं तो ठहरी पेशेवर औरत. मैंने बहुत कुओं का पानी पिया है. घाट -घाट का पानी पीने के बाद अच्छी तरह से जान गयी हूँ कि तुम सबसे कमाल हो. तुम्हारे जैसा दुनिया में कोई दूसरा नहीं है.
सूरज- बस अब रफ़्तार को रोक डालिए. मै फ्रेश होकर कुछ भोजन करना चाहता हूँ.
किरण- हाँ यार, मै तो भूल ही गयी कि आज हमारी याह सुहागरात है, फोर्मेलिटी पूरी करनी जरूरी है , इसलिए मैंने दूध का इंतजाम पहले ही कर लिया था . ये लीजिए .
सूरज- क्या अब वो कहानी नहीं सुनाओगी जिसके कारण आपको अपना यह सोने जैसा तन बेचने का काम करना पडा.
किरण- पहले दूध पीजिए , फ्रेश होते रहिये मैं बताती रहूंगी.
सूरन ने जैसे आदेश का पालन किया , वह तुरण बाथरूम चला गया. अपने आप फौवारे चलने ;आगे. हाथ में सिगरेट थामे किरण भी उसके पास ही आ गयी . वह बताने लगी .
- जों प्रिंस था , वह मेरे जिस्म का दीवाना हो गय था. वह मेरी खतीर किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार था। उसने गिरोह चलाने वाले लोगों से परमीशन भी ले ली थी। वे लोग मुझे उस शेख के साथ दुबई भेजने के लिए राजी भी हो गए । प्रिंस की उम्र तो ज्यादा थी मगर वह सेक्सी बहुत ज्यादा था। उसने मुझे पूरी रात परेशां किये रखा रखा । शाय द वह कामवासना की शक्ति बढानेवाली कोई दवा खाता था।उसने कहा -
-
Monday, February 7, 2011
Saturday, February 5, 2011
बेवफा खँडहर वाली , भाग-44
सूरज- देखो मै तुम्हारी हर बात मानूंगा बस यही नहीं मानूगा , मुझे मोहब्बत से मतलब है दौलत मेरी दुश्मन है.
किरण- नाराज क्यों होते हो , मेरे कहने का मतलब तो ये है कि जों कुछ मेरा है वही तुम्हारा भी है न.
सूरज- ये दौलत बड़ी कुत्ती चीज होती है , इंसान का जीना तक हराम कर देती है.
किरण- दौलत जीने का सहारा भी तो है, इसके बिना कुछ है भी नहीं,.
सूरज- मैं नहीं मानता, दौलत बहुत कुछ हो सकती है लेकिन सब कुछ तो हरगिज नहीं. दौलत से रोटी तो खरीद सकते हैं लेकिन भूख नहीं खरीदी जा सकती . यह मेरा कहना नहीं बुजुर्गो की हिदायते हैं
इसलिए मुझे आप दौलत के जाल में उलझाने की कोशिश न करें. मुझे आपसे लगाव हो सकता है, मोहब्बत हो सकती है , मै आपका आदर सम्मान कर सकता हूँ मगर दौलत मुझे अपनी तरफ आकर्षित
नहीं कर सकती, तुम यकीन मानो , हमारे गाँव में लोगो ने गलत रास्ते अपनाकर करोडों की जमीं जायदाद बना लिए हैं हैं , मैं भले ही इतना बड़ा इंसान नहीं हूँ , मगर इतना है कि मैं इज्जत की
कमाता -खाता हूँ. .
किरण- तुम्हारे गाँव में लोग कौन सा गलत रास्ता अपनाए हुए हैं ?
सूरज- हथियारों की अवैध फैक्ट्रियां हैं, उनमे लागत कम आती है और मुनाफ़ा ज्यादा होता है. ज्यादा मुनाफे के लिए लोग देश के दुशमनों को हथियार की सप्लाई कर रहे हैं. जों बन्दूक वे लोग बेचते हैं
उसकी गोलियाँ हमारे किसी अपने के सीने को ही चीरकर जाती होगी, ऐसे लोगों का अंजाम ये होगा कि किसी दिन इनके अपने को भी उन्हीं की गोलियों का शिकार होना पडेगा . तब ये समझेंगे कि मानवता
क्या होती है और दानवता कितनी भयंकर होती है .
किरण- छोडो भी ... इन बातोब को . बस गलत बातों से दूर रहो इतना ही काफी है. मैंने बन्दूक बेचकर नहीं बल्कि अपना जिस्म बेचकर यह संपत्ति कमाई है और इस पर मेरा अधिकार है. यह मेरी मेहनत
की कमाई है, इस कमाई को तुम गलत तरीके से कमाई हुई नहीं बोल सकते . मैं अपनी मेहनत की कमाई को समर्पित करना चाहती हूँ. जब कोई प्रेमी अपनी मेहनत की कमाई आपनी प्रेमिका को देता है
तब क्या वह इनकार कर देती है. ? क्या वह उसे स्वीकार नहीं करती ? जब मै खुद तुम्हें इस दौलत को समर्पित करना चाहती हूँ तो तुम ऐतराज क्यों उठाते हो ? क्यातुम समझते हो कि यह जमीं जायदाद
यह दौलत , तुम्हारे प्यार की दौलत से किसी भी तरह श्रेष्ठ है ? नहीं सूरज. तुम्हारा यह प्यार मेरे लिए अनमोल है. मै इसकी कद्र करती हूँ और अपनी तुच्छ दौलत को तुम्हें समर्पित करने के लिए आग्रह
करती हूँ. ज़रा कल्पना करिये कितना अच्छा होगा जब तुम मेरे बिजनेस को संभालोगे और घर बैठकर मै मजे से तुम्हारे आने का इन्तजार करूंगी . वे पल कितने खट्टे , कितने मीठे कितने मदमस्त होंगे . कितना
अच्छा होता जब मै व्यापार की टेंशन से मुक्त हो जाउंगी और तुम [प्यार की टेंशन से मुक्त हो जाओगे , फिर कभी तुम्हें किसी महिला को मोटर साइकिल पर लिफ्ट देने की जरूरत नहीं पड़ेगी . मै खुद तुमसे
चिपककर बैठा करूंगी . सचमुच वे पल बड़े ही यादगार होंगे.
सूरज- मेरे पास ऐसा क्या है जिसे तुम इतना पसंद करने लगी हो ?
किरण- तुम्हारे पास तो मोहब्बत की असीम दौलत है, तुम उसे महसूस नहीं कर पाओगे .
सूरज- लेकिन तुम्हारे पास तो हजारों तरह के लोग आते हैं, क्या उनमे से किसीके पास तुम्हें ऐसा हुनर नहीं आया ?
किरण- सच तो ये है कि ऐसे और भी लोग मुझसे मिले जों तुम्हारी तरह तो नहीं मगर हाँ, इससे कुछ मिलते -जुलते थे, लेकिन किसीने ने मुझे ठुकरा दिया तो किसीको मैंने ठुकरा दिया . और
अंत में मुझे यही तन्हाइयां नसीब हुईं.
सूरज- तुम्हें ठुकराने का साहस भला कौन कर सकता है ?
किरण- और किसकी कहूँ, तुम हो न . साक्षात मेरे सामने हो.
सूरज- मै तो लिपटा हुआ हूँ तुमसे. मैं कहाँ दूर हूँ.
किरण- इन्हीं नजदीकियों को तो हमेशा के लिए और भी करीब लाने की बात कर रही हूँ.
सूरज- पहले ये बताओ कि तुम्हें मेरे साथ प्रणय क्रीडा करके मजा आया कि नहीं ?
Friday, February 4, 2011
बेवफा खँडहर वाली , भाग-४३
वह किसी तरह से भाग जाए, पीछे मुड़कर भी नहीं देखे, उसने अपने मन में यह निश्चय भी कर लिया था कि किरण अगर उसके घर जाने के लिए मना करती है तब भी वह सुबह होते ही भाग जाएगा . अपनी बाइक को
भी वहीं छोड़ देगा , फिर जों हो सो हो. और होगा भी क्या ? वह दौडकर सड़क पर जाएगा , वहाँ से किसी भी वाहन में बैठ सकता है, मजबूरी बताने पर कौन होगा जों उसकी मदद नहीं करेगा. रही बात बाइक की तो उसका
भी बीमा कराया हुआ था, पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करा देगा , बेंक की किश्त बीमा वाले भर देंगे, मगर इस सबकी नौबत ही नहीं आई. किरण ने खुद ही उसे सुबह घर जाने की इजाजत दे दी थी, मगर किरण का यह
वाजी उसे परेशां किये हुए था कि इस रात की कभी सुबह नहीं होती. क्यों नहीं होती ? वह बुदबुदा भी रहा था और किरण के साथ प्रणय सम्बन्ध भी बना रहा था, उसके प्रहार तेज हो चले थे, वासना की आंधी अब और भी तेज चलने
लगी थी. कामवासना का तूफ़ान उन दोनों को अपनी आगोश में लपेटे हुए था. एक क्षण ऐसा भी आया जब शब्द मौन हो गए और वे दोनों एक दूसरे में समा गए. यह प्यार का मौसम था. ये पल बेहद रंगीन , बेहद खुशनुमा और
कभी न भूलने वाले थे, किरण ने सूरज को इतनी जोर से कसकर पकड़ रखा था जैसे कि उसे यह डर कि सूरज किसी भी क्षण उससे दूर चला जाएगा . सूरज भी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहा था. वह जान गया था किरण
कि कमजोरी को, उसकी समझ में यह बात आ चुकी थी कि किरण सेक्सी युवती है, उसकी प्यास को हर कोई नहीं बुझा सकता. वह खुद स्वीकार कर चुकी थी कि बड़े- बड़े धुरंधर दिखने वाले और अपने आपको तीसमारखां
बताने वाले लोग भी उसको बिस्तर पर ऐसी सुख संतुष्टि नहीं दे पाए थे जिसकी उसे दरकार थी, वह उसको कामदेव जैसा मान रही थी इसका मतलब साफ़ अहि कि वह उसकी ताकत की आगे नतमस्तक हो चुकी थी. वह
सोच ही रहा था कि किरण के मुझ से आवाज निकली-
- बस, अब और नहीं. अब छोड़ भी दो, तुमने तो मेरा तूफ़ान मेल ही बनाकर रख दिया. सचमुच तुम बहुत शक्तिमान हो, क्या परफेक्स खाते हो क्या ? तभी इतना जोश हो सकता है .
सूरज- मुझे भी तुमने बहुत खुशी दी है, मै आभारी हूँ आपका.
किरण- तुम बहुत सीधे और सच्चे हो, तुम्हारे जैसे लोग जमाने में बहुत कम मिलते हैं, मेरी किस्मत से जब तुम मिल ही गए हो तो आसानी से तुम्हें छोड़ने वाली नहीं हूँ, तुम जहाँ -जहाँ चलोगे मेरा साया साथ होगा .
सूरज तुम जैसी हसीना को भी कौन कमबख्त छोड़ना चाहेगा. अब तो मैं जब भी यहाँ से गुजरा करूँगा, तुमसे मुलाक़ात जरूर किया करूँगा .
किरण- क्या गज़ब ढाते हो, इधर से निकलोगे तभी मिलोगे क्या ? मुझसे मिलने के लिए स्पेशल नहीं आओगे ?
सूराज- जरूर आऊंगा, जब भी दिल से याद करोगी , चला आऊंगा .
किरण- सच कहूँ तो अब तुम्हें छोड़ने को ही जी नहीं चाहता . जब जाओगे तब न आने की टेंशन होगी, ऐसा क्यूँ नहीं करते ...
सूरज- कैसा ? बोलिए न रुक क्यों गयी ?
किरण- तुम यहीं पर क्यूँ नहीं रह लेते ? यहाँ तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी . तुम्हारी नौकरी की टेंशन भी दूर हो जायेगी, मै तुम्हें इस होटल पर बड़े पद पर रख दूंगी, कैसा रहेगा ? और हाँ, तुम्हारी वो समस्या भी हल हो जायेगी .
सूरज- और कौन सी समस्या की बात कर रही हो ?
किरण- वही, जों तुम लड़कियों से सटकर बैठना चाहते हो. तुम्हारी आदत है न लड़कियों को बाइक पर लिफ्ट देने की, फिर इसके लिए तुम्हें कहीं देर -सवेर जाने की जरूरत नहीं होगी . मैं हूँ न, जब जी चाहा , मुझे बाइक पर
बिठाकर घुमा लाये , मै तो वैसे भी तुम्हारी से बिलकुल चिपककर बैठने वाली हूँ.
सूरज- तुम भी है न कमाल करती हो . मजाक भी उड़ा लेती हो और सामने वाले को एहसास भी नहीं होने देती.
किरण -अच्छा ये तो बताओ क तुम्हारे साथ मजाक मस्ती नहीं करूंगी तो किसके साथ करूंगी , अब तो मेरा अगर कोई इस दुनिया में है तो वो तुम हो. मै तुम्हारी हूँ, ये होटल तुम्हारा हो, करोड़ों-अरबों की मेरी जों संपत्ति
है वो सब भी तुम्हारी ही है.
सूरज- देखो मै तुम्हारी हर बात मानूंगा बस यही नहीं मानूगा , मुझे मोहब्बत से मतलब है दौलत मेरी दुश्मन है.
किरण- नाराज क्यों होते हो , मेरे कहने का मतलब तो ये है कि जों कुछ मेरा है वही तुम्हारा भी है न.
सूरज- ये दौलत बड़ी कुत्ती चीज होती है , इंसान का जीना तक हराम कर देती है.
किरण- दौलत जीने का सहारा भी तो है, इसके बिना कुछ है भी नहीं,.
सूरज- मैं नहीं मानता, दौलत बहुत कुछ हो सकती है लेकिन सब कुछ तो हरगिज नहीं.
वह किसी तरह से भाग जाए, पीछे मुड़कर भी नहीं देखे, उसने अपने मन में यह निश्चय भी कर लिया था कि किरण अगर उसके घर जाने के लिए मना करती है तब भी वह सुबह होते ही भाग जाएगा . अपनी बाइक को
भी वहीं छोड़ देगा , फिर जों हो सो हो. और होगा भी क्या ? वह दौडकर सड़क पर जाएगा , वहाँ से किसी भी वाहन में बैठ सकता है, मजबूरी बताने पर कौन होगा जों उसकी मदद नहीं करेगा. रही बात बाइक की तो उसका
भी बीमा कराया हुआ था, पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करा देगा , बेंक की किश्त बीमा वाले भर देंगे, मगर इस सबकी नौबत ही नहीं आई. किरण ने खुद ही उसे सुबह घर जाने की इजाजत दे दी थी, मगर किरण का यह
वाजी उसे परेशां किये हुए था कि इस रात की कभी सुबह नहीं होती. क्यों नहीं होती ? वह बुदबुदा भी रहा था और किरण के साथ प्रणय सम्बन्ध भी बना रहा था, उसके प्रहार तेज हो चले थे, वासना की आंधी अब और भी तेज चलने
लगी थी. कामवासना का तूफ़ान उन दोनों को अपनी आगोश में लपेटे हुए था. एक क्षण ऐसा भी आया जब शब्द मौन हो गए और वे दोनों एक दूसरे में समा गए. यह प्यार का मौसम था. ये पल बेहद रंगीन , बेहद खुशनुमा और
कभी न भूलने वाले थे, किरण ने सूरज को इतनी जोर से कसकर पकड़ रखा था जैसे कि उसे यह डर कि सूरज किसी भी क्षण उससे दूर चला जाएगा . सूरज भी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहा था. वह जान गया था किरण
कि कमजोरी को, उसकी समझ में यह बात आ चुकी थी कि किरण सेक्सी युवती है, उसकी प्यास को हर कोई नहीं बुझा सकता. वह खुद स्वीकार कर चुकी थी कि बड़े- बड़े धुरंधर दिखने वाले और अपने आपको तीसमारखां
बताने वाले लोग भी उसको बिस्तर पर ऐसी सुख संतुष्टि नहीं दे पाए थे जिसकी उसे दरकार थी, वह उसको कामदेव जैसा मान रही थी इसका मतलब साफ़ अहि कि वह उसकी ताकत की आगे नतमस्तक हो चुकी थी. वह
सोच ही रहा था कि किरण के मुझ से आवाज निकली-
- बस, अब और नहीं. अब छोड़ भी दो, तुमने तो मेरा तूफ़ान मेल ही बनाकर रख दिया. सचमुच तुम बहुत शक्तिमान हो, क्या परफेक्स खाते हो क्या ? तभी इतना जोश हो सकता है .
सूरज- मुझे भी तुमने बहुत खुशी दी है, मै आभारी हूँ आपका.
किरण- तुम बहुत सीधे और सच्चे हो, तुम्हारे जैसे लोग जमाने में बहुत कम मिलते हैं, मेरी किस्मत से जब तुम मिल ही गए हो तो आसानी से तुम्हें छोड़ने वाली नहीं हूँ, तुम जहाँ -जहाँ चलोगे मेरा साया साथ होगा .
सूरज तुम जैसी हसीना को भी कौन कमबख्त छोड़ना चाहेगा. अब तो मैं जब भी यहाँ से गुजरा करूँगा, तुमसे मुलाक़ात जरूर किया करूँगा .
किरण- क्या गज़ब ढाते हो, इधर से निकलोगे तभी मिलोगे क्या ? मुझसे मिलने के लिए स्पेशल नहीं आओगे ?
सूराज- जरूर आऊंगा, जब भी दिल से याद करोगी , चला आऊंगा .
किरण- सच कहूँ तो अब तुम्हें छोड़ने को ही जी नहीं चाहता . जब जाओगे तब न आने की टेंशन होगी, ऐसा क्यूँ नहीं करते ...
सूरज- कैसा ? बोलिए न रुक क्यों गयी ?
किरण- तुम यहीं पर क्यूँ नहीं रह लेते ? यहाँ तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी . तुम्हारी नौकरी की टेंशन भी दूर हो जायेगी, मै तुम्हें इस होटल पर बड़े पद पर रख दूंगी, कैसा रहेगा ? और हाँ, तुम्हारी वो समस्या भी हल हो जायेगी .
सूरज- और कौन सी समस्या की बात कर रही हो ?
किरण- वही, जों तुम लड़कियों से सटकर बैठना चाहते हो. तुम्हारी आदत है न लड़कियों को बाइक पर लिफ्ट देने की, फिर इसके लिए तुम्हें कहीं देर -सवेर जाने की जरूरत नहीं होगी . मैं हूँ न, जब जी चाहा , मुझे बाइक पर
बिठाकर घुमा लाये , मै तो वैसे भी तुम्हारी से बिलकुल चिपककर बैठने वाली हूँ.
सूरज- तुम भी है न कमाल करती हो . मजाक भी उड़ा लेती हो और सामने वाले को एहसास भी नहीं होने देती.
किरण -अच्छा ये तो बताओ क तुम्हारे साथ मजाक मस्ती नहीं करूंगी तो किसके साथ करूंगी , अब तो मेरा अगर कोई इस दुनिया में है तो वो तुम हो. मै तुम्हारी हूँ, ये होटल तुम्हारा हो, करोड़ों-अरबों की मेरी जों संपत्ति
है वो सब भी तुम्हारी ही है.
सूरज- देखो मै तुम्हारी हर बात मानूंगा बस यही नहीं मानूगा , मुझे मोहब्बत से मतलब है दौलत मेरी दुश्मन है.
किरण- नाराज क्यों होते हो , मेरे कहने का मतलब तो ये है कि जों कुछ मेरा है वही तुम्हारा भी है न.
सूरज- ये दौलत बड़ी कुत्ती चीज होती है , इंसान का जीना तक हराम कर देती है.
किरण- दौलत जीने का सहारा भी तो है, इसके बिना कुछ है भी नहीं,.
सूरज- मैं नहीं मानता, दौलत बहुत कुछ हो सकती है लेकिन सब कुछ तो हरगिज नहीं.
Thursday, February 3, 2011
बेवफा खंडहर वाली , भाग-42
किरण- जी नहीं, बिलकुल नहीं. मैन तुमसे मजा तो ले सकती हूँ मगर तुम्हारा मजाक नहीं उड़ा सकती.
सूरज- यह भी क्या अजब बात बताई है आपने . जानती भी हीब सब कुछ हैं और छिपाती भी सब कुछ हैं.
किरण- अपने मन से वहम निकाल्दो मेरी जान . इससे चिंता बढ़ती है.
सूरज- क्या आसपास कोई गैरेज नहीं है ?
किरण- इतनी रात गए गैरेज की ख्वाहिश , कोई बात तो जरूर है. किस्से मिलने की इच्छा है इतनी रात ?
सूरज- अरे बाबा, मै अभी की नहीं सुबह की बात कर रहां हूँ. सुबह सवेरे ही मुझे गाड़ी ठीक करानीहै, सुबह जल्दी निकलना होगा. थोड़ी देर के लिए ही सही , मगर एक बार के लिए मुझे घर जाना होगा , बहुत
सारे काम बाकी रह गए हैं, मेरे बिना उन्हें कोई और नहीं कर सकता, इसलिए गैरेज पूछ रहा हूँ.
किरण- अच्छा सुबह की बात कर रहे हो, लेकिन सुबह होने तो दो , हो सकता है कि इस रात की कोई सुबह ही न हो. एक फिल्म भी आयी थी इस नाम की. 'इस रात की कोई सुबह नहीं ' .
सूरज- क्या ? क्या कहा आपने ? इस रात की कोई सुबह नहीं . प्रकृति से कभी कोई लड़ पाया है क्या ? अगर लड़ भी गया तो जीत भी सका है क्या. कुदरत ने दिन के बाद रात, रात के बाद दिन, अँधेरे के
बाद उजाला, गम के बा खुशी इस तरह के नियम बनाये हैं और अपना बनाया नियम भला कोई कैसे तोड़ सकता है .
किरण- मेरे रहते तुम्हें फ़िक्र करने की कोई जरूरत नहीं है, पूरा गैरेज ही उठकर तुम्हारे पास चला आएगा . यहाँ तक कि तुम्हें एक दूसरे नई गाडी दिलादी जायेगी .तुम डरते बहुत ज्यादा हो.
सूरज- तुम जोर का झटका धीरे से जों देती हो. अचानक ऐसा पंच मारती हो कि पता भी नहीं चल पाता.
किरण- हा हा हा ... अब ये न कहना कि मैं भी तुमको रहस्मयी दिखाई देती हूँ.
सूरज- सच तो यही है मगर ये बात मै अपनी जुबान से कह नहीं सकता, थरथरा जायेगीजुबान. क्योंकि तुमसे प्यार ही इतना ज्यादा हो गया है कि अब जुदाई का डर भी सताने लगा है. तुम्हारे नाराज होने की
चिंता भी सताने लगी है , सोचता हूँ कि मेरी किसी बात या व्यवहार से अगर तुम नाराज हो गयी तो मै कैसे ज़िंदा रहूंगा .
किरण- ये कैसी मोहब्बर है सूरज, एक तरफ बेंतिहाँ प्यार है तो दूसरे तरफ संदेह भी भी है. दोनों साथ -साथ कैसे चल सकते हैं. ?
सूरज- पाता नहीं, मैंने तो पहली बार किसीसे मोहब्बत की है, पहली बार किसीके साथ प्रणय सम्बन्ध बनाये हैं, मै नहीं जानता दीवानगी किसे कहते हैं,मै नहीं जानता कि मै जों कर रहा हूँ वह गलत है या सही है ,
या फिर जों कह रहा हूँ वह गलत या सही क्या है ?
किरण- अब रहने भी दो, जाने भी दो. जों हुआ सो हुआ . अब चुप रहिये क्योंकि सचमुच तुम्हें नहीं मालूम कि तुम क्या कह रहे हो. मैं ऐसा करती हूँ कि तुमको सुबह गैरेज तक पहुंचा देती हूँ, और यह काम पहली
फुर्सत में ही करूंगी, इसके बाद आप ऐसा करना कि आराम से अपने घर चले जाना , जरूरी काम निबटाना और उसके बाद मुझसे मिलने आना , ठीक है ?
सूरज- हाँ, ठीक है. ये ठीक रहेगा. मेरा भी यही विचार था.
किरण - मै अपने महबूब के दिल को पढ़ना अच्छी तरह से जान गयी हूँ. अब दिल -दिमाग कुछ हल्का हुआ ?
सूरज- अब कोई चिंता नहीं है. अब मेरे मन में से गर्दिश के बादल छंट चुके हैं.
सूरज ने सचमुच राहत की सांस ली थी, वह दिल में इस बात को लेकर घबराया हुआ था कि किरण पता नहीं उसे घर जाने की इजाजत देगी भी कि नहीं. कभी-कभी उसकी इच्छा होती कि अपनी समूची शक्ति को समेटकर
वह किसी तरह से भाग जाए, पीछे मुड़कर भी नहीं देखे, उसने अपने मन में यह निश्चय भी कर लिया था कि किरण अगर उसके घर जाने के लिए मना करती है तब भी वह सुबह होते ही भाग जाएगा . अपनी बाइक को
भी वहीं छोड़ देगा , फिर जों हो सो हो. और होगा भी क्या ? वह दौडकर सड़क पर जाएगा , वहाँ से किसी भी वाहन में बैठ सकता है, मजबूरी बताने पर कौन होगा जों उसकी मदद नहीं करेगा. रही बात बाइक की तो उसका
भी बीमा कराया हुआ था, पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करा देगा , बेंक की किश्त बीमा वाले भर देंगे, मगर इस सबकी नौबत ही नहीं आई. किरण ने खुद ही उसे सुबह घर जाने की इजाजत दे दी थी, मगर किरण का यह
वाजी उसे परेशां किये हुए था कि इस रात की कभी सुबह नहीं होती. क्यों नहीं होती ? वह बुदबुदा भी रहा था और किरण के साथ प्रणय सम्बन्ध भी बना रहा था, उसके प्रहार तेज हो चले थे, वासना की आंधी अब और भी तेज चलने
लगी थी. कामवासना का तूफ़ान उन दोनों को अपनी आगोश में लपेटे हुए था. एक क्षण ऐसा भी आया जब शब्द मौन हो गए और वे दोनों एक दूसरे में समा गए.
किरण- जी नहीं, बिलकुल नहीं. मैन तुमसे मजा तो ले सकती हूँ मगर तुम्हारा मजाक नहीं उड़ा सकती.
सूरज- यह भी क्या अजब बात बताई है आपने . जानती भी हीब सब कुछ हैं और छिपाती भी सब कुछ हैं.
किरण- अपने मन से वहम निकाल्दो मेरी जान . इससे चिंता बढ़ती है.
सूरज- क्या आसपास कोई गैरेज नहीं है ?
किरण- इतनी रात गए गैरेज की ख्वाहिश , कोई बात तो जरूर है. किस्से मिलने की इच्छा है इतनी रात ?
सूरज- अरे बाबा, मै अभी की नहीं सुबह की बात कर रहां हूँ. सुबह सवेरे ही मुझे गाड़ी ठीक करानीहै, सुबह जल्दी निकलना होगा. थोड़ी देर के लिए ही सही , मगर एक बार के लिए मुझे घर जाना होगा , बहुत
सारे काम बाकी रह गए हैं, मेरे बिना उन्हें कोई और नहीं कर सकता, इसलिए गैरेज पूछ रहा हूँ.
किरण- अच्छा सुबह की बात कर रहे हो, लेकिन सुबह होने तो दो , हो सकता है कि इस रात की कोई सुबह ही न हो. एक फिल्म भी आयी थी इस नाम की. 'इस रात की कोई सुबह नहीं ' .
सूरज- क्या ? क्या कहा आपने ? इस रात की कोई सुबह नहीं . प्रकृति से कभी कोई लड़ पाया है क्या ? अगर लड़ भी गया तो जीत भी सका है क्या. कुदरत ने दिन के बाद रात, रात के बाद दिन, अँधेरे के
बाद उजाला, गम के बा खुशी इस तरह के नियम बनाये हैं और अपना बनाया नियम भला कोई कैसे तोड़ सकता है .
किरण- मेरे रहते तुम्हें फ़िक्र करने की कोई जरूरत नहीं है, पूरा गैरेज ही उठकर तुम्हारे पास चला आएगा . यहाँ तक कि तुम्हें एक दूसरे नई गाडी दिलादी जायेगी .तुम डरते बहुत ज्यादा हो.
सूरज- तुम जोर का झटका धीरे से जों देती हो. अचानक ऐसा पंच मारती हो कि पता भी नहीं चल पाता.
किरण- हा हा हा ... अब ये न कहना कि मैं भी तुमको रहस्मयी दिखाई देती हूँ.
सूरज- सच तो यही है मगर ये बात मै अपनी जुबान से कह नहीं सकता, थरथरा जायेगीजुबान. क्योंकि तुमसे प्यार ही इतना ज्यादा हो गया है कि अब जुदाई का डर भी सताने लगा है. तुम्हारे नाराज होने की
चिंता भी सताने लगी है , सोचता हूँ कि मेरी किसी बात या व्यवहार से अगर तुम नाराज हो गयी तो मै कैसे ज़िंदा रहूंगा .
किरण- ये कैसी मोहब्बर है सूरज, एक तरफ बेंतिहाँ प्यार है तो दूसरे तरफ संदेह भी भी है. दोनों साथ -साथ कैसे चल सकते हैं. ?
सूरज- पाता नहीं, मैंने तो पहली बार किसीसे मोहब्बत की है, पहली बार किसीके साथ प्रणय सम्बन्ध बनाये हैं, मै नहीं जानता दीवानगी किसे कहते हैं,मै नहीं जानता कि मै जों कर रहा हूँ वह गलत है या सही है ,
या फिर जों कह रहा हूँ वह गलत या सही क्या है ?
किरण- अब रहने भी दो, जाने भी दो. जों हुआ सो हुआ . अब चुप रहिये क्योंकि सचमुच तुम्हें नहीं मालूम कि तुम क्या कह रहे हो. मैं ऐसा करती हूँ कि तुमको सुबह गैरेज तक पहुंचा देती हूँ, और यह काम पहली
फुर्सत में ही करूंगी, इसके बाद आप ऐसा करना कि आराम से अपने घर चले जाना , जरूरी काम निबटाना और उसके बाद मुझसे मिलने आना , ठीक है ?
सूरज- हाँ, ठीक है. ये ठीक रहेगा. मेरा भी यही विचार था.
किरण - मै अपने महबूब के दिल को पढ़ना अच्छी तरह से जान गयी हूँ. अब दिल -दिमाग कुछ हल्का हुआ ?
सूरज- अब कोई चिंता नहीं है. अब मेरे मन में से गर्दिश के बादल छंट चुके हैं.
सूरज ने सचमुच राहत की सांस ली थी, वह दिल में इस बात को लेकर घबराया हुआ था कि किरण पता नहीं उसे घर जाने की इजाजत देगी भी कि नहीं. कभी-कभी उसकी इच्छा होती कि अपनी समूची शक्ति को समेटकर
वह किसी तरह से भाग जाए, पीछे मुड़कर भी नहीं देखे, उसने अपने मन में यह निश्चय भी कर लिया था कि किरण अगर उसके घर जाने के लिए मना करती है तब भी वह सुबह होते ही भाग जाएगा . अपनी बाइक को
भी वहीं छोड़ देगा , फिर जों हो सो हो. और होगा भी क्या ? वह दौडकर सड़क पर जाएगा , वहाँ से किसी भी वाहन में बैठ सकता है, मजबूरी बताने पर कौन होगा जों उसकी मदद नहीं करेगा. रही बात बाइक की तो उसका
भी बीमा कराया हुआ था, पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करा देगा , बेंक की किश्त बीमा वाले भर देंगे, मगर इस सबकी नौबत ही नहीं आई. किरण ने खुद ही उसे सुबह घर जाने की इजाजत दे दी थी, मगर किरण का यह
वाजी उसे परेशां किये हुए था कि इस रात की कभी सुबह नहीं होती. क्यों नहीं होती ? वह बुदबुदा भी रहा था और किरण के साथ प्रणय सम्बन्ध भी बना रहा था, उसके प्रहार तेज हो चले थे, वासना की आंधी अब और भी तेज चलने
लगी थी. कामवासना का तूफ़ान उन दोनों को अपनी आगोश में लपेटे हुए था. एक क्षण ऐसा भी आया जब शब्द मौन हो गए और वे दोनों एक दूसरे में समा गए.
बेवफा खंडहर वाली , भाग-42
किरण- जी नहीं, बिलकुल नहीं. मैन तुमसे मजा तो ले सकती हूँ मगर तुम्हारा मजाक नहीं उड़ा सकती.
सूरज- यह भी क्या अजब बात बताई है आपने . जानती भी हीब सब कुछ हैं और छिपाती भी सब कुछ हैं.
किरण- अपने मन से वहम निकाल्दो मेरी जान . इससे चिंता बढ़ती है.
सूरज- क्या आसपास कोई गैरेज नहीं है ?
किरण- इतनी रात गए गैरेज की ख्वाहिश , कोई बात तो जरूर है. किस्से मिलने की इच्छा है इतनी रात ?
सूरज- अरे बाबा, मै अभी की नहीं सुबह की बात कर रहां हूँ. सुबह सवेरे ही मुझे गाड़ी ठीक करानीहै, सुबह जल्दी निकलना होगा. थोड़ी देर के लिए ही सही , मगर एक बार के लिए मुझे घर जाना होगा , बहुत
सारे काम बाकी रह गए हैं, मेरे बिना उन्हें कोई और नहीं कर सकता, इसलिए गैरेज पूछ रहा हूँ.
किरण- अच्छा सुबह की बात कर रहे हो, लेकिन सुबह होने तो दो , हो सकता है कि इस रात की कोई सुबह ही न हो. एक फिल्म भी आयी थी इस नाम की. 'इस रात की कोई सुबह नहीं ' .
सूरज- क्या ? क्या कहा आपने ? इस रात की कोई सुबह नहीं . प्रकृति से कभी कोई लड़ पाया है क्या ? अगर लड़ भी गया तो जीत भी सका है क्या. कुदरत ने दिन के बाद रात, रात के बाद दिन, अँधेरे के
बाद उजाला, गम के बा खुशी इस तरह के नियम बनाये हैं और अपना बनाया नियम भला कोई कैसे तोड़ सकता है .
किरण- मेरे रहते तुम्हें फ़िक्र करने की कोई जरूरत नहीं है, पूरा गैरेज ही उठकर तुम्हारे पास चला आएगा . यहाँ तक कि तुम्हें एक दूसरे नई गाडी दिलादी जायेगी .तुम डरते बहुत ज्यादा हो.
सूरज- तुम जोर का झटका धीरे से जों देती हो. अचानक ऐसा पंच मारती हो कि पता भी नहीं चल पाता.
किरण- हा हा हा ... अब ये न कहना कि मैं भी तुमको रहस्मयी दिखाई देती हूँ.
सूरज- सच तो यही है मगर ये बात मै अपनी जुबान से कह नहीं सकता, थरथरा जायेगीजुबान. क्योंकि तुमसे प्यार ही इतना ज्यादा हो गया है कि अब जुदाई का डर भी सताने लगा है. तुम्हारे नाराज होने की
चिंता भी सताने लगी है , सोचता हूँ कि मेरी किसी बात या व्यवहार से अगर तुम नाराज हो गयी तो मै कैसे ज़िंदा रहूंगा .
किरण- ये कैसी मोहब्बर है सूरज, एक तरफ बेंतिहाँ प्यार है तो दूसरे तरफ संदेह भी भी है. दोनों साथ -साथ कैसे चल सकते हैं. ?
सूरज- पाता नहीं, मैंने तो पहली बार किसीसे मोहब्बत की है, पहली बार किसीके साथ प्रणय सम्बन्ध बनाये हैं, मै नहीं जानता दीवानगी किसे कहते हैं,मै नहीं जानता कि मै जों कर रहा हूँ वह गलत है या सही है ,
या फिर जों कह रहा हूँ वह गलत या सही क्या है ?
किरण- अब रहने भी दो, जाने भी दो. जों हुआ सो हुआ . अब चुप रहिये क्योंकि सचमुच तुम्हें नहीं मालूम कि तुम क्या कह रहे हो. मैं ऐसा करती हूँ कि तुमको सुबह गैरेज तक पहुंचा देती हूँ, और यह काम पहली
फुर्सत में ही करूंगी, इसके बाद आप ऐसा करना कि आराम से अपने घर चले जाना , जरूरी काम निबटाना और उसके बाद मुझसे मिलने आना , ठीक है ?
सूरज- हाँ, ठीक है. ये ठीक रहेगा. मेरा भी यही विचार था.
किरण - मै अपने महबूब के दिल को पढ़ना अच्छी तरह से जान गयी हूँ. अब दिल -दिमाग कुछ हल्का हुआ ?
सूरज- अब कोई चिंता नहीं है. अब मेरे मन में से गर्दिश के बादल छंट चुके हैं.
सूरज ने सचमुच राहत की सांस ली थी, वह दिल में इस बात को लेकर घबराया हुआ था कि किरण पता नहीं उसे घर जाने की इजाजत देगी भी कि नहीं. कभी-कभी उसकी इच्छा होती कि अपनी समूची शक्ति को समेटकर
वह किसी तरह से भाग जाए, पीछे मुड़कर भी नहीं देखे, उसने अपने मन में यह निश्चय भी कर लिया था कि किरण अगर उसके घर जाने के लिए मना करती है तब भी वह सुबह होते ही भाग जाएगा . अपनी बाइक को
भी वहीं छोड़ देगा , फिर जों हो सो हो. और होगा भी क्या ? वह दौडकर सड़क पर जाएगा , वहाँ से किसी भी वाहन में बैठ सकता है, मजबूरी बताने पर कौन होगा जों उसकी मदद नहीं करेगा. रही बात बाइक की तो उसका
भी बीमा कराया हुआ था, पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करा देगा , बेंक की किश्त बीमा वाले भर देंगे, मगर इस सबकी नौबत ही नहीं आई. किरण ने खुद ही उसे सुबह घर जाने की इजाजत दे दी थी, मगर किरण का यह
वाजी उसे परेशां किये हुए था कि इस रात की कभी सुबह नहीं होती. क्यों नहीं होती ? वह बुदबुदा भी रहा था और किरण के साथ प्रणय सम्बन्ध भी बना रहा था, उसके प्रहार तेज हो चले थे, वासना की आंधी अब और भी तेज चलने
लगी थी. कामवासना का तूफ़ान उन दोनों को अपनी आगोश में लपेटे हुए था. एक क्षण ऐसा भी आया जब शब्द मौन हो गए और वे दोनों एक दूसरे में समा गए.
किरण- जी नहीं, बिलकुल नहीं. मैन तुमसे मजा तो ले सकती हूँ मगर तुम्हारा मजाक नहीं उड़ा सकती.
सूरज- यह भी क्या अजब बात बताई है आपने . जानती भी हीब सब कुछ हैं और छिपाती भी सब कुछ हैं.
किरण- अपने मन से वहम निकाल्दो मेरी जान . इससे चिंता बढ़ती है.
सूरज- क्या आसपास कोई गैरेज नहीं है ?
किरण- इतनी रात गए गैरेज की ख्वाहिश , कोई बात तो जरूर है. किस्से मिलने की इच्छा है इतनी रात ?
सूरज- अरे बाबा, मै अभी की नहीं सुबह की बात कर रहां हूँ. सुबह सवेरे ही मुझे गाड़ी ठीक करानीहै, सुबह जल्दी निकलना होगा. थोड़ी देर के लिए ही सही , मगर एक बार के लिए मुझे घर जाना होगा , बहुत
सारे काम बाकी रह गए हैं, मेरे बिना उन्हें कोई और नहीं कर सकता, इसलिए गैरेज पूछ रहा हूँ.
किरण- अच्छा सुबह की बात कर रहे हो, लेकिन सुबह होने तो दो , हो सकता है कि इस रात की कोई सुबह ही न हो. एक फिल्म भी आयी थी इस नाम की. 'इस रात की कोई सुबह नहीं ' .
सूरज- क्या ? क्या कहा आपने ? इस रात की कोई सुबह नहीं . प्रकृति से कभी कोई लड़ पाया है क्या ? अगर लड़ भी गया तो जीत भी सका है क्या. कुदरत ने दिन के बाद रात, रात के बाद दिन, अँधेरे के
बाद उजाला, गम के बा खुशी इस तरह के नियम बनाये हैं और अपना बनाया नियम भला कोई कैसे तोड़ सकता है .
किरण- मेरे रहते तुम्हें फ़िक्र करने की कोई जरूरत नहीं है, पूरा गैरेज ही उठकर तुम्हारे पास चला आएगा . यहाँ तक कि तुम्हें एक दूसरे नई गाडी दिलादी जायेगी .तुम डरते बहुत ज्यादा हो.
सूरज- तुम जोर का झटका धीरे से जों देती हो. अचानक ऐसा पंच मारती हो कि पता भी नहीं चल पाता.
किरण- हा हा हा ... अब ये न कहना कि मैं भी तुमको रहस्मयी दिखाई देती हूँ.
सूरज- सच तो यही है मगर ये बात मै अपनी जुबान से कह नहीं सकता, थरथरा जायेगीजुबान. क्योंकि तुमसे प्यार ही इतना ज्यादा हो गया है कि अब जुदाई का डर भी सताने लगा है. तुम्हारे नाराज होने की
चिंता भी सताने लगी है , सोचता हूँ कि मेरी किसी बात या व्यवहार से अगर तुम नाराज हो गयी तो मै कैसे ज़िंदा रहूंगा .
किरण- ये कैसी मोहब्बर है सूरज, एक तरफ बेंतिहाँ प्यार है तो दूसरे तरफ संदेह भी भी है. दोनों साथ -साथ कैसे चल सकते हैं. ?
सूरज- पाता नहीं, मैंने तो पहली बार किसीसे मोहब्बत की है, पहली बार किसीके साथ प्रणय सम्बन्ध बनाये हैं, मै नहीं जानता दीवानगी किसे कहते हैं,मै नहीं जानता कि मै जों कर रहा हूँ वह गलत है या सही है ,
या फिर जों कह रहा हूँ वह गलत या सही क्या है ?
किरण- अब रहने भी दो, जाने भी दो. जों हुआ सो हुआ . अब चुप रहिये क्योंकि सचमुच तुम्हें नहीं मालूम कि तुम क्या कह रहे हो. मैं ऐसा करती हूँ कि तुमको सुबह गैरेज तक पहुंचा देती हूँ, और यह काम पहली
फुर्सत में ही करूंगी, इसके बाद आप ऐसा करना कि आराम से अपने घर चले जाना , जरूरी काम निबटाना और उसके बाद मुझसे मिलने आना , ठीक है ?
सूरज- हाँ, ठीक है. ये ठीक रहेगा. मेरा भी यही विचार था.
किरण - मै अपने महबूब के दिल को पढ़ना अच्छी तरह से जान गयी हूँ. अब दिल -दिमाग कुछ हल्का हुआ ?
सूरज- अब कोई चिंता नहीं है. अब मेरे मन में से गर्दिश के बादल छंट चुके हैं.
सूरज ने सचमुच राहत की सांस ली थी, वह दिल में इस बात को लेकर घबराया हुआ था कि किरण पता नहीं उसे घर जाने की इजाजत देगी भी कि नहीं. कभी-कभी उसकी इच्छा होती कि अपनी समूची शक्ति को समेटकर
वह किसी तरह से भाग जाए, पीछे मुड़कर भी नहीं देखे, उसने अपने मन में यह निश्चय भी कर लिया था कि किरण अगर उसके घर जाने के लिए मना करती है तब भी वह सुबह होते ही भाग जाएगा . अपनी बाइक को
भी वहीं छोड़ देगा , फिर जों हो सो हो. और होगा भी क्या ? वह दौडकर सड़क पर जाएगा , वहाँ से किसी भी वाहन में बैठ सकता है, मजबूरी बताने पर कौन होगा जों उसकी मदद नहीं करेगा. रही बात बाइक की तो उसका
भी बीमा कराया हुआ था, पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करा देगा , बेंक की किश्त बीमा वाले भर देंगे, मगर इस सबकी नौबत ही नहीं आई. किरण ने खुद ही उसे सुबह घर जाने की इजाजत दे दी थी, मगर किरण का यह
वाजी उसे परेशां किये हुए था कि इस रात की कभी सुबह नहीं होती. क्यों नहीं होती ? वह बुदबुदा भी रहा था और किरण के साथ प्रणय सम्बन्ध भी बना रहा था, उसके प्रहार तेज हो चले थे, वासना की आंधी अब और भी तेज चलने
लगी थी. कामवासना का तूफ़ान उन दोनों को अपनी आगोश में लपेटे हुए था. एक क्षण ऐसा भी आया जब शब्द मौन हो गए और वे दोनों एक दूसरे में समा गए.
Wednesday, February 2, 2011
बेवफा खंडहर वाली , भाग-41
सूरज- तो इसका मतलब ये कहो न की राहुल अपनी बड़ी साली से कम और दौलत से ज्यादा मोहब्बत कर रहा था.
किरण- हाँ, ऐसा ही कुछ था. राहुल कहता की वह रीता को चाहता है क्योंकि वह बहुत दौलतमंद है और उसकी दौलत को भी पसंद करता है क्योंकि वह दौलत रीता की है . कुल मिलाकर वह रीता और उसकी अरबों की जायदाद
, उन दोनों से ही लगाव रखता था.
सूरज- अच्छा ... बढ़िया है. यह कौन सा दर्शन हुआ भाई ? बात कुछ समझ में नहीं आई.
किरण- आगे सुनाऊ या फिर बात को यहीं खत्म करू ?
सूरज - आगे बढ़ने के लिए ही तो मै कब से मक्खन लगा रहा हूँ. देख रही हो न , मैंने तो इसीलिए ही रफ़्तार भी कम करदी है. शायद आपको भी मजा नहीं आ रहा होगा .
किरण - मजा तो इतना आ रहा है की उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. इस मामले में तुम कमाल के आदमी हो. तुमने तो यार मेरा ही मूड चेंज कर दिया है. दिखने में ऐसा लगता नहीं है की तुम इतने बड़े शक्तिमान
हो सकते. शक्तिमान शब्द मैंने इसलिए प्रयोग किया क्योंकि शक्ति की असली परख तो बिस्तर के मैदान पर ही होती है. यहाँ पर कई तरह के मर्द पाए जाते हैं , इनमे से कुछ तो ऐसे होते हैं जों सिर्फ जुबानी मर्द होते हैं , कुछ
ऐसे होते हैं जों शारीरिक मर्द होते हैं और कुछ तुम्हारे जैसे होते हैं. आल इन वन. तुम उन लोगों में से नहीं हो जों सिर्फ किसी एक ही चीज पर निर्भर करते हों. तुम असली मर्द हो. तुमने तो मेरी प्यास को हमेशा के लिए बुझा आ
है. अब मै तृप्त हो गयी हो . थोड़ी देर तक अगर ऐसे ही बने रहते हो. तो ये जान लीजिए कि मै हमेशा तुम्हें याद रखूंगी . कामदेव को भी फेल कर दिया है तुमने.
सूरज- मुझे इतना भी सिर पर न चढाओ कि फिर गिरू तो कभी उठ ही ना पाऊं .
किरण- आह , आराम -आराम से ही करो न मेरी जान. मुझे ज्याडा सताओगे तो मजा कैसे ले पाओगे ? आखिर तुम भी तो चाहते ही होंगे न कि इन हसीन [पलों को हम हर बार और यहाँ तक कि बार-बार इंजॉय करें.
सूरज- अब तो यकीन मानिए, मैंने रफ़्तार बहुत कम कर दी है. इतनी ज्यादा कम कि आप भी महसूस कर ही रही होंगी , इसके बावजूद भी अगर तुम इस तरह की शिकायत करती हो तो इसे मै क्या समझूं ?
किरण- ज्या कुछ समझने की जरूरत नहीं है, जैसा कहती हूँ वैसा करो , ये सब तुम्हारे हित में भी है और मेरे हित में भी.
किरण क्या का रही थी , यह सूरज ठीक तरह से नहीं सुन पा रहा था, उसका दिमाग तो भूत-प्रेत , आत्मा और रूह जैसे लफ्जों में उलझा हुआ था. वह समझ नहीं पा रहा था कि आखिरकार करे तो क्या करे ? कभी -कभी
उसके दिल के किसी कोने से आवाज आती कि वह इस रहस्यमय होटल से कहीं दूर भाग जाए, वह अफ़सोस करने लगा अपने उस फैसले पर जों उसने यहाँ आने के लिए लिया था, वह सोचता कि अगर उसकी गाड़ी खराब
नहीं होती तो वह इस होटल में हरगिज नहीं रुकता, अगर रुकता भी तो किरण से इस तरह की बात नहीं करता. अगर बातें भी कर लेता तो बातों को यहाँ तक नहीं बढाता, अंतरंग संबंधों के बारे में उसे यहाँ तक नहीं बढ़ना
चाहिए था. उसे अपने किये पर दुःख हो रहा था. यह सच था कि उसे पूरा इंद्रजाल कंठस्थ था, लेकिन इसके बावजूद उसने कुछ बातें झूठी भी कही थीं, उसने यह झूठ ही बोला था कि उसने सब मन्त्रों को सिद्ध कर लिया है.
असलियत तो यह थी कि उसे मन्त्रों की सच्चाई और शक्ति पर भी भरोसा नहीं था. उसने तो सिर्फ हावी होने के लिए यह बात बनादी थी. वह सोच ही रहा था कि उसे किरण की आवाज सुनाई दी-
-क्या सोच रहे हो ? कहीं दूर उलझ गए क्या ?
सूरज- आपको क्या मालून कि मैन सोच रहा हूँ ? मैन क्या सोचूंगा और क्यों सोचूंगा ?
किरण- सोचने के लिए तो बहुत कुछ है आपके पास . और कुछ नहीं तो ये भी सोच सकते हो कि इस हो कि इस होटल में हंगामा क्यों नहीं है ?
सूरज- आप मेरा मजाक उड़ा रही हैं ?
किरण- जी नहीं, बिलकुल नहीं. मैन तुमसे मजा तो ले सकती हूँ मगर तुम्हारा मजाक नहीं उड़ा सकती.
सूरज- यह भी क्या अजब बात बताई है आपने . जानती भी हीब सब कुछ हैं और छिपाती भी सब कुछ हैं.
किरण- अपने मन से वहम निकाल्दो मेरी जान . इससे चिंता बढ़ती है.
सूरज- क्या आसपास कोई गैरेज नहीं है ?
किरण- इतनी रात गए गैरेज की ख्वाहिश , कोई बात तो जरूर है. किस्से मिलने की इच्छा है इतनी रात ?
सूरज- अरे बाबा, मै अभी की नहीं सुबह की बात कर रहां हूँ.
बेवफा खंडहर वाली , भाग-40
किरण- यही की जान कीमती होती है, इसे जाने के बाद कुछ नहीं बचता, उससे जुड़े हुए लोग फिर से नई जिंदगी शुरू कर देते हैं. नए साथ मिलते हैं, नए उद्देश्य बन जाते हैं और नई राह यहाँ तक की नई
मंजिलों का जन्म हो जाता है. इसलिए कभी भी किसीके लिए जान देने की बात मत करना.
सूरज- अच्छा ठीक है, तुम जैसा कहोगी मै वैसा ही करूँगा . आदेश करो. तुम्हें शायद ये बात बहुत बुरी लगी है ?
किरण- नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. असल में तुम्हें एहसास नहीं है की किसीके के लिए बिना जिस्म के जीना कितना मुश्किल होता है.
सूरज- बिना जिस्म के जीना ? ये आपने क्या कह दिया ? ये कैसे शब्द इस्तेमाल कर लिए ? भला ऐसा कहीं होता है क्या ?
किरण- तुम नहीं समझ पाओगे.
सूरज- समझाने की कोशिश करोगी तो क्यों नहीं ? मेरा तो यही सोचना है की आपने मुझे फिर से डराना शुरू कर दिया है . ऐसा नहीं चलता यार . या तो ठीक से प्रणय क्रीडा की ही बात करो या फिर अच्छी तरह से
डरा ही लों. रामगोपाल वर्मा की तरह एक ही फिल्म में होरर और रोमांस का तडका मत लगाओ .
किरण- इतनी जल्दी दहशत में आ गए , अभी अभी तो कहते थे थे की जनाब के दादा बहुत बड़े सयाने थे , की जादू टोना के माहिर थे, की जनाब ने पूरा इंद्रजाल ही पढ़ लिया है और अब देखो सिर्फ रूह की बात चली
तो हवा खुश्क हो गयी, मैन तो आपको यह बताना चाह रही थी की असली मोहब्बत जिस्म से ही ज्यादा ताल्लुक रखती है , यह अलग बात है की लोग ऐसा मानने के लिए तैयार नहीं होते. अपनी बात को बड़ी करने के लिए
, अपने आपको बड़ा दिखाने के लिए वे ऐसा दिखाने की कोशिश करते हैं जैसे की वे बड़े त्यागी हैं. और बड़प्पन की आड़ में वे अनैतिक कार्यों को अंजाम देते हैं.
सूरज- थोड़ा सा डिटेल में बताओगे तब समझ पाउँगा. कुछ आपबीती सुनाइये इससे जुडी हुई.
किरण- क्या बताऊ और क्या छिपाऊ ? जीवन में रोजाना ऐसे कार्य होते रहते हैं. मेरे पास तो लोगों का आना-जाना लगा ही रहता था. तुम तो जानते ही हो की एक पेशेवर औरत की दिनचर्या क्या होती है ?
सूरज- बस इसी बात को बार- बार मत दोहराओ , ऐसा करती हो तो दिल पर चोट सी लगती है. इस शब्द से मुझे नफरत सी हो गयी है.
किरण- जों सचह है, उसे स्वीकार करना सीखो सूरज. सच्चाई जितनी कड़वी होती है उतनी ही पवित्र होती है.
सूरज- अच्छा ठीक है , यह भाषण छोडिये और कहानी के बारे में सुनाइये , जों अभी सुनाने जा रही थीं .
किरण- अच्छा , राहुल के बारे में बात कर रहे हो. उसका नाम राहुल ही तो था . राहुल अमीर बाप का अय्यास युवक था. वह जों ठान लेता, उसे पूरा करके ही रहता था. उसने यदि किसीको पाने की जिद कर ली तो
दुनिया की कोई ताकत उसे ऐसा करने से नहीं रोक सकती थी. वह मेरे पास एक बार आया था. उसने मेरी मुंहमांगी रकम दी. और फिर पूरी रात सिर्फ अपनी कहानी ही सुनाता रहा. मेरे कहने पर पर भी उसने मेरे साथ
जिस्मानी रिश्ता नहीं बनाया. अगर कोई दूसरा होता तो इस मौके को किसी भी कीमत पर नहीं छोडता .
सूरज- वाव, इसका मतलब दुनिया में इस तरह के लोग भी रहते हैं. क्या कहानी सुनाई उसने ?
किरण- उसने बताया की उसे अपनी बड़ी साली बहुत अच्छी लगती थी, उसकी पत्नी वैसे तो बहुत सुन्दर थी, गुणवान थी, लेकिन बड़ी साली पर वह बुरी तरह से फ़िदा था. वह उसे हासिल करने के लिए नई-नई तरकीब ढूँढता
रहता था. लेकिन दुर्भाग्य से उसकी हर स्कीम फेल हो जाया करती थी. इत्तेफाक से उसकी पत्नी की बड़ी बहन रीता के पति का सड़क दुर्घटना में इंतकाल हो गया. रीता का पति बहुत धनवा न था. अरबों की जमीं जायदाद थी,
अब तो राहुल के मन में यह बात घर कर गयी की अगर उसने रीता को अपने प्रेम के जाल में उलझा लिया तो वह उसके यौवन के रस को तो चखेगा ही , साथ ही वह उसकी दौलत को भी हथिया सकता है.
सूरज- तो इसका मतलब ये कहो न की राहुल अपनी बड़ी साली से कम और दौलत से ज्यादा मोहब्बत कर रहा था.
किरण- हाँ, ऐसा ही कुछ था. राहुल कहता की वह रीता को चाहता है क्योंकि वह बहुत दौलतमंद है और उसकी दौलत को भी पसंद करता है क्योंकि वह दौलत रीता की है . कुल मिलाकर वह रीता और उसकी अरबों की जायदाद
, उन दोनों से ही लगाव रखता था.
सूरज- अच्छा ... बढ़िया है. यह कौन सा दर्शन हुआ भाई ? बात कुछ समझ में नहीं आई.
किरण- आगे सुनाऊ या फिर बात को यहीं खत्म करू ?
सूरज - आगे बढ़ने के लिए ही तो मै कब से मक्खन लगा रहा हूँ.
किरण- यही की जान कीमती होती है, इसे जाने के बाद कुछ नहीं बचता, उससे जुड़े हुए लोग फिर से नई जिंदगी शुरू कर देते हैं. नए साथ मिलते हैं, नए उद्देश्य बन जाते हैं और नई राह यहाँ तक की नई
मंजिलों का जन्म हो जाता है. इसलिए कभी भी किसीके लिए जान देने की बात मत करना.
सूरज- अच्छा ठीक है, तुम जैसा कहोगी मै वैसा ही करूँगा . आदेश करो. तुम्हें शायद ये बात बहुत बुरी लगी है ?
किरण- नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. असल में तुम्हें एहसास नहीं है की किसीके के लिए बिना जिस्म के जीना कितना मुश्किल होता है.
सूरज- बिना जिस्म के जीना ? ये आपने क्या कह दिया ? ये कैसे शब्द इस्तेमाल कर लिए ? भला ऐसा कहीं होता है क्या ?
किरण- तुम नहीं समझ पाओगे.
सूरज- समझाने की कोशिश करोगी तो क्यों नहीं ? मेरा तो यही सोचना है की आपने मुझे फिर से डराना शुरू कर दिया है . ऐसा नहीं चलता यार . या तो ठीक से प्रणय क्रीडा की ही बात करो या फिर अच्छी तरह से
डरा ही लों. रामगोपाल वर्मा की तरह एक ही फिल्म में होरर और रोमांस का तडका मत लगाओ .
किरण- इतनी जल्दी दहशत में आ गए , अभी अभी तो कहते थे थे की जनाब के दादा बहुत बड़े सयाने थे , की जादू टोना के माहिर थे, की जनाब ने पूरा इंद्रजाल ही पढ़ लिया है और अब देखो सिर्फ रूह की बात चली
तो हवा खुश्क हो गयी, मैन तो आपको यह बताना चाह रही थी की असली मोहब्बत जिस्म से ही ज्यादा ताल्लुक रखती है , यह अलग बात है की लोग ऐसा मानने के लिए तैयार नहीं होते. अपनी बात को बड़ी करने के लिए
, अपने आपको बड़ा दिखाने के लिए वे ऐसा दिखाने की कोशिश करते हैं जैसे की वे बड़े त्यागी हैं. और बड़प्पन की आड़ में वे अनैतिक कार्यों को अंजाम देते हैं.
सूरज- थोड़ा सा डिटेल में बताओगे तब समझ पाउँगा. कुछ आपबीती सुनाइये इससे जुडी हुई.
किरण- क्या बताऊ और क्या छिपाऊ ? जीवन में रोजाना ऐसे कार्य होते रहते हैं. मेरे पास तो लोगों का आना-जाना लगा ही रहता था. तुम तो जानते ही हो की एक पेशेवर औरत की दिनचर्या क्या होती है ?
सूरज- बस इसी बात को बार- बार मत दोहराओ , ऐसा करती हो तो दिल पर चोट सी लगती है. इस शब्द से मुझे नफरत सी हो गयी है.
किरण- जों सचह है, उसे स्वीकार करना सीखो सूरज. सच्चाई जितनी कड़वी होती है उतनी ही पवित्र होती है.
सूरज- अच्छा ठीक है , यह भाषण छोडिये और कहानी के बारे में सुनाइये , जों अभी सुनाने जा रही थीं .
किरण- अच्छा , राहुल के बारे में बात कर रहे हो. उसका नाम राहुल ही तो था . राहुल अमीर बाप का अय्यास युवक था. वह जों ठान लेता, उसे पूरा करके ही रहता था. उसने यदि किसीको पाने की जिद कर ली तो
दुनिया की कोई ताकत उसे ऐसा करने से नहीं रोक सकती थी. वह मेरे पास एक बार आया था. उसने मेरी मुंहमांगी रकम दी. और फिर पूरी रात सिर्फ अपनी कहानी ही सुनाता रहा. मेरे कहने पर पर भी उसने मेरे साथ
जिस्मानी रिश्ता नहीं बनाया. अगर कोई दूसरा होता तो इस मौके को किसी भी कीमत पर नहीं छोडता .
सूरज- वाव, इसका मतलब दुनिया में इस तरह के लोग भी रहते हैं. क्या कहानी सुनाई उसने ?
किरण- उसने बताया की उसे अपनी बड़ी साली बहुत अच्छी लगती थी, उसकी पत्नी वैसे तो बहुत सुन्दर थी, गुणवान थी, लेकिन बड़ी साली पर वह बुरी तरह से फ़िदा था. वह उसे हासिल करने के लिए नई-नई तरकीब ढूँढता
रहता था. लेकिन दुर्भाग्य से उसकी हर स्कीम फेल हो जाया करती थी. इत्तेफाक से उसकी पत्नी की बड़ी बहन रीता के पति का सड़क दुर्घटना में इंतकाल हो गया. रीता का पति बहुत धनवा न था. अरबों की जमीं जायदाद थी,
अब तो राहुल के मन में यह बात घर कर गयी की अगर उसने रीता को अपने प्रेम के जाल में उलझा लिया तो वह उसके यौवन के रस को तो चखेगा ही , साथ ही वह उसकी दौलत को भी हथिया सकता है.
सूरज- तो इसका मतलब ये कहो न की राहुल अपनी बड़ी साली से कम और दौलत से ज्यादा मोहब्बत कर रहा था.
किरण- हाँ, ऐसा ही कुछ था. राहुल कहता की वह रीता को चाहता है क्योंकि वह बहुत दौलतमंद है और उसकी दौलत को भी पसंद करता है क्योंकि वह दौलत रीता की है . कुल मिलाकर वह रीता और उसकी अरबों की जायदाद
, उन दोनों से ही लगाव रखता था.
सूरज- अच्छा ... बढ़िया है. यह कौन सा दर्शन हुआ भाई ? बात कुछ समझ में नहीं आई.
किरण- आगे सुनाऊ या फिर बात को यहीं खत्म करू ?
सूरज - आगे बढ़ने के लिए ही तो मै कब से मक्खन लगा रहा हूँ.
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